संस्कृति सत्य 4 गये तो क्या हुआ!


प्रतिशोध ले ही लिया

वचनेश त्रिपाठी "साहित्येन्दु'

बंगाल की उस विप्लवी समिति के नेता थे- सूर्यसेन जिन्हें "मास्टर दा' भी कहते थे। कई वर्षों से अंग्रेज सरकार उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में उनकी तलाश कर रही थी। अंतत: विप्लवी समिति के ही एक सदस्य नेत्रसेन ने ही अपने नेता सूर्यसेन के ठहरने के स्थान की सूचना गुप्तचर विभाग के एक अंग्रेज अफसर तक पहुंचाई। वे गिरफ्तार कर लिए गए और अंग्रेजों ने सूर्यसेन को फांसी दे दी। परन्तु मुखबिरी करने वाले नेत्रसेन को भी क्रांतिकारियों ने जिन्दा न छोड़ा और सन् 1934 के जनवरी महीने में जब गेड़ला ग्राम में उसके होने की सूचना मिली तो उसे वहीं गोली मार दी गई। अनन्तर अपने दल के नेता को फांसी देने का प्रतिशोध अंग्रेजों से लेने के लिए 4 क्रांतिकारी नवयुवक जिनकी आयु 26-27 वर्ष से अधिक नहीं थी, पिस्तौलें भरकर चटगांव के क्रिकेट मैदान पहुंचे, जहां वही अंग्रेज अफसर क्रिकेट देख रहे थे। उन क्रांतिकारियों ने उन अंग्रेजों पर बम फेंके, साथ ही गोलियां चलाईं जिससे कई अंग्रेज धराशायी हो गये। परन्तु जवाबी गोलाबारी में दो क्रांतिकारी हिमांशु चक्रवर्ती और नित्यसेन वहीं बलिदान हो गए। क्रिकेट मैदान में भारी संख्या में मौजूद सशस्त्र पुलिस दल ने अन्य दोनों साथियों हरीन चक्रवर्ती और कृष्ण चौधरी को गिरफ्तार कर लिया जिन्हें बहरामपुर के कारागार में फांसी दे दी गई। कालान्तर में इसी दल के तीन फरार युवक शांति चक्रवर्ती, मणिदत्त और कालीकिंकर डे भी गिरफ्तार हो गये और उन्हें भी अंग्रेजों ने लम्बी सजाएं दीं। इसी दल के एक अन्य अतीव कर्मठ विप्लवी, जिनका नाम त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती था और जो अपने दो छद्म नामों, "अनन्तकुमार' और "कालीचरण' (काली बाबू) से लंबे समय तक फरार रहकर कई पुलिस अधिकारियों को अपनी गोली का निशाना बना चुके थे, एक दिन गंगा नदी के घाट पर खड़ी अपनी नाव के पास कालीचरण मल्लाह के रूप में पकड़ लिए गए और उन्हें अंग्रेजों ने 30 वर्षों तक अण्दमान आदि की जेलों में कैद रखा। यही त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती (त्रैलोक्य महाराज) थे, जिन्होंने कोलकाता में डा. केशव बलिराम हेडगेवार को क्रांतिकारी दल में भर्ती किया था और सन् 1940 में वि·श्व-युद्ध के समय एक अन्य साथी योगेशचन्द्र चटर्जी के साथ नागपुर आकर डा. हेडगेवार से मिले थे। यह सब लिखने का तात्पर्य यह है कि उस युग में विप्लवी युवक जो प्राय: कालेज-छात्र ही होते थे, अपने साथियों के दमन और अपमान का प्रतिशोध उस अंग्रेज सरकार से लेना खूब जानते थे जिसके बारे में तब यह कहा जाता था कि "ब्रिटिश राज्य में कहीं सूरज नहीं डूबता'। उन दिनों ब्रिटिश शक्ति वि·श्व में प्रथम मानी जाती थी परंतु क्रांतिकारी छात्र उनकी चुनौती का उत्तर देते रहे थे। सूर्यसेन की फांसी का बदला चुकाने में 4 युवक बलिदान हुए और 3 काले पानी की सजा काटने अंडमान पहुंच गए किन्तु अंग्रेजों पर बम-पिस्तौलों से प्रहार करने में उन्होंने कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। आज भी देश-शत्रुओं, आई.एस.आई. एजेन्टों और देश की आस्तीनों में पल रहे गद्दारों की भरमार से भारत त्रस्त है, परन्तु हमारे युवा रक्त में कहीं उबाल नजर नहीं आता।

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