चर्चा सत्र चुनाव-2004


समीकरणों की जोड़-तोड़

--मा.गो. वैद्य

सन् 2004 में होने वाले लोकसभा चुनाव की व्यूह-रचना प्रारंभ हो चुकी है, युद्ध-रेखाएं भी लगभग तय हो गई हैं और मित्रपक्षों की तोड़जोड़ भी शुरू हो चुकी है।

ठाणे जिले के उत्तन गांव में भाजपा के चिंतन शिविर के तुरंत बाद शिमला में कांग्रेस का भी मंथन शिविर हुआ। कांग्रेस ने अपनी भूमिका काफी स्पष्ट कर दी है। उसने स्वीकार कर लिया है कि वह अपने बूते पर सत्ता में नहीं आ सकती। पचमढ़ी में जिस आत्मवि·श्वास का ढोल बजाया गया था, उसकी आवाज बंगलौर में फीकी पड़ गई और शिमला में तो ढोल की पोल ही खुल गई। अंबिका सोनी बोल गईं कि उन्होंने अभी भी आशा नहीं छोड़ी है। पर इस आशा में बल नहीं है। भीष्म, द्रोण और कर्ण के जाने के बाद भी दुर्योधन ने पांडवों को हरा देने की गर्वोक्ति की थी। यह "अंबिकाई आशा' भी कुछ उसी तरह की है। कुछ अन्य कांग्रेसी नेताओं ने भी पैर ढीले नहीं होने दिए हैं। सुना है कि उन्होंने 200 सीटों का लक्ष्य प्राप्त करने का संकल्प व्यक्त किया है। कुल मिलाकर कांग्रेस ने मान लिया है कि उसे पूर्ण बहुमत तो मिलने से रहा इसलिए उसने गठबंधन की मानसिकता को अपनाया है।

गठबंधन के मुद्दे

कांग्रेस किन मुद्दों पर गठबंधन करेगी, यह भी उसने स्पष्ट कर दिया है। नकारात्मक मुद्दा तो भाजपा को सत्ता से दूर रखना है, पर आजकल नकारात्मक मुद्दे चल नहीं पाते, इसलिए कांग्रेस ने इस नकारात्मक मुद्दे को "सेकुलरिज्म' का सकारात्मक जामा पहना कर आगे बढ़ने की बात सोची है। पिछले पचास वर्षों में इस "सेकुलरिज्म' शब्द ने हमारे देश में बड़ा गुबार उठाया है और एक वैचारिक संभ्रम का निर्माण किया है। शब्दकोशों या साम्यवादी तिलक लगाए देशों में इस शब्द का अर्थ चाहे जो हो, पर हमारे देश में सेकुलर शब्द का अर्थ "हिन्दू विरोधी' चल निकला है। इसके कुछ अन्य शब्द रूप भी हैं- धर्मनिरपेक्षता, पंथनिरपेक्षता या सर्वधर्मसमभाव। पर आचरण उसके सही अर्थ से सर्वथा विपरीत है। व्यवहार में वह केवल हिन्दू-द्रोही और हिन्दू-विरोधी के रूप में उभरा है। इसका भावात्मक अर्थ मुस्लिम-प्रेम के रूप में उभरा है। यह भावात्मक रूप तो प्रगटत: दिखाई नहीं देता पर अल्पसंख्यकों के प्रति सहानुभूति का जामा पहनकर आता है।

जातिवाद सुविधाजनक

वर्तमान में जातिवादी राजनीति करना बड़ा सुविधाजनक हो गया है। "हिन्दू' का क्षेत्र ही इतना विशाल है, तत्व इतना गहरा है कि राजनीति के खिलाड़ियों के लिए वह भारी पड़ता है। राजनीति में जाति के आधार पर दल सहजता से बनते हैं। सत्ता में बने रहने के उद्देश्य से श्रीमती गांधी ने तो निर्वाचन क्षेत्रों में जातिगत मतदाताओं की संख्या पता लगाने का आदेश दिया था। जाति के आधार पर राजनीति करने वाले ये नेता स्वयं को धर्मनिरपेक्ष, पंथनिरपेक्ष और सेकुलर बताकर वाहवाही लूटते हैं। उनकी स्थिति तो कुएं के उस मेंढक जैसी है, जो विशाल सागर में विचरण करने वाली मछली को कूप-मंडूक कह कर उलाहना देता है।

अड़चनें

सोनिया गांधी के नेतृत्व का सवाल इस सेकुलरी जमात के लिए अड़चन बन गया है। अगले प्रधानमंत्री के रूप में सोनिया गांधी का नाम कांग्रेसी नेताओं ने घोषित तो कर दिया है, पर अनेक कांग्रेसी इसे पचा नहीं पा रहे हैं। सोनिया का विदेशी होना तो मूल अड़चन है ही, इतने ऊंचे पद के लिए उनकी योग्यता के बारे में भी संदेह है। पत्रकारों के टेडे-मेढ़े प्रश्नों का सटीक उत्तर देना उनके लिए आज भी असंभव है। देश की राजनीति की भी उन्हें पूर्ण जानकारी नहीं है। भूतपूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी होना ही उनकी एकमात्र योग्यता है।

महाभारत का दूसरा पक्ष

इस युद्ध के दूसरे पक्ष में भाजपा है। 1998 तक उसकी पहचान हिन्दुत्ववादी दल के रूप में थी, पर अब सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या यह दल खुद अपनी इस पहचान को गलत समझ रहा है? यह सच है कि सत्ता के गलियारे और राजनीति में ऐसी पहचान होना अनुपयोगी है, फिर क्या भाजपा ने यही रूप अपना लिया है? इस नयी भूमिका में उसे क्या कोई सफलता मिली है? इन सभी प्रश्नों पर मंथन करने पर पता चलता है कि अपने विशिष्ट कार्यक्रमों को छोड़ देने के बाद भी भाजपा को कोई विशेष उपलब्धि मिली ही नहीं। 1998 में उसने अपने "ऐजेण्डे' पर चुनाव लड़ा तो 182 सीटें मिलीं। गठबंधन के "एजेण्डे' पर चुनाव लड़ने पर भी उपलब्धि में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई। वैसे राजनीति में इस प्रकार के प्रयोग तो होते ही रहते हैं, पर इसका तात्पर्य निष्ठा-परिवर्तन से तो नहीं लगाया जा सकता। हिन्दुत्व चुनावी मुद्दा न होने की बात भाजपाई नेता बार-बार कहते रहते हैं। क्या इससे कांग्रेस और अन्य दल भाजपा को हिन्दुत्वनिष्ठ कहना बंद कर देंगे? हिन्दुत्व को छोड़ देने से मुसलमानों के मत ज्यादा मिलेंगे, यह सोचना भी भ्रम है। पर इससे हिन्दुओं के मतों में ह्रास होगा, इसका अंदाज तो भाजपा नेताओं को होगा ही।

मुसलमान और भाजपा

कुछ समय पूर्व भाजपा के एक वरिष्ठ मुस्लिम नेता से भेंट हुई। उन्होंने कहा, "हम दो-चार प्रतिशत मुसलमान जो भाजपा को ही अपना मत देते हैं और उसी दल के लिए काम भी करते हैं, केवल इसीलिए कि यह दल राष्ट्रवादी है। हमें सेकुलर दल का ही चुनाव करना होता तो उत्तर प्रदेश में ऐसे दलों की कतार लगी है।' राष्ट्रवादी दल से उनका तात्पर्य पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि राष्ट्रवादी यानी वही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद- हिन्दुत्व आधारित राष्ट्रवाद। स्मरण होगा कि 1946 में 15 प्रतिशत मुसलमानों ने अखंड-भारत के पक्ष में मतदान किया था। 1999 तक इनकी संख्या दो प्रतिशत ही रह गई। 1999 में ही जम्मू लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा का प्रत्याशी एक लाख मतों से चुनाव जीता था, पर उसकी मृत्यु के बाद वहां हुए उपचुनाव में भाजपा का प्रत्याशी 55 हजार मतों से हार गया। इन दोनों घटनाओं की उचित मीमांसा होनी चाहिए। पुंछ-राजौरी क्षेत्र के मुस्लिम समुदाय के लगभग पच्चीस लोगों से गत वर्ष जम्मू में भेंट हुई थी। उन्होंने बताया कि पहले हम कांग्रेस को अपना वोट दिया करते थे पर अब भाजपा को वोट देते हैं। आप हमें मुसलमान क्यों समझते हैं, हिन्दुस्थानी क्यों नहीं समझते? हमें इस सोच के मुसलमानों को एकत्रित कर उनकी शक्ति बढ़ानी चाहिए। भाजपा यदि खम ठोककर अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मुद्दा रखेगी तो उसे लाभ ही होगा। ढुलमुल नीति की बजाय ठोस भूमिका असरदार होती है।

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