समान नागरिक संहिता - 1


आखिर भय क्यों?

-गौरीशंकर भारद्वाज

भारतीय संविधान के चतुर्थ अध्याय में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति- निर्देशक सिद्धान्तों का प्रावधान है, जिन्हें अनुच्छेद 38 द्वारा नींव का पत्थर घोषित किया गया है। अनुच्छेद 37 में यद्यपि इन निर्देशक सिद्धांतों को वाद-निरपेक्ष माना गया है अर्थात् इनको लागू न करने पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती किन्तु इसी अनुच्छेद में यह भी घोषणा की गई है कि ये निर्देशक सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत आधार हैं और कानून बनाने में इन सिद्धांतों का प्रयोग करना राज्य का कर्तव्य होगा। न्यायमूर्ति के.एस. हेगड़े ने ठीक ही लिखा है, "यदि कोई सरकार इन निर्देशक सिद्धांतों की अवहेलना करती है तो उसे चुनाव के समय मतदाताओं को निश्चित रूप से जवाब देना होगा।' न्यायमूर्ति एम.सी. छागला ने नीति-निर्देशक सिद्धांतों को महत्वपूर्ण बताते हुए लिखा है, "यदि इन सिद्धांतों को लागू कर दिया जाए तो हमारा देश वास्तव में धरती पर स्वर्ग बन जाएगा।' वाद-निरपेक्षता के कारण नीति-निर्देशक सिद्धांतों का महत्व कम नहीं हो जाता। यही नहीं सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को मूल अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण माना है। इन सिद्धांतों के महत्व को स्वीकार करते हुए संविधान के अनुच्छेद 41, 42, 43, 45, 46, 49 तथा 50 को अधिकांश रूप में लागू कर दिया गया है किन्तु दुर्भाग्यवश वोट की राजनीति के कारण अभी तक अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता), अनुच्छेद 47 (नशाबन्दी) तथा अनुच्छेद 48 (गो हत्या पर प्रतिबंध) को लागू नहीं किया जा सका है।

संविधान के अनुच्छेद 44 में प्रावधान है कि राज्य सम्पूर्ण देश में "समान नागरिक संहिता' लागू करने का प्रयास करेगा अर्थात् सभी के लिए निजी कानून एक जैसे होंगे। निजी कानूनों से अभिप्राय उन कानूनों से है, जो निजी मामलों में लागू होते हैं। जैसे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि। परतंत्र भारत में हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी आदि सभी समुदायों में भेदभाव पूर्ण दमनकारी, क्रूर व अन्यायकारी निजी कानून प्रचलित थे। हिन्दू समाज में शिक्षा-प्रसार व समाज-सुधार आंदोलनों के फलस्वरूप बहु-विवाह, बाल-विवाह व सती प्रथा तथा विधवा विवाह निषेध के विरुद्ध 1956 में हिन्दू-कोड बिल लागू हुआ। ईसाई व पारसी समुदायों में भी त्रुटिपूर्ण निजी कानूनों में सुधार हुआ किन्तु मुसलमानों में आज भी दकियानूसी, दमनकारी व भेदभावपूर्ण कानून लागू हैं। वास्तव में विभिन्न समुदायों में प्रचलित अंधवि·श्वासों, कुरीतियों एवं मध्यकालीन रूढ़िवादी परम्पराओं को धर्म के ठेकेदारों द्वारा धार्मिक आवरण पहनाकर उनको अपरिवर्तनीय निजी कानून घोषित कर दिया गया है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने समतामूलक समाज और पंथनिरपेक्ष शासन की स्थापना हेतु एवं राष्ट्रीयता की चेतना तथा देश में भावनात्मक एकता के विकास के लिए "समान नागरिक संहिता' का प्रावधान किया।

भारत के अतिरिक्त संसार में ऐसा कोई देश नहीं है, जहां अलग-अलग सम्प्रदायों व वर्गों के लिए अलग-अलग कानून विद्यमान हों। अमरीका व अन्य पश्चिमी देशों में पूर्णतया समान नागरिक संहिता लागू है, जहां बड़ी संख्या में मुसलमान व अन्य अल्पसंख्यक वर्गों के लोग रहते हैं। अनेक प्रगतिशील मुस्लिम देशों यथा मिस्र, सीरिया, तुर्की, मोरक्को, इंडोनेशिया व मलेशिया, यहां तक कि पाकिस्तान में भी बहुपत्नीवाद, मौखिक तलाक तथा पुरुष-प्रधान उत्तराधिकार आदि के मामलों में भेदभावपूर्ण व दमनकारी कानून बदल दिए गए हैं और उनको उदार व मानवीय बनाया गया है।

पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 20 दिसम्बर, 2003 के महत्वपूर्ण निर्णय में मुस्लिम लड़कियों को अपनी मर्जी से विवाह करने की स्वतंत्रता प्रदान की है किन्तु हमारे देश में अल्पसंख्यकों के संरक्षण के नाम पर आज भी महिलाओं को अन्याय, दमन व पीड़ा सहनी पड़ रही है। वस्तुत: आज सभी संप्रदायों के निजी कानून पुरुष प्रधान हैं। हिन्दुओं में पिता की सम्पत्ति में पुत्री का कोई अधिकार नहीं है। फलस्वरूप अनेक स्त्रियों को दहेज न मिलने पर जला दिया जाता है या मार दिया जाता है। मुसलमानों में पुरुष की गवाही दो महिलाओं की गवाही के बराबर मानी जाती है। ईसाइयों में कोई भी स्त्री अपने चरित्रहीन पति को तलाक नहीं दे सकती, क्योंकि ईसाई निजी कानून में चरित्रहीनता तलाक का कोई कानूनी आधार नहीं है। पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना के आग्रह पर 1937 में मुसलमानों के लिए अलग से शरीयत कानून बना जिसके परिणामस्वरूप द्विराष्ट्र सिद्धांत की नींव पड़ी और भारत का दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन हो गया। इस अधिनियम में यह भी प्रावधान किया गया है कि जो मुसलमान इस कानून को बाध्यकारी स्वीकार करने के लिए राज्य के सम्बंधित अधिकारी को यह शपथपत्र देगा कि वह और उसके वारिस इस कानून (शरीयत) को अनिवार्य रूप से मानने के इच्छुक हैं, तभी शरीयत कानून उस मुसलमान और उसके परिवार पर लागू होगा। अत: शरीयत का कानून पूर्णतया ऐच्छिक है, बाध्यकारी नहीं।

अनेक मुस्लिम विद्वानों, उलेमाओं तथा विधिवेत्ताओं ने शरीयत कानून के प्रचलित रूप का विरोध करते हुए इसमें संशोधन करने की मांग की है। डा. मोहम्मद इकबाल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक- "द रिकन्सट्रक्शन आफ रिलीजियस थाट इन इस्लाम' में लिखा है कि "कुरान और शरिया की इन व्याख्याओं को अटल नहीं माना जा सकता। अफगानिस्तान व सीमाप्रान्त के पठान शरिया को कम और पश्तूनवाली को अधिक अनुकरणीय मानते हैं। मेमन, वोहरे, खोजा तथा मेव मुसलमान इस्लाम पूर्व अपने कानूनों के तहत अपनी निजी जिंदगी चलाते रहे हैं।'

प्रख्यात मुस्लिम नेता व मनीषी डा. रफीक जकारिया के शब्दों में- "इस्लाम में बहुपत्नीवाद एक अपवाद है, कोई नियम नहीं। कुरान के रचयिता ने स्पष्ट लिखा है कि एक मुसलमान चार पत्नियां रख सकता है, लेकिन उसी स्थिति में जब उन चारों से एक समान व्यवहार करे, उन्हें एक समान प्यार दे, लेकिन कुरान की अगली ही आयत में लिखा गया है, लेकिन तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगे।'

प्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान डा. तारिक महमूद ने अपनी पुस्तक "मुस्लिम पर्सनल ला' में निजी कानून पर समान नागरिक कानून को वरीयता देते हुए लिखा है, "पंथनिरपेक्षता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राज्य को धर्म आधारित कानूनों के निर्माण पर रोक लगा देनी चाहिए और भारत के समस्त नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता बनानी चाहिए।' इसी प्रकार इस्लाम के अन्य विद्वानों व सुधारकों, यथा मौलवी इम्तियाज अली, मौलवी चिराग अली तथा न्यायमूर्ति आमिर अली ने मुसलमानों में प्रचलित त्रि तलाक घोषणा और बहुविवाह आदि कुप्रथाओं को बदलने का समर्थन किया है। उक्त विद्वानों का दावा है कि तीन बार मौखिक तलाक की घोषणा कुरान पर आधारित नहीं है, बल्कि कुरान की आयत- 4:35 में तो परस्पर सहमति से ही तलाक का प्रावधान है।

संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डा. भीमराव अम्बेडकर ने 23 नवम्बर, 1948 को संविधान सभा में समान नागरिक संहिता पर हुई बहस के दौरान कहा था, "हमारे देश में मानवीय सम्बंधों के प्राय: प्रत्येक पहलू को प्रभावित करने वाले कानूनों की एक समान दंड संहिता है, जो "भारतीय दंड संहिता' तथा "अपराध दंड संहिता' में निहित है। ऐसे अनेक अधिनियमों का उल्लेख किया जा सकता है जिनसे यह सिद्ध हो जाएगा कि देश में एक नागरिक संहिता मौजूद है, जो पूरे देश में व्यवहार में लायी जाती है। जिन क्षेत्रों में समान नागरिक संहिता अभी तक प्रवेश नहीं कर पायी है, वे हैं-विवाह और उत्तराधिकार। अत: सभी नागरिकों के लिए भले ही वे किसी भी पंथ के हों, एक समान नागरिक संहिता बनाने के उद्देश्य से यह समझा गया है कि कुछ हिन्दू कानूनों का, इसिलए नहीं कि वे हिन्दू कानून हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें सबसे अधिक उपयुक्त पाया गया, अनुच्छेद 35 में उल्लिखित नई समान नागरिक संहिता में समाविष्ट किया जाए।'

इसी अवसर पर प्रख्यात कानूनविद् तथा प्रकाण्ड विद्वान श्री अल्लादि कृष्णा स्वामी अय्यर ने संविधान सभा में कहा था, "जैसा कि कहा गया है एक नागरिक संहिता का सम्बंध नागरिक विषयक समूचे चक्र से है अर्थात् संविदा-विधियों, संपत्ति-विधि, उत्तराधिकार विधि, विवाह विधि और इस प्रकार अन्य विधियों से है। इसलिए समान नागरिक संहिता सम्बंधी सामान्य कथन पर कैसे आपत्ति की जा सकती है। दूसरी आपत्ति यह है कि यदि एक समान नागरिक संहिता लागू कर दी गई तो धर्म खतरे में पड़ जाएगा और सभी समुदाय मित्रता व सौहार्द से नहीं रह सकेंगे। यह आशंका बिल्कुल निराधार है। वास्तव में इस अनुच्छेद का उद्देश्य ही मित्रता और सौहार्द पैदा करना है, उन्हें नष्ट करना नहीं। मजहब के खतरे में पड़ने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।'

संविधान सभा में मूल अधिकारों के लिए एक समिति गठित की गयी थी। उस समिति के तीन विद्वान सदस्यों-श्री मीनू मसानी, श्रीमती हंसा मेहता और राजकुमारी अमृतकौर ने "समान नागरिक संहिता' को "मूल अधिकारों' की श्रेणी में रखने की जोरदार वकालत की थी तथा तीनों ने निम्नलिखित संयुक्त बयान भी दिया था-

"एक बात जिसने भारत को राष्ट्रत्व की ओर अग्रसर होने से रोक रखा है, वह यह है कि हमारे यहां धर्म- आधारित वैयक्तिक कानूनों की भरमार है, जिन्होंने राष्ट्र को विभिन्न रंगों अथवा रूपों में अलग-अलग कर रखा है। जिससे परस्पर आदान-प्रदान संभव नहीं है। हमारा मत है कि भारत के लोगों को संविधान लागू होने के 5 या 10 वर्ष की अवधि के अंदर एक समान नागरिक संहिता की गारंटी दी जानी चाहिए।'

संविधान सभा में इस मुद्दे पर बहस के दौरान कुछ मुस्लिम सदस्यों द्वारा यह आशंका प्रकट करने पर कि समान नागरिक संहिता का प्रावधान मुसलमानों के विरुद्ध है, डा. भीमराव अम्बेडकर ने इस आशंका को निर्मूल करार देते हुए कहा था, "मेरा दृढ़ वि·श्वास है कि किसी मुसलमान को कभी भी यह कहने का अवसर नहीं मिलेगा कि समान नागरिक संहिता के निर्माताओं ने मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को भारी आघात पहुंचाया है।' इस सन्दर्भ में श्री कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी द्वारा संविधान सभा में दिए गए अविस्मरणीय ऐतिहासिक भाषण को उद्धृत करना समीचीन होगा:-

"एक तर्क यह भी दिया गया है कि समान नागरिक संहिता बनाना अल्पसंख्यकों के प्रति निर्दयतापूर्ण व्यवहार होगा। किन्तु उन्नत मुस्लिम देशों में कहीं भी किसी अल्पसंख्यक समुदाय के निजी कानून को इतना परम पवित्र अथवा अनुल्लंघनीय नहीं समझा गया कि वहां नागरिक संहिता ही न बनाई जाए। तुर्की अथवा मिस्र का उदाहरण ले लीजिए इन देशों में किसी अल्पसंख्यक समुदाय को ऐसे पृथक व विशेष अधिकार प्राप्त नहीं हैं, जैसे भारतीय अल्पसंख्यकों को प्राप्त हैं। अगर आप यूरोप के उन देशों को देखें, जहां समान नागरिक संहिता लागू है तो आप पाएंगे कि वहां वि·श्व के किसी भी देश से कोई भी गैर ईसाई जाता है तो उसे वहां की नागरिक संहिता का पालन करना पड़ता है। वहां नागरिक संहिता का कानून किसी अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति निर्दयतापूर्ण नहीं माना जाता। बात वास्तव में यह है कि क्या आप अपने वैयक्तिक कानूनों को ऐसे ढंग से मजबूत व संगठित बनाना चाहते हैं, जिससे समूचे देश का जीवन समय रहते स्थिरता और पंथनिरपेक्षता के सूत्र में न बंधने पाए। हम ऐसी स्थिति में हैं, जब हमें धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप किए बिना हर तरीके से राष्ट्र में एकता की वृद्धि करके अपने राष्ट्र को मजबूत बनाना चाहिए।' (अगले अंक में जारी)

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