संस्कार


कन्हैयालाल चतुर्वेदी

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की जयंती (28 मई) पर विशेष

राजस्थान

रणबांकुरों की धरती

वीरों की भूमि है राजस्थान। यहां का इतिहास लिखने वाले प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टाड ने लिखा है कि राजस्थान की एक-एक इंच भूमि पर अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया गया है। बाप्पा रावल तथा उनके पुत्र खुमाण ने ईरान और अरब तक जाकर खलीफाओं का मान-मर्दन किया था। उसके बाद जब इस्लामी विदेशी आक्रान्ताओं ने भारत-भूमि पर अपने पैर जमाने शुरू किए तो राजस्थानी वीरों ने हर युद्ध में उनके दांत खट्टे किए। गजनी का महमूद जब मरुस्थल के रास्ते भारत में घुसा तो सीमा के प्रहरी घोघा-बापा मात्र आठ सौ रणबांकुरों के साथ उस पर टूट पड़े थे। घोघा-बापा की बहादुरी देख महमूद को पसीना आ गया।

कुटिलता, कपट तथा छल-बल में अंग्रेज मुसलमानों से कहीं आगे थे। प्लासी के युद्ध में विजय के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में अपनी जड़ें जमानी प्रारम्भ कर दीं। सन् 1805 में महाराजा सूरजमल के वंशज रणजीत सिंह ने भरतपुर के पास अंग्रेजों को धूल चटाई। राजा रणजीत सिंह के बाद महाराजा किशनसिंह भी अंग्रेजों से संघर्ष करते रहे।

सन् 1857 का स्वतंत्रता-युद्ध दूरगामी योजना, अद्भुत संगठन कौशल तथा उत्कृष्ट राष्ट्रभक्ति का परिणाम था। राजस्थान में भी "कमल और रोटी" का संदेश पहुंच चुका था। योजना के अनुसार 28 मई, 1857 को नसीराबाद की सैनिक छावनी में क्रांति का शंखनाद हुआ। 3 जून को नीमच की छावनी में भारतीय सैनिकों ने शस्त्र उठा लिए। इसी के साथ ब्यावर, देवली, एरिनपुरा (जोधपुर) तथा खैरवाड़ा की छावनियों में भी क्रांति की ज्वाला धधक उठी। शाहपुरा (भीलवाड़ा) नरेश भी क्रांतिकारियों के साथ हो गये। उधर कोटा में लाला जयदयाल और महराब खान ने कोटा की एक सैनिक टुकड़ी को साथ लेकर मेजर बर्टन को मार भगाया।

ऐरिनपुरा छावनी में अंग्रेजों की जोधपुर लीजन नाम की एक बटालियन थी। 21 अगस्त, 1857 को जोधपुर लीजन के नायक महरबान सिंह ने स्वतंत्रता का उद्घोष कर दिया। जोधपुर तथा सिरोही में अंग्रेजों का सफाया कर यह सेना आउवा की ओर चल पड़ी। आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत मारवाड़ क्षेत्र में संघर्ष के मुखिया थे। महान स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे से उनका सम्पर्क बना हुआ था। ठाकुर कुशाल सिंह के नेतृत्व में मुक्तिवाहिनी ने पश्चिमी राजस्थान को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए कूच कर दिया था। दिसम्बर तक जोधपुर के अतिरिक्त पूरा क्षेत्र आजादी के वातावरण में सांस लेने लगा। ठाकुर कुशाल सिंह ने अपनी सेना का एक बड़ा भाग दिल्ली के स्वतंत्रता सेनानियों की सहायता के लिए भेज दिया। अंग्रेजों ने मौका देख कुछ राष्ट्रद्रोही रजवाड़ों को साथ ले आउवा पर आक्रमण कर दिया। दुर्भाग्य से आउवा का किलेदार अंग्रेजों से मिल गया और उसने एक रात किले का दरवाजा खोल दिया। ठाकुर कुशाल सिंह किले के पिछवाड़े से निकल गये तथा बड़सू में मोर्चेबन्दी की। चालीस दिनों तक घोर संघर्ष हुआ, किन्तु आखिरकार अंग्रेजों को सफलता मिली।

उधर कोटा में स्थानीय रजवाड़ों की सहायता से अंग्रेजों ने स्वातंत्र्य योद्धाओं पर काबू पा लिया। जून 1858 में तात्या ने टोंक पर अधिकार कर लिया। टोंक से बूंदी, भीलवाड़ा तथा कांकरोली में अंग्रेजों को मात देते हुए वे झालरापाटन पहुंचे। झालावाड़ का राजा अंग्रेजों का साथी था किन्तु राज्य की सेना ने तात्या का साथ दिया और देखते-देखते स्वातंत्र्य सैनिकों ने झालावाड़ पर अधिकार कर लिया। इसके बाद तात्या टोपे इन्दौर की ओर निकल गये। दिसम्बर, 58 में वे फिर राजस्थान आए और बांसवाड़ा पर विजय पताका फहरा दी। अंग्रेज उनका पीछा कर रहे थे। तात्या टोपे बीस महीनों से घोड़े की पीठ पर थे। फिर भी बांसवाड़ा से इन्द्रगढ़, बैराठ, नीमकाथाना होते हुए सीकर पहुंच गए। सीकर में अंग्रेजों से उनकी आखिरी भिड़न्त हुई। इस समय उनके पास मात्र छह सौ सैनिक थे। कुछ सैनिकों को साथ ले वे अंग्रेजों की घेराबन्दी तोड़कर उत्तर प्रदेश के रास्ते नेपाल चले गए। तात्या के राजस्थान अभियान में सलूम्बर, शाहपुरा, कोठारिया तथा नरवर के ठिकानेदारों ने उनका साथ दिया। कई राजघरानों के सैनिक भी अपने राजा का विरोध कर तात्या के साथ हो गए।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के बाद भी देशभक्त निराश नहीं हुए। देश में कहीं न कहीं आजादी के प्रयत्न चलते रहे। जब रास बिहारी बोस की गदर पार्टी ने 21 फरवरी, 1915 के दिन पूरे देश में एक साथ क्रांति का उद्घोष करने की योजना बनाई तो राजस्थान में संगठन खड़ा करने के लिए इन्दौर के भूपसिंह को भेजा गया। भूपसिंह के सहयोगी बने खरवा ठाकुर गोपाल सिंह। ब्यावर के दामोदरदास राठी तथा कोटा के गोपाललाल कोटिया भी क्रांतिकारी भूपसिंह के साथ सशस्त्र क्रांति की योजना की सफलता के लिए जुट गए। दुर्योग से समय से पहले इस योजना का भेद खुल गया तथा देशभर में क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू हो गई। खरवा ठाकुर तथा दामोदरदास राठी भी बन्दी बनाकर टाटगढ़ जेल भेज दिए गए। भूपसिंह अंग्रेजों को चकमा देने में सफल हो गए तथा वेश बदल कर भाणा गांव में बच्चों को पढ़ाने लगे। उन्होंने अपना नाम बदल कर विजय सिंह पथिक रख लिया। बाद में वे कांग्रेस से जुड़ गए और कई आन्दोलनों में प्रमुख भूमिका निभाई। "राजस्थान केसरी" नाम से एक समाचार पत्र भी पथिक जी ने प्रारम्भ किया।

क्रांतिकारियों ने "हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक सेना" का गठन किया। शचीन्द्रनाथ सान्याल इसके प्रमुख थे। उन्हें काले पानी की सजा होने के बाद चन्द्रशेखर आजाद इसके प्रमुख बने। आजाद ने कुन्दनलाल गुप्त को राजस्थान के युवकों में देशभक्ति जगाने का काम सौंपा। क्रांतिकारी कुन्दल लाल ने भी अजमेर से ही काम शुरू किया। अजमेर के रामचन्द्र बापट, रुद्रदत्त मिश्र, ज्वाला प्रसाद तथा शम्भू नारायण आदि क्रांतिकारी दल के प्रमुख सदस्य बन गये। जयपुर के वैद्य मुक्तिनारायण भी क्रांतिकारियों से जुड़ गए। 1932 में अजमेर के जिला न्यायालय में रामचन्द्र बापट ने अत्याचारी पुलिस प्रमुख गिब्सन पर गोलियां दागीं। बापट पकड़े गए और उन्हें दस साल की जेल हो गई। अंग्रेजों को भारत से बाहर करने का निर्णायक प्रयत्न 1942 में "भारत छोड़ो आन्दोलन" के साथ शुरू हुआ। देश के अन्य भागों की तरह राजस्थान में भी तिरंगे के लिए जान पर खेल जाने की भावना उमड़ पड़ी। बीकानेर में 28 अगस्त, 1942 को हाथ में तिरंगा लिए लक्ष्मण सिंह अंग्रेज पुलिस की गोलियों से शहीद हो गए। इसके पहले जोधपुर जेल में अपने अधिकारों के लिए आमरण अनशन पर बैठे बालमुकुन्द बिस्सा ने 19 जून को अपना जीवन-पुष्प मातृभूमि के चरणों में चढ़ा दिया।

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