हिन्दूभूमि


सांख्य-दर्शन

सुरेश सोनी

दार्शनिक चिंतन और वैज्ञानिक विश्लेषण में सांख्य दर्शन का स्थान अप्रतिम है। महामुनि कपिल इसके प्रवर्तक माने जाते हैं। भागवत पुराण में कपिल मुनि को अवतार माना गया तो गीता में भगवान कहते हैं- सिद्धों में मैं कपिल हूं।

सांख्य-दर्शन पर ईश्वर कृष्ण ने सांख्य-कारिका लिखी। वाचस्पति मिश्र ने सांख्य-कारिका पर टीका लिखी। इसमें महामुनि कपिल तथा उनके शिष्य ने आसुरि पंचशिख नामक आचार्य की वंदना की है परन्तु इनकी कोई रचना आज नहीं मिलती है।

सांख्य-दर्शन आत्यन्तिक दु:ख निवृत्ति को ही जीवन का ध्येय मानता है।

संख्या का विश्लेषण होने से शायद इसे सांख्य कहा गया है। दूसरा प्रकृति व पुरुष के सम्यक् ज्ञान के अर्थ में भी सांख्य कहा गया है। अत: संख्या और ज्ञान दोनों अर्थों का प्रतिपादन करते हुए महाभारत में कहा गया है-

संख्यां प्रकुर्वन्ते चैव, प्रकृतिं च प्रचक्षते।

तत्वानि च चतुर्विंशत्, तेन सांख्यं प्रकीत्र्तितम्।।

सांख्य-दर्शन सार - सांख्य की दृष्टि में दो मूलभूत तत्व हैं एक पुरुष तथा दूसरा प्रकृति। इस प्रकार सांख्य द्वैतवादी है। इसमें पुरुष स्वतंत्र सत्ता है तथा चेतन है एवं प्रकृति के अन्तर्गत 24 तत्व माने गये हैं। सृष्टिरचना की व्याख्या करते हुए सांख्य दर्शन में प्रतिपादित किया गया कि प्रकृति पहले अव्यक्त अवस्था में रहती है। यह प्रकृति त्रिगुणात्मक है। चेतन पुरुष के संसर्ग से प्रकृति में विक्षोभ होता है और प्रकृति की साम्यावस्था टूटती है और प्रकृति अव्यक्त से व्यक्त होने लगती है। यह व्यक्त होने की प्रक्रिया सूक्ष्म से स्थूल की ओर होती है। पहला विकार महत्तत्व या वैश्विक बुद्धि होता है। महत्तत्व से अहंकार, अहंकार से एक ओर मन तथा पांच ज्ञानेन्द्रियां व पांच कर्मेन्द्रियां उत्पन्न होते हैं, तो दूसरी ओर पांच तन्मात्रायें। इन पांच तन्मात्राओं से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश रूप पंच महाभूत उत्पन्न होते हैं और मन, इन्द्रिय तथा पंच महाभूतों के संयोग से सारी सृष्टि बनती है। जिस क्रम से ये उत्पन्न होते हैं उसी क्रम से लय होते हैं और उत्पत्ति और लय का यह क्रम चलता रहता है। इस प्रकार सांख्य के अनुसार सम्पूर्ण जगत् पुरुष तथा प्रकृति के 24 तत्वों का खेल है।

सांख्य और आधुनिक विज्ञान - सांख्य की दूसरी विशेषता है अव्यक्त से व्यक्त सृष्टि बनने की वैज्ञानिक व्याख्या। आधुनिक विज्ञान जगत के अंतिम सत्य की खेाज में चला तो पहले उसने माना जगत तत्वों से बना है जिनकी संख्या 92 है। आगे चलकर डाल्टन नामक वैज्ञानिक ने कहा सभी तत्व परमाणुमय हैं। अत: परमाणु अंतिम है। फिर रदरफोर्ड, नील्स बोर, जेम्स चैडविक आदि वैज्ञानिकों ने प्रयोगों से प्रतिपादित किया कि परमाणु छोटे-छोटे कणों से बना है। ये कण इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रान हैं। ये कण और भी अधिक संख्या में ध्यान में आये और आज माना जाता है कि एक परमाणु में 200 से ज्यादा प्रकार के कण हैं। ये छोटे-छोटे ऊर्जा पुंज हैं इनका रहस्य दुर्बोध है। इसी आधार पर हाइजेनबर्ग ने "थ्योरी आफ अनसर्टेन्टी", अर्थात् अनिश्चितता का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस समूची प्रक्रिया में वैज्ञानिकों के ध्यान में आया कि मात्र एक ऊर्जा पुंज की रचना को हम नहीं जान सकते, परन्तु ये ऊर्जा पुंज समूह में व्यवहार करते हैं और तब उनकी कुछ विशेषता होती है। यह विशेषता है आकर्षण, विकर्षण तथा उदासीन। किसी भी प्रकार का पुंज हो इसमें इन तीन विशेषताओं में से कोई विशेषता जरूर रहेगी। अत: यह सम्पूर्ण जगत आकर्षण, विकर्षण और उदासीनता का खेल है।

सांख्य-दर्शन ने हजारों वर्ष पूर्व जो बात प्रतिपादित की थी उसे ही आज का विज्ञान सिद्ध कर रहा है। सांख्य कहता है कि प्रकृति, जिससे यह सारा जगत उत्पन्न होता है, त्रिगुणात्मक है। जब सृष्टि अव्यक्त रहती है तब तीनों गुण साम्यावस्था में रहते हैं, अर्थात् स्पंदन नहीं होता। अत: इसका वर्णन करते हुए सांख्य का सूत्र है-

सत्व-रजस्-तमसां साम्यावस्था प्रकृति:। (सांख्य-1-61)

पुरुष जो चेतन है इसके संसर्ग से प्रकृति में विक्षोभ होता है और साम्यावस्था भंग होती है और तीनों गुण सक्रिय होते हैं। यहां यह विचारणीय है कि सांख्य ने इन्हें गुण कहा है। कण अथवा तरंग नहीं। कारण वे जानते थे कि इनकी आन्तरिक रचना जानना दुर्बोध है। अत: उन्होंने रचना का नहीं विशेषता का वर्णन किया है।

सांख्य दर्शन कहता है- "राग विरागयोर्योग: सृष्टि" अर्थात् आकर्षण और विकर्षण के योग से सृष्टि बनती है। इस प्रकार सांख्य ब्राह्माण्ड का वैज्ञानिक विवेचन करता है। वह यह बताता है कि चेतन पुरुष और जड़ प्रकृति के संयोग और पार्थक्य से जगत की रचना और लय चलता रहता है। इस प्रकार सांख्य द्वैतवादी है।

परिणामवाद - सांख्य दर्शन परिणामवाद को मानता है। परिणामवाद का तात्पर्य है बिना कारण के कोई कार्य नहीं हो सकता अत: परिणामवादियों की मान्यता है कि प्रत्येक कार्य का कोई कारण होता है।

सांख्य-दर्शन का अन्तिम लक्ष्य भी मोक्ष है। उनके हिसाब से मनुष्य तीन प्रकार के दु:खों से पीड़ित रहता है। 1. आध्यात्मिक दु:ख-काम, क्रोधादि विकारों से उत्पन्न दु:ख। 2. आधिदैविक दु:ख-अतिवृष्टि, अनावृष्टि एवं ऐसे ही अन्य कारण। 3. आधिभौतिक दु:ख - युद्ध होना, कृषि नष्ट होना या अन्य ऐसे ही कारण।

सभी प्रकारों के दु:खों से मुक्ति हेतु आवश्यक है पुरुष और प्रकृति के पार्थक्य का ज्ञान होना। जब मनुष्य यह जान लेता है कि चेतन पुरुष अलग है तब वह सब दु:खों से परे जाकर मोक्ष को प्राप्त करता है। यही संक्षेप में सांख्य दर्शन है।

(पाक्षिक स्तम्भ)

(लोकहित प्रकाशन, लखनऊ द्वारा प्रकाशित पुस्तक "हमारी सांस्कृतिक विचारधारा के मूल स्रोत" से साभार।)

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