डूबती टिहरी


ज्योतिषियों ने टिहरी शहर की स्थापना के समय ही भविष्यवाणी कर दी थी कि शहर जलमग्न होगा

एक शहर जो बना इतिहास

- राम प्रताप मिश्र

190 वर्ष पूर्व 28 दिसम्बर, 1815 को प्रात: 11 बजे जब महाराजा सुदर्शन शाह ने भागीरथी और भीलंगना नदी के किनारे टिहरी शहर की नींव रखी थी, तब सम्भवत: किसी को यह अनुमान नहीं होगा कि एक दिन यह शहर जल समाधि ले लेगा। बड़े बुजुर्गों की मानें तो उसी समय महाराजा सुदर्शन शाह को कुछ ज्योतिषियों ने बताया था कि नगर की स्थापना का यह मुहूर्त शुभ नहीं है, यह नगर एक दिन जलमग्न हो जाएगा। लेकिन राजा को ज्योतिषियों की भविष्यवाणी जंची नहीं और उन्होंने टिहरी को अपने राज्य की राजधानी बना लिया। इतिहास में टिहरी को गणेश प्रयाग, धनुषतीर्थ के नाम से जाना जाता था। वैसे इसका मूल नाम "त्रिहरि" था, जो अपभ्रंश होकर टिहरी हो गया। यह नगर प्रारम्भ से ही धन-धान्य से सम्पन्न था। सन् 1903 में जब देश में केवल मुम्बई में बिजली की व्यवस्था थी, तब टिहरी ही ऐसा शहर था जहां के लोग बिजली का उपयोग करते थे। यहां विद्युत उत्पादन उसी समय से हो रहा है। क्या मालूम था, देश को बिजली देने के लिए इस शहर को एक दिन अपनी ही बलि देनी पड़ेगी। सन् 1873 में महाराजा प्रताप शाह ने यहां शिक्षा की उत्तम व्यवस्था करते हुए पहला हाई स्कूल स्थापित किया। सन् 1897 में इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया की हीरक जयन्ती के अवसर पर महाराजा कीर्तिशाह द्वारा यहां घण्टाघर का निर्माण कराया गया, जिसमें ब्रिटेन से मंगाई गई घड़ियां लगायी गर्इं। सन् 1919 में महाराजा कीर्तिशाह ने टिहरी में भव्य राजमहल का निर्माण कराया। अनेक नए मंदिर भी स्थापित हुए, जिनमें बदरीनाथ मंदिर, केदारनाथ मंदिर, गरुड़नाथ मंदिर प्रमुख हैं। सर्दियों में बद्री-केदार धाम के कपाट बन्द होने पर भगवान की नित्य पूजा-अर्चना यहीं सम्पन्न होती थी। सन् 1906 में देश के प्रख्यात संत स्वामी रामतीर्थ ने भीलंगना नदी में पद्मासन लगाकर महाप्रयाण किया था, तब से स्वामी रामतीर्थ की समाधिस्थली के रूप में भी टिहरी शहर जाना जाता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, उनके गुरुभाई स्वामी अखण्डानन्द का भी टिहरी से अत्यंत लगाव था। सन् 1903 में टिहरी नगर पालिका का गठन हुआ। इस प्रकार कुल 190 वर्षों तक देश-दुनिया में चर्चित रहने वाला यह शहर चर्चा में रहते-रहते ही विकास की भेंट चढ़ गया। शहर के निर्माण के बाद से इस पर पवार राजवंश के 6 राजाओं ने शासन किया। इनमें महाराजा सुदर्शन शाह, भवानी शाह, प्रताप शाह, कीर्ति शाह, नरेन्द्र साह और अन्तिम महाराजा मानवेन्द्र शाह हुए, जो भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं। सन् 1919 में महाराजा कीर्तिशाह ने ज्योतिषियों की भविष्यवाणी पर विश्वास करते हुए अपनी राजधानी को नरेन्द्र नगर स्थानांतरित कर दिया।

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