उम्र के 75वें वसंत के अवसर पर पं. जसराज कहते हैं-


जीवन "उसको" सौंप दिया और

बस, यूं ही चलते चले गए

-विनीता गुप्ता

"रानी तेरो चिरजियो गोपाल...." 28 जनवरी, 2005 की भोर से ही "रसराज" कहे जाने वाले संगीत मात्र्तण्ड पं. जसराज के चाहने वालों के होठों पर उनके इस भजन के बोल तैर रहे थे। "रसराज" जसराज ने ऋतुराज की दस्तक के साथ ही अपने जीवन के 75 सोपान तय किए। 75 दीपों की मालिका के साथ दिल्ली के कमानी सभागार में पंडित जसराज के ज्योतिर्मय जीवन की कामना की गई। पांच साल पहले जब पंडित जी के हृदय की शल्य चिकित्सा हुई थी, तब सबको लगता था कि पता नहीं, उनके मधुर स्वरों की गंगा उसी प्रकार प्रवाहित होती रहेगी या फिर....। पंडित जी के शब्दों में, "वह तो बिल्कुल वैसा ही था, जैसे किसी सितार के तारों में जंग लग जाए और फिर आप उन तारों को बदल दें या मिट्टी के तेल में रुई डुबोकर साफ कर दें। "बाईपास सर्जरी" से पहले कुछ तकलीफें रहती थीं, उसके बाद सब एकदम निर्मल जल-सा हो गया।" 29 जनवरी को पंडित जसराज अपने अभिनंदन में आयोजित समारोह के लिए दिल्ली पधारे थे। इस अवसर पर प्रशंसकों से घिरे पंडित जी से उनकी जीवन-यात्रा के अनुभव जानने चाहे तो थोड़ा गंभीर होकर बोले, "सोचता हूं कि आज अगर 35 बरस का होता और 75 बरस के ये अनुभव साथ होते, और उससे आगे 35 बरस की यात्रा करता तो कितना फर्क होता। संगीत के प्रति यही भावनाएं, श्रद्धा और भक्ति होती तो जीवन कितना धन्य होता।"

यह पूछने पर कि 75वर्ष की आयु पूर्ण होने पर कैसा महसूस कर रहे हैं? वे तपाक से कहते हैं, "भई आप बार-बार मुझे क्यों याद दिला रहे हैं कि मैं बूढ़ा हो गया हूं। मैं हमेशा की तरह मस्त हूं।"

हल्के पीले रंग के रेशमी कुर्ते में चमकते नगदार छोटे-छोटे फूल वाले बटन और लाल किनारीदार रेशमी धोती में पंडित जी के मुखमण्डल की आभा और निखर आई थी। लम्बे- सफेद बालों को हाथों से संवारती हैं कुर्सी के पीछे खड़ी उनकी बेटी दुर्गा। पंडित जी यादों में डूबकर बताते हैं, "लोगों का इतना प्यार, श्रद्धा और सम्मान मिला, यह ईश्वर की कृपा है। मेरा अपना किया कुछ नहीं है। धरातल पर लेटा एक आदमी आसमान पर पहुंच जाए, यह कैसे संभव हो सकता है। मैं तो इसे ईश्वर का करिश्मा ही मानता हूं।"

पंडित जी वे दिन कभी नहीं भूलते जब अपनी बीमार मां की दवाई लाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। वे घरों में संगीत सिखाने जाया करते थे। जसराज से पंडित जसराज तक की यात्रा भी रोचक है। हरियाणा के हिसार जिले के पीली मंदौरी गांव में पं. मोतीराम जी के अति साधारण से घर में जन्मे बालक जसराज को बचपन से ही सुर-ताल का ज्ञान था। उसका स्वर कैसा है, यह तो लोगों के सामने नहीं आया लेकिन इस बालक का हाथ तबले पर खूब चलता था। अपने बड़े भाई और गुरु पं. मणिराम के गायन के समय तबले पर यही संगत करते थे। 15-16 साल के थे तो परिवार कलकत्ता चला गया। जसराज तबला ही बजाते थे, कभी गाने के बारे में, पढ़ाई के बारे में सोचा नहीं। पंडित जी बचपन की ओर लौटते हुए बताते हैं, "हमसे सब लोग कहते थे- रियाज करो। तब हम भी कह देते थे, हम तो खानदानी उस्तादों के घर के हैं, भाई गुरु हैं और घर के लोगों को रियाज की क्या जरूरत है। वह जमाना था जब उस्ताद, संगीतकार के घर में बेटा कभी रियाज नहीं करता था...."। पंडित जी का यह वाक्य पूरा होने से पहले ही वहीं बैठी श्रीमती सोम तिवारी, जिन्हें वह अम्मां कहते हैं, बोल पड़ती हैं, "जसराज कभी रियाज नहीं करता था। पन्द्रह-सोलह साल की उम्र में उससे मुलाकात हुई थी। कहता था, भई तुम लोग रियाज करो, हम तो उस्तादों के घर के हैं। लेकिन हमने टोकना बंद नहीं किया, क्योंकि यह वैसे तो गाते नहीं थे, लेकिन कभी-कभी जब गुनगुनाते थे, तो लगता था वह बहुत क्षमतावान हैं।" इस बात पर पंडित जी को अपना इक्कीसवां जन्मदिन याद आ जाता है जब "अम्मां" श्रीमती (सोम तिवारी) ने उपहार के रूप में स्वेटर बुनकर दिया था, लेकिन "रिटर्न गिफ्ट" के रूप में खुद भी उपहार मांगा था। "अम्मां" कहती हैं, "हमने कहा, तुम भी हमें उपहार दो। तब जसराज बोले, "हम क्या दे सकते हैं, हमारे पास तो कुछ है नहीं।" तब हमने कहा, हम वही मांगेंगे जो तुम दे सकोगे। तुम रियाज किए बिना घर से निकलोगे नहीं। बस! यही उपहार होगा।"

इसका क्या असर हुआ? पूछने पर पंडित जसराज कहते हैं, "रियाज का सिलसिला। रोज सुबह चार बजे उठकर पांच घंटे गाना। फिर अम्मा के साथ गाना। शाम को फिर पांच-छह घंटे गाना। कुल मिलाकर चौदह घंटे गाना ही गाता था।" और आज गायन में कीर्तिशिखर छूने वाले पंडित जसराज कितनी देर अभ्यास करते हैं, "दो-ढाई घंटे तो करता हूं। वैसे तो अब सारे ही दिन गाना चलता रहता है, क्योंकि अब बड़ा-सा तानपूरा लेकर बैठना नहीं पड़ता। इलेक्ट्रानिक तानपूरा बजता रहता है और मैं सुरों में खोया रहता हूं।"

अपनी गायकी के बल पर उन्होंने देश-विदेश में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया और भारतीय शास्त्रीय संगीत को लोगों के बीच पहुंचाया। पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण सम्मानों के अतिरिक्त लोगों का प्यार और सम्मान मिला। पिछले दिनों उन्हें पुरी मंदिर में संगीत सप्त सिंधु सम्मान दिया गया। यही नहीं, उनके नाम से पं. जसराज गौरव पुरस्कार भी दिया जाने लगा है। पुणे के पं.जसराज मित्र मंडल की ओर से गत 11-12 जनवरी को 15वां पं. जसराज गौरव पुरस्कार उस्ताद राशिद खां और अश्विनी भिड़े को दिया गया।

कला जगत ने पंडित जसराज को कितना प्रेम दिया, इसका उदाहरण है 28 जनवरी को मुम्बई में उनके जन्मदिन समारोह में कला जगत के नामी गिरामी सितारों का आगमन। स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, आशा भौंसले, पं. शिवकुमार शर्मा, पं. हरिप्रसाद चौरसिया, शबाना आजमी, चित्रकार एम. एफ. हुसैन आदि उन्हें बधाई देने पहुंचे तो अगले दिन दिल्ली के कमानी सभागार में पं. रविशंकर और उस्ताद अमजद अली खां ने पुष्पहार पहनाकर पंडित जसराज की दीर्घायु की कामना की।

पंडित जी कहते हैं, "ईश्वर संगीतकार को सबसे ज्यादा प्यार करता है। जब भी गाना गाता हूं, भगवान को समर्पित करके गाता हूं और हमेशा अनुभव होता है कि चाहे थोड़े समय के लिए ही आए, लेकिन वह मेरा गाना सुनने जरूर आता है। जो भी ईश्वर को याद करके गाना गाता है ईश्वर उसका गाना जरूर सुनता है। मैं श्रोताओं में भी ईश्वर का अंश देखता हूं।"

"अखिलम् मधुरम्, मधुरम् मधुरम्, मधुराधिपते....", "गोविन्द दामोदर माधवेति....", "मेरो अल्लाह मेहरबान.....""ओम् नमो भगवते वासुदेवाय...." जैसे भजनों के अलौकिक सुर-संसार की सृष्टि करने वाले शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के भीतर स्वर-संसार के अलावा भी क्या कुछ पैठता है? इस प्रश्न के उत्तर में उनका चेहरा खिल जाता है, "हां सुरों के अलावा भीतर पैठता है-खेल। खेल चाहे जो भी हो मुझे बहुत अच्छा लगता है।"

खेलों में ऐसा क्या है? जवाब देते हुए वह चहक उठते हैं, "खेलों में मैं संगीत ढूंढ़़ता हूं।" जब जंगल में जाता हूं तो पेड़ों से गुजरती हवा में संगीत पाता हूं। चिड़ियों की चहचहाहट में संगीत सुनता हूं।"

भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं? प्रश्न सुनकर पलभर को वे गंभीर हो जाते हैं और फिर उसी आनंद की रौ में बहते हुए कहते हैं, "आज तक न तो मैंने कोई योजना बनाई, न आगे का सोचा। योजना बनाने वाले हम कौन होते हैं, योजना तो भगवान बनाता है। जब बहुत सोच-सोचकर योजना बनाते थे तब कुछ हुआ नहीं। क्या सोचा था कि हरियाणा के पीली मंदौरी गांव से हम कहां-कहां पहुंच जाएंगे। शिक्षा के नाम पर "अम्मां" से जो सीखा, वह सीखा, वरना बेगम अख्तर का गाना "दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे, वरना कहीं तकदीर तमाशा न बना दे....." ही सुनता रहता था। गंधर्व महाविद्यालय के भाई जी (श्री विनय चंद्र मुद्गल), अम्मां (श्रीमती सोम तिवारी) व गुरु. पं. मणिराम जी ने धक्का दे-देकर यहां तक पहुंचा दिया। और फिर अगर मैं खुद सोचकर ही करता तो खुद को संगीतकार ही क्यों बनाता, कुछ और बना लेता। खुद को प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बनाता, शासन करता, संगीतकार ही क्यों बनता। ईश्वर ने मुझे इसी रूप में भेजा, यह उसकी योजना थी।" कोलकाता में जैसे-तैसे जीवन चल रहा था, तभी शांताराम (पंडित जसराज के श्वसुर) ने उन्हें मुम्बई बुलाया। उस दौर को याद करते हुए श्रीमती सोम तिवारी कहती हैं, "जसराज मुम्बई जाना नहीं चाहते थे। कहते थे, घर जंवाई बनकर नहीं रहूंगा। हम सब लोग चाहते थे कि वह मुम्बई जाएं। जिस दिन जाना था, उस दिन भी बोले, "बस एक बार कह दो-मत जाओ, तो हम रुक जाएंगे।" लेकिन हम सबकी जिद से बड़े बेमन से ही वह मुम्बई चले गए।" जैसे कीर्ति शिखर पर पहुंचने के लिए पगडंडियां तैयार हो रही थीं।

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