मंथन


बंग-भंग से स्वदेशी तक-2

आहत बंगाल ने उठाया बहिष्कार का शस्त्र

देवेन्द्र स्वरूप

देवेन्द्र स्वरूप

सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ठीक ही लिखा है कि "बंगाल विभाजन की संशोधित योजना गुप्त रूप में सोची गई, उस पर पर्दे के पीछे गुप्त चर्चाएं हुईं और उस पर गुप्त रूप से निर्णय लिया गया। जनता को उसकी भनक तक नहीं लगने दी गई। हमने स्वयं को अपमानित, लांछित और ठगे जाने की स्थिति में पाया।" 11 दिसम्बर, 1903 में भारत सरकार के मुख्य सचिव एच.एच. रिस्ले के एक पत्र में बंग-भंग की पहली योजना प्रकाश में आई थी, जिसमें केवल चटगांव विभाग, ढाका और मैमनसिंह के जिलों को बंगाल से अलग करके असम के साथ जोड़ने का प्रस्ताव था। किन्तु इस पत्र के प्रकाशन से बंगाल में स्वयंस्फूर्त विरोध की आग फैल गई। कलकत्ता और अन्य नगरों में 500 से अधिक जनसभाओं में विरोध का स्वर उठा। लाखों की संख्या में पम्फलेट अलग-अलग शब्दावली और तर्कों के साथ वितरित हुए। बंगाल के नरमदली नेता भी ब्रिटिश सरकार के विरोध में खड़े हो गए। इस व्यापक विरोध को देखकर कर्जन स्तब्ध रह गया। उसने लिखा "मैंने अपना अभिमत केवल सरकार के उच्चाधिकारियों की जानकारी के लिए लिखा था। वह सार्वजनिक प्रकाशन के लिए नहीं था। मैंने सोचा भी नहीं था कि मेरे विचार अखबारों तक पहुंच जाएंगे। जो बात मैं परिषद में खुले मन से कह सकता हूं उसका चौराहों पर ढिंढोरा पीटना उचित नहीं था।"

बंगाल के व्यापक जन-विरोध से घबरा कर ब्रिटिश सरकार ने अब बंग-भंग के अपने षडंत्र पर चुप्पी का पर्दा डाल दिया। पर भीतर ही भीतर उस योजना का विस्तार होता रहा। एक के बाद एक दूसरे जिलों को बंगाल से अलग करने के गुप्त सुझाव मिलते रहे और अन्ततोगत्वा 3 करोड़ जनसंख्या वाले "पूर्वी बंगाल एवं असम" नामक एक विशाल प्रान्त की रूपरेखा भीतर ही भीतर तैयार कर ली गई। बंगाल को उसकी पहली भनक तब लगी जब मई, 1905 में इंग्लैण्ड के एक पत्र "स्टैण्डर्ड" ने प्रकाशित किया कि अपुष्ट सूत्रों के अनुसार बंग-भंग की योजना को अंतिम रूप दिया जा चुका है और उस पर शीघ्र ही निर्णय घोषित होगा। इस समाचार के प्रकाशित होते ही बंगाल में हस्ताक्षर संग्रह का अभियान प्रारम्भ हो गया। ब्रिटिश सरकार को तार दिया गया कि बंग-भंग के बारे में कोई भी निर्णय लेने के पूर्व वे बंगाल की भावनाओं और सुझावों को व्यक्त करने वाली इस हस्ताक्षरयुक्त याचिका की प्रतीक्षा करें। ब्रिटिश हाउस आफ कामन्स में 5 जून, 1905 को यह विषय उठाने पर भारत-सचिव ब्राोडरिक ने गोलमोल उत्तर दिया कि भारत सरकार ने कोई प्रस्ताव भेजा तो है पर अभी वह विचाराधीन है। एक माह बाद 4 जुलाई को पुन: हाउस आफ कामन्स में पूछा गया कि क्या सरकार बंगाल की हस्ताक्षरयुक्त याचिका की प्रतीक्षा करेगी तब ब्राोडरिक ने पहली बार स्वीकार किया कि भारत सरकार का प्रस्ताव उन्हें 18 फरवरी, 1905 को प्राप्त हो गया था और उनकी सरकार ने अपना मत भारत सरकार को सूचित कर दिया है। काफी बाद में प्रकाशित "बंग-भंग दस्तावेजों" से विदित हुआ कि यह निर्णय 9 जून को ही भारत सरकार को मिल चुका था। किन्तु बंगाल की जनता के लाख सर पटकने पर भी मार्च, 1904 से जुलाई, 1905 तक गुप्त रूप से पक रही विभाजन की इस खिचड़ी की भनक नहीं लगने दी गई।

बंग भंग और स्वामी विवेकानंद

हाउस आफ कामन्स में 4 जुलाई को हुआ रहस्योद्घाटन 6 जुलाई के बंगाल के अखबारों में छपा। 7 जुलाई को शिमला में वायसराय भवन से इसकी अधिकृत घोषणा कर दी गई। बंगाल इस राष्ट्रीय अपमान से तिलमिला उठा। डेढ़ वर्ष लम्बे उसकी शान्तिपूर्ण संवैधानिक चीख पुकार को ब्रिटिश सरकार ने अनसुना कर दिया। शायद इसके पीछे बंगाली चरित्र के बारे में अंग्रेजों का यह मूल्यांकन काम कर रहा था कि बंगाली दिमाग से भले ही तेज हों पर वह शौर्यवृत्ति से शून्य है। वे शोर मचा सकते हैं पर संघर्ष के मैदान में नहीं उतर सकते। चुनौती सामने खड़ी थी। अब समय आ गया था कि बंगाल अंग्रेजों की इस भ्रान्त धारणा को गलत सिद्ध करे। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी के नरमदली अखबार "बंगाली" ने पहले ही दिन ब्रिटिश सरकार की इस चुनौती को स्वीकार करने की घोषणा कर दी। "बंगाली" ने लिखा कि "ब्रिटिश सरकार इस खुशफहमी में न रहे कि देश इस राक्षसी योजना को बिना किसी संघर्ष के चुपचाप स्वीकार कर लेगा। इसमें तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है कि हम ऐसे अप्रत्याशित आंदोलन के कगार पर खड़े हैं जो अपनी व्यापकता और तीव्रता में इस प्रान्त के अब तक के इतिहास में अद्वितीय होगा।" 8 जुलाई को बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल में तीन शीर्ष नरमदली प्रतिनिधियों अम्बिका चरण मजूमदार, भूपेन्द्र नाथ बसु और जोगेशचन्द्र चौधरी ने बंगाल के ले. गवर्नर फ्रेजर की उपस्थिति में अपनी पीड़ा व्यक्त की कि किसी मामूली अपराधी को सजा देने के पहले अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है किन्तु बंगाल को वह मौका भी नहीं दिया गया और करोड़ों बंगालियों के भविष्य को फांसी पर लटकाने की घोषणा कर दी गई। अब हमारे सामने कोई रास्ता नहीं बचा सिवाय इसके कि इस अन्याय के विरुद्ध हम अपनी एकता के बल पर शान्तिपूर्ण संघर्ष में बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहें।

किन्तु कर्जन को विश्वास था कि बंगाल गरजेगा पर बरसेगा नहीं। उसे अन्दाजा नहीं था कि बंगाल राष्ट्रीयता के रंग में पूरी तरह रंग चुका है। उसका पूरी तरह मानसिक और बौद्धिक रूपान्तरण हो चुका है। बंगाल की युवा पीढ़ी-स्वामी विवेकानन्द के सन्देश को आत्मसात कर चुकी है। 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके स्वामी विवेकानन्द ने नारायण को नर सेवा से जोड़ दिया था। कोलम्बो से अल्मोड़ा तक उनकी यात्रा और गर्जना ने बंगाली मानस को अखिल भारतीय राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव से अनुप्राणित कर दिया था। अमरीका और ब्रिटेन में स्वामी जी के भारी प्रभाव का साक्षात्कार करके विपिन चन्द्रपाल जैसे नरमदलीय ब्राहृ समाजी चिन्तक ब्रिटिश भक्ति की भाषा छोड़कर एक नए महान सांस्कृतिक भारत के निर्माण का सपना देखने लगे थे। अपनी अमरीका यात्रा से भारत वापस लौटते ही उन्होंने 1901 में "न्यू इंडिया" नामक एक साप्ताहिक प्रारम्भ करके अपने सपने को शिक्षित बंगाल तक पहुंचाना शुरू कर दिया था। 1898 में एक ब्रिटिश महिला स्वामी विवेकानन्द से प्रभावित होकर उनकी शिष्या बनकर भारत आ गई थी। भगिनी निवेदिता नाम धारण कर उसने भारत को ही अपनी कर्मभूमि, मोक्षभूमि बना लिया था। जिस वर्ष 1902 में स्वामी विवेकानन्द अपना भौतिक शरीर त्याग कर विचार रूप में बंगाल के मन-प्राण पर छा गए, उसी वर्ष एक अन्य मनीषी सतीशचन्द्र मुखोपाध्याय ने "डान सोसायटी" की स्थापना की, जिसने बंगाल के किशोर और युवा अन्त:करणों को भारत के प्राचीन गौरव और राष्ट्रीय स्वाभिमान का पाठ पढ़ाना शुरू किया। बंगाल अपने क्षेत्रीय अभिमान से आगे बढ़कर अखिल भारतीय राष्ट्रीयता का अंग ही नहीं, बल्कि उसका बौद्धिक नेतृत्व करने लगा था। महाराष्ट्र का एक युवक सखाराम गणेश देऊस्कर बंगाल को अपनी कर्मभूमि बनाकर बंगाल और महाराष्ट्र के बीच राष्ट्रीय एकता का पुल बना रहा था। 1902 में पहली बार शिवाजी उत्सव का आयोजन हुआ जिसमें विपिनचन्द्र पाल ने अपनी ओजस्वी वाणी में शिवाजी के संकल्प, रणनीति और वीरता के आदर्श को बंगाल की जनता के सामने रखा। 1904 में शिवाजी उत्सव के लिए कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने "शिवाजी" शीर्षक अपनी प्रसिद्ध कविता प्रस्तुत की। उसी वर्ष रवीन्द्रनाथ ने "स्वदेशी समाज" नामक निबन्ध में भारत के सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन का चित्र प्रस्तुत किया। अन्य बंगाली साहित्यकारों ने भी भारत के अन्य भागों के वीर और राष्ट्रभक्त चरित्रों-जैसे राणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह आदि को केन्द्र बनाकर प्रेरणादायी रचनाएं कीं। विदेश यात्रा से लौटकर ब्राहृ बांधव उपाध्याय ने नवम्बर, 1908 में सांध्य दैनिक "संध्या" शुरू करके फिरंगी सभ्यता पर व्यंगात्मक प्रहार प्रारंभ कर दिए थे। कर्जन समझ नहीं पाया था कि 1905 का बंगाल वह नहीं था जो मुगलों-पठानों के शासनकाल में था। अब वह अखिल भारतीय राष्ट्रीय जागरण का अग्रदूत बन चुका था। श्री अरविन्द ने अपने छोटे से निबन्ध "बंकिम-तिलक-दयानंद" में बंगाल के इस रूपान्तरण की अखिल भारतीय पृष्ठभूमि को प्रस्तुत किया है। 8 जुलाई, 1905 को बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल में अम्बिका चरण मजूमदार ने ले.गवर्नर फ्रेजर को सुनाकर कहा कि क्या हम फिर से मुगलों और पठानों के अत्याचारी युग में पहुंच गए हैं?

संजीवनी द्वारा स्वदेशी का उद्घोष

पर, बंगाल की मन:स्थिति से बेखबर कर्जन बंग-भंग की योजना को क्रमश: आगे बढ़ा रहा था। 19 जुलाई, 1905 को शिमला के वायसराय भवन में बैठकर कर्जन की सरकार ने एक अधिकृत प्रस्ताव पारित कर विभाजन की पूरी रूपरेखा घोषित कर दी। घोषणा कर दी गई कि 16 अक्तूबर को विभाजन का निर्णय क्रियान्वित कर दिया जाएगा और जोसेफ बम्प फील्ड फुलर "पूर्वी बंगाल और असम" नामक नए प्रान्त का ले. गवर्नर होंगे। ब्रिटिश सरकार तो चुनौती फेंक चुकी थी। अब बंगाल को सोचना था कि वह इस चुनौती को परास्त कैसे करे। वह जान गया था कि केवल सभाओं में प्रस्ताव पारित करने, सरकार को खुले पत्र और याचिकाएं भेजने, सत्ताधीशों के पास प्रतिनिधिमंडल ले जाने, विधानसभाओं में विरोध का स्वर उठाने जैसी संवैधानिक लड़ाई की भाषा को ब्रिटिश सरकार समझने वाली नहीं है। अब उसे कोई ऐसा मार्ग खोजना होगा जिससे ब्रिटिश हितों पर सीधा प्रहार हो सके और बंग-भंग विरोधी जनता के संकल्प के क्रियात्मक रूप की अभिव्यक्ति भी हो सके। दूसरी चुनौती थी इस आंदोलन के पीछे पूरे समाज को एक्यबद्ध कैसे किया जाए, उसमें संघर्ष और त्याग का संकल्प कैसे जगाया जाए।

इस दिशा में पहली रचनात्मक पहल की जाने-माने नरमदली नेता कृष्ण कुमार मित्र की पत्रिका "संजीवनी" ने। 13 जुलाई, 1905 को संजीवनी ने लिखा कि इंग्लैण्ड बनियों का देश है। वहां के निवासी अपने आर्थिक हितों को सर्वोपरि मानते हैं। इंग्लैण्ड वासियों की दृष्टि में भारत में उनकी सरकार की सफलता की एकमात्र कसौटी है कि वह भारत का शोषण करके उनकी आर्थिक समृद्धि को कितना बढ़ाती है। इस समय भारत ब्रिटिश माल का बाजार बना हुआ है। मैनचेस्टर का कपड़ा और लीवर पूल का नमक भारतीय जीवन का अनिवार्य अंग बन गए हैं। ब्रिटेन में बने जूते, साबुन, सिगरेट, तम्बाकू आदि अनेक उत्पाद भारतीय बाजार पर छाये हुए हैं। पाश्चात्य सभ्यता के प्रवाह में बह रहा बंगाल अपनी विशाल जनसंख्या के कारण ब्रिटिश माल की खपत में सर्वाधिक योगदान कर रहा है। अत: यदि बंगाल की जनता ब्रिटिश उत्पादनों के बहिष्कार का निर्णय कर ले तो ब्रिटेन का व्यापारी वर्ग अपनी जड़ों तक हिल जाएगा और अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए ब्रिटिश सरकार पर विभाजन के निर्णय को वापस लेने का दबाव बनायेगा। अर्थात् संजीवनी ने पहली बार ब्रिटिश माल के बहिष्कार का आह्वान किया। संजीवनी ने यह भी लिखा कि विभाजन के दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया जाए, ब्रिटिश अधिकारियों एवं कार्यालयों से सम्पर्क न रखा जाए।

बंगाली एकता

बहिष्कार के इस आह्वान ने जन-मानस को झंकृत कर दिया। 16 जुलाई को खुलना जिले के बगेरहाट में एक जनसभा ने बहिष्कार का प्रस्ताव पारित कर दिया। 21 जुलाई को दीनाजपुर में महाराजा की अध्यक्षता में आयोजित जनसभा में लाल मोहन घोष जैसे वरिष्ठ सम्मानित नेता ने सुझाव दिया कि सभी भारतीय "आनरेरी मजिस्ट्रेट" त्यागपत्र दे दें। जिला बोर्डों, म्युनिसपल कमेटियों और पंचायतों में निर्वाचित सदस्य त्यागपत्र दें। विदेशी वस्तुओं का पूर्ण बहिष्कार हो। एक साल तक राष्ट्रीय शोक मनाया जाय। सभी सार्वजनिक आन्दोत्सव स्थगित कर दिए जाएं। 23 जुलाई को पाबना की जनसभा में बहिष्कार का प्रस्ताव पारित हो गया। 26 जुलाई को बारीसाल में दीनबन्धु सेन की अध्यक्षता में आयोजित विशाल जनसभा में सर्वमान्य तपस्वी नेता अश्विनी कुमार दत्त ने बहुत मर्मस्पर्शी भाषा में बहिष्कार और स्वदेशी का मंत्र गुंजाया। बंगाल के सभी अखबारों ने बंग-भंग के विरोध में काला बार्डर देकर अंक निकाले, बहिष्कार के सुझाव के पक्ष में वातावरण तैयार किया। ऐसे वायुमंडल से युवा पीढ़ी कैसे अछूती रह सकती थी। कलकत्ता की छात्र शक्ति मैदान में कूद पड़ी। 17 और 28 जुलाई को छात्रों ने दो सभाएं करके बहिष्कार का संकल्प लिया। वंदेमातरम् उनका युद्धघोष बन गया। 31 जुलाई को कलकत्ता के सभी कालेजों के छात्र बड़ी संख्या में एकत्र हुए। बहिष्कार आंदोलन को चलाने के लिए प्रत्येक कालेज और हाई स्कूल में छात्र समितियों का गठन हो गया।

बंग-भंग के विरोध में बंगाल के सभी बड़े नेता अपने मतभेदों को भूलकर एकजुट हो गए थे। सर गुरुदास बनर्जी, आनन्द मोहन बोस, जैसे वयोवृद्ध नेता जो राजनीतिक आंदोलन से सर्वदा अलग रहते थे निष्क्रिय नहीं रह सके। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, दिजेन्द्र लाल राय, रजत कान्त सेन जैसे साहित्यकार, संजीवनी, बंगाली, हितवादी, संध्या, न्यू इंडिया, डान, अमृत बाजार पत्रिका, इंडियन मिरर आदि सभी पत्र आंदोलन के पक्ष में वातावरण बनाने में जुट गए थे। प्रारम्भ में कुछ समय तक तो ब्रिटिश समर्थक पत्रों "इंग्लिश मैन", स्टेट्समैन वगैरह ने भी विभाजन के विरोध में आवाज उठाई। यह थी पृष्ठभूमि जिसमें 8 अगस्त, 1905 की विशाल जनसभा में बंगाल की निहत्थी जनता ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बहिष्कार का हथियार लेकर संघर्ष का बिगुल बजा दिया।

जन भावनाओं की धार को और पैनी करने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने आह्वान किया कि विभाजन के क्रियान्वयन दिवस 16 अक्तूबर को शोक दिवस के रूप में मनाया जाए। शोक का एक अनूठा रूप उन्होंने प्रस्तुत किया। उस दिन ब्राहृ मुहूर्त में प्रत्येक व्यक्ति नंगे पैर प्रभात फेरी निकाल कर गंगा तट पर जाए, वहां गंगा स्नान करे और सभी परिचित अपरिचित हाथ में पीले रंग की राखी बांधकर जन एकता के अभेद्य दुर्ग निर्माण में अपना योगदान करे। उधर, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने घोषणा कर दी कि अंग्रेज सरकार भले ही बंगाल को विभाजित कर दे पर हम विभाजन नहीं मानेंगे और दोनों बंगालों की एकता के प्रतीक स्वरूप 16 अक्तूबर को ही एक फेडरेशन हाल का शिलान्यास करेंगे जो हमारी एकता का पुल बनेगा। ऐसी अनेक योजनाएं उभर रही थीं। पर मुख्य प्रश्न था कि पूरे समाज को इन योजनाओं के पीछे कैसे खड़ा किया जाए। बहिष्कार की बात करना जितना सरल था, उसे क्रियान्वित करना उतना ही कठिन था। विदेशी माल अच्छा था, सस्ता था, जीवन का अंग बन चुका था। उसके साथ व्यापारिक स्वार्थ जुड़ गए थे। बहिष्कार का अर्थ था असुविधा और त्याग। जन भावनाओं को इसके लिए कैसे तैयार किया जाए यह था मुख्य प्रश्न नेतृत्व के सामने।

(20 मई, 2005)

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