चित्रकूट में "भार्गव राघवीयम्"


महाकाव्य पर संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा-

मन्द न हो संस्कृत साहित्य का प्रवाह

गत 27, 28 अगस्त को जगद्गुरु रामभद्राचार्य विश्वविद्यालय में जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य द्वारा संस्कृत भाषा में लिखित महाकाव्य "राघव भार्गवीयम्" नामक ग्रन्थ पर एक राष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन किया गया। हाल ही में इस ग्रंथ को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है। इस ग्रन्थ की महत्ता का वर्णन करते हुए सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने कहा- "भार्गव राघवीयम्" ग्रन्थ अर्वाचीन संस्कृत साहित्य पर महान उपकार है। स्वामी रामभद्राचार्य के रूप में देश को एक और महामना मालवीय मिले हैं जिनकी न केवल भारतीय वांग्मय पर अद्भूत पकड़ है, वरन् जिनकी आत्मा दीनजनों, विकलांगों की सेवा में ही सच्चे सुख की अनुभूति करती हैं। गोष्ठी में देशभर के विद्वानों ने भाग लिया और शोधपत्र प्रस्तुत किए। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. बी. कुटुम्ब शास्त्री संगोष्ठी में विशेष रूप से उपस्थित रहे। अन्य विद्वानों में इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. कामता प्रसाद त्रिपाठी, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के प्रो. रहस्य बिहारी द्विवेदी, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्रो. रमाशंकर मिश्र, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.) के डा. मुरली मनोहर पाठक आदि प्रमुख थे।

गोष्ठी के उद्घाटन सत्र में अपने सम्बोधन में कुलाधिपति जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि संस्कृत भाषा उदर पोषण और जीविका का साधन नहीं है वरन् यह भगवद्भक्ति-भारतभक्ति बढ़ाने और दुर्गुणों को दूर करने का साधन है। महाकाव्य "राघव भार्गवीयम्", जिसकी कथावस्तु भगवान राम और भगवान परशुराम के जीवन पर आधारित है, के विषय में बोलते हुए स्वामी जी ने कहा कि यह महाकाव्य राघव-भक्ति की देन है।

गोष्ठी में अपने उद्बोधन में सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय, वाराणसी के पूर्व कुलपति प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने कहा कि अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में एक तो लिखा कम जा रहा है और जो लिखा जा रहा है उसकी समीक्षा नहीं होती है। किन्तु भार्गव राघवीयम् इसका अपवाद है। यह महाकाव्य संस्कृत जगत में शीघ्र ही नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। साहित्य अकादमी द्वारा अल्पसमय में दिया गया पुरस्कार इसे सिद्ध ग्रन्थ के रूप में मान्यता दे चुका है। संगोष्ठी में समापन उद्बोधन देते हुए राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति प्रो. बी. कुटुम्ब शास्त्री ने कहा कि महाकाव्य होने की प्रत्येक कसौटी पर राघव भार्गवीयम् खरा उतरता है। इस ग्रन्थ के प्रकाशन से देश को जगद्गुरु स्वामी राम भद्राचार्य की प्रखर प्रतिभा के दर्शन तो हुए ही हैं, संस्कृत साहित्य भी इससे समृद्ध हुआ है।

गोष्ठी में जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जे.एन पाण्डेय, संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. योगेश चन्द्र दुबे, डा. गीता देवी मिश्र, डा. प्रज्ञा मिश्र, डा. स्वर्ण लता शर्मा ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट, डा. सुधा त्रिपाठी (गोरखपुर) डा. सुरेन्द्र शर्मा, आचार्य दिवाकर शर्मा आदि ने भी अपने-अपने विचार प्रकट किए।

NEWS