चैतन्य महाप्रभु


गीता प्रेस (गोरखपुर) द्वारा प्रकाशित कल्याण के "अवतार कथांक" एक असाधारण एवं संग्रहणीय अंक है जो प्रत्येक हिन्दू के घर में होना चाहिए। इस अंक को मात्र 130 रु. (सजिल्द- 150 रु.) देकर प्राप्त किया जा सकता है। उस अंक से हम यहां कलियुग के कुछ अवतारों के विवरण क्रमश: प्रस्तुत कर रहे हैं। अभी तक पिछले अंकों में आप आदिशंकराचार्य, श्रीरामानुजाचार्य, श्रीनिम्बार्काचार्य, श्रीमध्वाचार्य एवं श्रीमद्वल्लभाचार्य के बारे में विवरण पढ़ चुके हैं। -सं.

शास्त्रों में धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-इन चार पुरुषार्थों का सम्यक् रूप से वर्णन हुआ है, परंतु भगवद्विमुख मानव-जीवन में भगवान् के प्रति प्रेम का उदय एवं संवद्र्धन हो कैसे-ऐसे दिव्य सर्वसाधन-सार "प्रेम" नाम के "पंचम-पुरुषार्थ" का चैतन्य महाप्रभुजी ने स्वयं जीवन में आचरण का प्रकाश किया है, तभी भक्तजन गान करते हैं-

यस्यैव पादाम्बुजभक्तिलभ्य:,

प्रेमाभिधान: परम: पुमर्थ:।

तस्मै जगन्मङ्गमङ्‚गलाय,

चैतन्यचन्द्राय नमो नमस्ते।।

अर्थात जिनके चरण कमलों की भक्ति से "प्रेम" नामक परम पुरुषार्थ प्राप्त होता है, उन जगत के लिए मंगलों के भी मंगल चैतन्य चन्द्र को बार-बार नमस्कार है।

तप्त कांचन गौरांग राधाकान्ति कलेवर श्रीचैतन्य महाप्रभु राधा भाव से भावित रहकर नित्य-निरन्तर कृष्ण रस का पान करते थे। तभी माध्व गौडीय सम्प्रदाय के रसिकजन गाते हैं-

भाव राधिका माधुरी, आस्वादन सुख काज।

जयति कृष्ण चैतन्य जय कलि प्रकटे ब्राजराज।।

जगज्जीवों के उद्धार हेतु प्रेमतत्त्व का वितरण करने के लिए ही शक संवत् 1407 की फाल्गुनी पूर्णिमा के दिन नवद्वीप (नदिया नगर, प. बंगाल) में महाप्रभु चैतन्य देव का श्री जगन्नाथ मिश्र के पुत्र रूप में माता शची के गर्भ से प्राकट हुआ। संयोगवश उसी रात्रि पूर्ण चन्द्रग्रहण होने से सभी भावुक भक्त "हरि बोल, हरि बोल" भगवन्नाम का उच्चारण सहज ही कर रहे थे। तभी कलिदोषाच्छन्न काल में नाम-संकीर्तन-प्रवर्तनार्थ प्रेमावतार कलिपावनावतार श्री चैतन्य महाप्रभु का भक्तवेश में इस धराधाम पर अवतार हुआ। नीम के पेड़ के तले जन्म होने से माता उन्हें निमाई कहती थीं। चन्द्रग्रहण वश चन्द्रमा काला पड़ गया था। ये पंचभौतिक विग्रह में तप्त कांचन गौरांग थे, अत: गौरचन्द्र कहे गये। "अन्त: कृष्ण बहिर्गौर:" होने से गौरांग कहे गए। षडैश्वर्य-सम्पन्नता के प्रतीकार्थ माता-पिता ने विश्वम्भर नाम दिया। पश्चात् विष्णुप्रिया प्राणधन, नदिया बिहारी, श्रीकृष्ण-चैतन्य, भक्त वत्सल, प्रेमावतार, कलिपावनावतार, प्रेमपुरुषोत्तम, रसावतार आदि नामों से इन्हें जाना गया।

श्रीराधा की जिन विरह-भाव दशाओं का वर्णन गीत गोविन्दकार श्री जयदेव ने किया है, वे महाप्रभु चैतन्य के जीवन में प्रतिक्षण घटित होती रहीं। जिस भाग्यवान् के अन्तस् में भगवान् का प्रेम हिलोरे लेता है, उसके कदम-कदम पर, रोम-रोम में, बातचीत में, प्रत्येक इन्द्रियों में, हाव-भाव में, प्रेम छलक कर बाहर बिखरता रहता है। प्रेम की मात्रा ह्मदय में बढ़ जाती है, तब संभाले नहीं संभलती। नित्य-निरंतर महाप्रभु जी कृष्णविरह में इस प्रकार करुण क्रन्दन, रुदन करते रहते थे-

कांहां मोर प्राणधन वृजेन्द्रनन्दन

महाभागवत देखे स्थावर जंगम तांहां तांहां हयतार श्रीकृष्णस्फुरण।

विरह के रोमांच, कम्प, अश्रु, वैवण्र्य, उन्माद, रुदन, प्रपीडन आदि सात्विक भावों के उद्रेक में रहते हुए जगज्जीवों को भगवत प्रेम कैसे करना चाहिए-ऐसी शिक्षा उन्होंने दी। मानवों की तो बात ही क्या, श्रीवृन्दावनधाम के प्रकाशनार्थ झाड़ीखण्ड के रास्ते में जाते हुए महाप्रभु को वन के भयंकर सिंह, बाघ, रीछ आदि हिंसक जीव भी उन्हीं की महाविरह भाव दशा में "कांहां जाऊं कांहां पांऊं मोर प्राणधन, कांहां वृजेन्द्रनन्दन"-इस प्रकार अश्रुप्रपात करते हुए, भुजाएं उठाकर नृत्य करते हुए देखकर पिछले दो पैरों पर खड़े होकर जैसे मदारी नचाता है, वैसे नृत्य करने लगे।

महाप्रभु चैतन्य देव ने तत्कालीन क्रूरकर्मा भगवद्विमुख जगायी-मधाई, चांदकाजी आदि अनेक यवनों पर भी प्रेमधन लुटाया, उन्हें गले लगाया, वे वैष्णव बन गए, श्रीहरिदास आदि यवन उनके पार्षद थे, उनका ह्मदय परिवर्तित हो गया। तत्कालीन विद्वत परिषद् में वे अग्रणी थे। उन्होंने वर्ग, सम्प्रदाय, कुल, विद्या, धनाभिमान, सम्मानादि के आग्रह से मुक्त रहकर सबको कीर्तन का उपदेश दिया-

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।

अमानिना मानदेन कीर्तनीय: सदा हरि:।।

चैतन्यदेव जी ने जीवमात्र पर दया करना, भगवन्नाम से सतत रुचि रखना और जगत्-हितकारी सदाचार सम्पन्न विनीत व्यक्तित्व वालों (वैष्णवों) का संग करना- यही धर्म का सार अपने परम अनुयायी पार्षद सनातन गोस्वामी के समक्ष विश्व को अवदान के रूप में निरूपित किया-

जीवे दया नामे रुचि वैष्णव सेवन, इहा हइते धर्म सुनो सनातन।

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