दीनदयाल जी कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते


- राजनाथ सिंह

अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय न कहीं खोए हैं और न ही अप्रासंगिक हुए हैं। विचार और विचारक की कभी मृत्यु नहीं होती। वे हमारे बीच अपनी छाया छोड़ जाते हैं और उनकी छाया सदैव अजेय-अमर होती है। अत: दीनदयाल जी की वैचारिक छाया में एक नहीं, अनेक कार्यकर्ता उनके विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं। समाज जीवन में जब तक मनुष्य है, तब तक पं. दीनदयाल उपाध्याय अप्रासंगिक नहीं हो सकते। उनके विचार के केन्द्रबिन्दु में मनुष्य है, अत: मनुष्य के लिए बना विचार मनुष्य के रहते कैसे समाप्त हो जाएगा?

दीनदयाल जी का जीवन राजनीति में संस्कृति के राजदूत का-सा जीवन है। अगर उनका जीवन मात्र राजनीति का होता तो शायद यह विचार किया जा सकता था कि वे आज प्रासंगिक हैं या अप्रासंगिक। संस्कृति के कारण ही राष्ट्र की रक्षा होती है और राष्ट्र की पहचान बनती है। अत: विचारों के रूप "संस्कृति के राजदूत" की सदैव प्रासंगिकता रहेगी ही।

कई बार कहा जाता है कि जैसे कांग्रेस के लिए गांधीजी के विचार सिर्फ बयानों, पुस्तकों और दीवार पर टंगी तस्वीरों तक सीमित रह गए हैं, वैसा ही कहीं दीनदयाल जी के लिए भाजपा में तो नहीं है। लेकिन स्मरण रहे कि गांधी जी की कांग्रेस एक आंदोलन का नाम था। उन्होंने आजादी के बाद आंदोलन वाली कांग्रेस को समाप्त करने की बात कही थी। साथ ही यह भी कहा था कि आंदोलन वाली कांग्रेस को कभी राजनीतिक दल नहीं बनाना। गांधीजी के आग्रह की उपेक्षा कर जिस दिन कांग्रेस को राजनीतिक दल बनाया गया, उसी दिन गांधीजी की कांग्रेस समाप्त हो गई। यह तो नेहरू जी की कांग्रेस है, अत: उनके परिवार को जिस प्रकार कांग्रेस को चलाना है, वैसे चला रहे हैं। भाजपा का कार्यकर्ता न गांधी जी को अप्रासंगिक मानता है और न ही पं. दीनदयाल जी को।

उस समय पं. दीनदयाल जी पर बहुत दबाव थे। पर वे उस प्रवाह और दबाव के आगे अडिग खड़े रहे। उनका कहना था कि जो स्वयं अडिग खड़ा हो सकता है वही उस प्रवाह की दिशा को बदलने का उपक्रम कर सकता है। जो स्वयं अडिग खड़ा नहीं हो सकता वह प्रवाह को बदल भी नहीं सकता। जब दीनदयाल जी जनसंघ के महामंत्री बने तो उनके मस्तिष्क में यह उद्देश्य स्पष्ट था कि उन्हें कांग्रेस का विकल्प नहीं बनना है, बल्कि उन्हें देश में राजनीति की वैकल्पिक धारा को प्रवाहित करना है। वे इसी दिशा में आगे बढ़ते गए।

स्वतंत्र भारत में, विशेषकर गांधीजी के अवसान के बाद, राजनीति जिन हाथों में रही और राजनीति जिन मस्तिष्कों से संचालित हुई, वे मस्तिष्क भारतीयत्व को बहुत नहीं जानते थे। उन मस्तिष्कों का गठन और उन मस्तिष्कों का प्रशिक्षण पाश्चात्य था। वे भारत का मन नहीं समझ सके। पंडित दीनदयाल जी न समाजवाद के नारे से प्रभावित हुए न पूंजीवाद के प्रभाव से। उन्होंने कहा मानव कौन है, इसकी बहस क्या भारत ने नहीं की? मैं कौन हूं, हम कौन हैं, "अहं ब्राह्मास्मि" आखिर किस सवाल का जवाब है? इसीलिए दीनदयाल जी ने कहा, "मानव न केवल व्यक्ति है, मानव न केवल समाज है वरन मानव व्यक्ति और समाज की एकात्मता में से पैदा होता है। व्यक्ति और समाज को बांट दें तो मानव मर जाता है। अस्तित्व में ही नहीं आता। व्यष्टि और समष्टि यह एकात्म इकाई है। इस एकात्म इकाई का नाम मानव है और इसलिए मानव को सुखी करना है तो व्यक्तिवादी होकर नहीं कर सकते क्योंकि व्यक्तिवादी समाज की उपेक्षा करता है। समाजवादी होकर भी नहीं कर सकते क्योंकि समाजवाद व्यक्ति के व्यक्तित्व को कुचल देता है।" उन्होंने कहा कि मानव का सुख उसकी एकात्मता के अनुसंधान में है। इसलिए हम सोचें कि इस एकात्म मानव का सुख कौन-सी अर्थव्यवस्था में है? कौन-सी शिक्षा व्यवस्था में है? कौन-से विधि व्याख्यानों में है? कौन-सी राजनीति में है? यही कारण था कि दीनदयाल जी ने "एकात्म मानववाद" का विचार अनुप्राणित किया। भारतीय जनसंघ के इतिहास में यह ऐतिहासिक घटना 1965 के विजयवाड़ा अधिवेशन में हुई। इस अधिवेशन में उपस्थित सभी प्रतिनिधियों ने करतल ध्वनि से एकात्म मानव दर्शन को स्वीकार किया। इसकी तुलना साम्यवाद, समाजवाद, पूंजीवाद से नहीं की जा सकती। एकात्म मानववाद को किसी वाद के रूप में देखना भी नहीं चाहिए। इसे हम एकात्म मानव दर्शन कहें तो ज्यादा उचित होगा, किन्तु आधुनिक पद के चलते यह एकात्म मानववाद के रूप में प्रचलित है।

स्वतंत्रता के बाद भारत के नीति-निर्धारकों ने नागरिक को मतदाता की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया और यहीं से नीति और सिद्धांतों से मनुष्य ओझल होना शुरू हो गया। मनुष्य के बारे में जब हम विचार करते हैं तो स्वत: कर्तव्य का बोध होता है परंतु जब हम मतदाता के बारे में विचार करते हैं तो कुछ प्राप्त करने का बोध होता है। इस मानसिकता ने शनै:-शनै: समाज में अविश्वास की भावना उत्पन्न की है। उसी का परिणाम है कि आज विचारधारा के प्रति लोग कमोबेश गैरजिम्मेदार होते जा रहे हैं।

दीनदयाल जी का दर्शन भारत की प्रकृति से जुड़ा दर्शन है। अत: इस दर्शन से सभी को जुड़ना होगा। जिस दिन इस दर्शन पर समग्रता से समूचा देश विचार करेगा उस दिन लोगों के मन में यह प्रश्न नहीं आएगा कि दीनदयाल जी आज प्रासंगिक हैं या नहीं। जहां तक सवाल है किसी भी विचार और दर्शन पर अडिग रहने का, तो वह निर्भर करता है कि देश की परिस्थिति कैसी है, समय-काल कैसा चल रहा है। क्या देश का प्रत्येक व्यक्ति यह नहीं जानता है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति है। क्या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा इस तरह की व्याख्या नहीं की गई है? बावजूद इसके बहुतों की पहुंच से अभी तक यह बात दूर है। समाज में सदैव परिवर्तन होता रहता है। परिवर्तन एक प्रक्रिया है। समाज में आई गिरावट से कमोबेश सभी स्तर पर सभी लोग प्रभावित होते हैं। परंतु इसका यह अर्थ तो नहीं कि सभी लोगों का स्तर गिरा है। सकारात्मक दिशा में प्रयास सदैव करते रहने होंगे, चाहे जितना नकारात्मकतापूर्ण वातावरण हो। प्रकृति सदैव "सकारात्मकता" के साथ जुड़ती है।

किस विकलांग व्यक्ति की इच्छा नहीं होती कि वह अपने पैरों पर चले और बैसाखी छोड़ दे। वह सतत् इस दिशा में प्रयत्न करता रहता है। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी अपने वैचारिक अधिष्ठान के पुरोधा पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत एकात्म मानव दर्शन की परिधि में काम करती है। कुछ निर्णयों से या कुछ राजनीतिक अनिवार्यता से यह विचार मन में लाना कि भाजपा अपनी नीति-सिद्धांतों या दर्शन से भटक गई है और दीनदयाल जी हमारे लिए अप्रासंगिक हो गए है, न्यायसंगत नहीं होगा। हमने देश की परिस्थितियों के कारण लोकतंत्र की रक्षा के लिए आपातकाल में अपना दल विसर्जित कर दिया, क्या यह दीनदयाल जी की परंपरा का अनुकरणीय उदाहरण नहीं है। उन्होंने ही तो कहा था दल से बड़ा देश होता है। लोकतंत्र में संविधान की सदैव रक्षा होते रहनी चाहिए। इसी भावना से उस समय कठोर निर्णय लिया गया था। कार्य का जब विस्तार होता है तो कुछ मात्रा में स्वत: स्वीकृत पद्धतियों में ह्मास होता है, जो स्वाभाविक है। बावजूद इसके हमें अपने मूल से कभी भी भटकना नहीं चाहिए। सुधार की प्रक्रिया सदैव बनी रहनी चाहिए, इसमें हमारा पूरा विश्वास है। आने वाले दिनों में ही नहीं बल्कि सनातन काल के लिए एकात्म मानव दर्शन और दीनदयाल जी सदैव प्रासंगिक रहेंगे।

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