पंडित प्रेमनाथ डोगरा का पुण्य स्मरण - कश्मीर की अखंडता के अनूठे योद्धा भगवत स्वरूप - पूर्व महामंत्री, जम्मू कश्मीर प्रजा परिषद एवं भारतीय जनता पार्टी (जम्मू)


कश्मीर में श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति के आंदोलन के दौरान गत दिनों जिस तरह देशद्रोह भड़काने, कश्मीर की "आजादी" की बातें और पाकिस्तानी झण्डे लहराने की घटनाएं हुईं, वे चिंताजनक थीं। ऐसे में याद आई उस विभूति की जिसने डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने के प्रश्न पर जबरदस्त आंदोलन किया था। वे विभूति और कोई नहीं, प्रजा परिषद के अध्यक्ष और भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य और अध्यक्ष रहे पं. प्रेमनाथ डोगरा थे। गत 23 अक्तूबर को उनकी जन्म जयंती थी। अत: उस दिव्य विभूति के पुण्य स्मरण के साथ प्रस्तुत है यह आलेख। -सं.

लाला हंसराज गुप्त ने एक बार पंडित अमरनाथ डोगरा के बारे में कहा था कि वह अजातशत्रु थे। उन्होंने अपना कण-कण व क्षण-क्षण समाज सेवा में समर्पित कर दिया।

रा.स्व.संघ के सरकार्यवाह रहे माधव राव मुले ने भी पंडित डोगरा के लिए कहा था-"मुझे उनके विराट व्यक्तित्व की झलक तब मिली जब मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य से जम्मू गया था तथा मेरे आग्रह पर उन्होंने वहां के कार्य का नेतृत्व ग्रहण किया। कठिन से कठिन प्रसंग में भी संतुलन बनाए रखने में वे सिद्धहस्त थे। अपनी वृद्धावस्था में भी तरुणों को मात देने वाली तरुणायी उनमें थी।" ऐसे विशिष्ट व्यक्तित्व वाले पंडित प्रेमनाथ डोगरा का जन्म 23 अक्तूबर, 1894 को समैलपुर गांव में हुआ। पिताजी का नाम था पं.अनंत राय। समैलपुर गांव जम्मू नगर से 22 किमी. दूर जम्मू-पठानकोट मार्ग से उत्तर में एक बड़ा प्रसिद्ध गांव है।

जम्मू-कश्मीर के महाराजा रणवीर सिंह जी के समय पं. अनंत राय जी रणवीर गवर्नमेंट प्रेस के अधीक्षक रहे और उसके पश्चात लाहौर में कश्मीर प्रापर्टी के अधीक्षक रहे थे। पंडित जी तब राजा ध्यान सिंह की लाहौर की हवेली में रहते थे। वहीं पं. प्रेमनाथ का बचपन बीता और शिक्षा दीक्षा भी सम्पन्न हुई।

पंडित प्रेमनाथ जी बचपन से ही पढ़ाई में अत्यंत योग्य और खेलों में अत्यंत चुस्त एवं निपुण थे। 1904 में उन्होंने मॉडल स्कूल, लाहौर से मैट्रिक की परीक्षा पास की और एफ.सी.कालेज में प्रवेश लिया। वहां उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ खेलों में विशेष रुचि दिखाई और 100 गज, 400 गज, आधा मील, एक मील की दौड़ में प्रथम स्थान प्राप्त किया। पंजाब के तत्कालीन गवर्नर, जो उस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे, से इनाम भी प्राप्त किया। पंडित जी को एक जेब घड़ी इनाम में मिली थी उन्होंने उस घड़ी को बहुत दिनों तक संभाल कर रखा, आज भी वह उनके परिवार के पास सुरक्षित है। कालेज जीवन में पंडित जी फुटबाल के भी ऊंचे दर्जे के खिलाड़ी थे। कालेज की फुटबाल टीम में शामिल थे। जम्मू राज्य के तत्कालीन गवर्नर चेतराम चोपड़ा ने एक बार कहा था-"मैं समझता हूं कि पंडित जी की स्फूर्ति और तेज गति का कारण यही फुटबाल का खेल था, जिसका प्रभाव उनके जीवन में अंतिम दिन तक रहा था। कई स्थानों और उच्च पदों पर काम करते हुए पं. डोगरा 1931 में मुजफ्फराबाद के वजीरे वजारत (मुजफ्फराबाद जिले के मंत्री) बने। 1931 में शेख अब्दुल्ला का कश्मीर छोड़ो आंदोलन जोरों पर था। मुजफ्फराबाद में भी शांति भंग होने की संभावना बहुत अधिक थी, परंतु पंडित जी ने उपद्रव करने वालों के प्रति सख्ती नहीं दिखाई, लाठी चार्ज या गोली नहीं चलाई वरन् नरमाई से काम लिया। उन्होंने कहा, साम्प्रदायिकता एक आंधी है जिसमें कई व्यक्ति उलझ जाते हैं, परंतु ऐसे समय में दमन चक्र चलाने से स्थिति बिगड़ जाया करती है। यदि कुछ स्नेह प्रदर्शित किया जाय तो हर्ज ही क्या है। पंडित जी ने बिना लाठी व बंदूक चलाये उपद्रव शांत कर दिया, परंतु उनकी यह नीति उस समय की सरकार को ठीक नहीं लगी और इसी वजह से सरकार ने उसके बाद उनको नौकरी से अलग कर दिया।

1931 में शेख अब्दुल्ला जम्मू भी आए। वह जम्मू में डोगरा सदर सभा में भी आये। उस समय डोगरा सदर सभा के अध्यक्ष सरदार बुद्ध सिंह थे। वहां शेख अब्दुल्ला ने कहा कि सरकार ने पंडित प्रेमनाथ डोगरा को नौकरी से निकालकर अच्छा नहीं किया और उनको नौकरी पर दोबारा लेना चाहिए। पंडित जी सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद जनसेवा में जुट गए। 1940 में पंडित जी जम्मू में प्रजा सभा के पहली बार सदस्य चुने गये। उसके पश्चात वह लोगों के अधिक से अधिक निकट आते गए। 1947 के दौरान देश विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर में बड़ा संकटपूर्ण और भयावह राजनीतिक माहौल बना था। महाराज हरिसिंह को रियासत से बाहर जाना पड़ा और यहां जवाहर लाल नेहरू की शह पर शेख अब्दुल्ला ने अपने "नया कश्मीर" के एजेंडा के अनुसार "अलग प्रधान, अलग निशान व अलग विधान" का नारा छेड़ा और भारतीय तिरंगे के स्थान पर हल के निशान वाला कश्मीर का लाल रंग का झंडा लहराने लगा।

स्वाभाविक रूप से ये तीनों बातें देशहित में नहीं थीं इसलिए इसका तीखा विरोध करते हुए पं. प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व में प्रजा परिषद् का गठन हुआ और एक देश में एक प्रधान, एक निशान और एक विधान का आंदोलन छिड़ गया।

इस आंदोलन में पंडित जी तीन बार जेल गये और काफी दिनों तक जेल में रहे जहां शेख अब्दुल्ला सरकार ने उन्हें बहुत कष्ट दिए। इनकी सरकारी पेंशन भी बंद कर दी।

भारत की अखण्डाता के लिए श्रीनगर कूच करने का डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जबरदस्त आंदोलन देश भर में मचल उठा। परंतु 23 जून, 1953 को श्रीनगर जेल में डा.मुखर्जी का देहांत हो गया। उस समय पंडित जी भी श्रीनगर जेल में कैद थे। डा.मुखर्जी के देहांत के पश्चात उनके शव को कोलकता ले जाया गया। उस समय पंडित जी दिल्ली तक साथ थे। उनको केन्द्रीय सरकार के आदेश पर दिल्ली हवाई अड्डे पर उतार दिया गया। इसके पश्चात पंडित जी दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू से मिले और जम्मू कश्मीर के बारे में उनसे विशेष बातचीत की। उस दौरान बख्शी गुलाम मोहम्मद भी मौजूद थे। पंडित जी 1953 के प्रजा परिषद के आंदोलन के पश्चात देश भर में एक राष्ट्रनिष्ठ राजनेता के रूप में उभरकर सामने आये। इसके बाद वह एक वर्ष जनसंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष भी रहे। वह जम्मू कश्मीर के एकमात्र ऐसे नेता थे जो किसी राष्ट्रीय दल के अध्यक्ष रहे। उसके बाद से आज तक यह सौभाग्य किसी को भी नहीं प्राप्त हो सका है। 1957 में जम्मू नगर क्षेत्र से पंडित जी प्रदेश की विधानसभा के सदस्य चुने गए और 1972 तक हर चुनाव जीतते रहे। जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह के संबंध में उनका साफ कहना था कि विलय पत्र में जनमत संग्रह का कोई जिक्र नहीं है। रियासत के सभी नेताओं और राजनीतिक दलों ने जिनमें नेशनल कांफ्रेंस भी शामिल थी, इस विलय को मान्यता दे दी थी। उसके पश्चात चुनाव होने पर शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली विधान सभा ने भी विलय को प्रामाणिक माना इसलिए जनमत की बात करना देशभक्त नागरिक का काम नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक पूज्य श्री गुरूजी 1972 तक जब भी कार्यक्रमों के निमित्त जम्मू जाते, वे केवल पंडित जी के निवास पर ही ठहरते थे। 21 मार्च, 1972 को अपने निवास स्थान कच्ची छावनी में देश के इस प्रखर नेता एवं राष्ट्र की अखंडता को समर्पित जुझारू व्यक्तित्व पं. प्रेमनाथ डोगरा का निधन हो गया। मैं उनके अंतिम क्षणों में उनके निकट ही था।

संघ के ऐसे अनेक कार्यकर्ता हैं जिन्होंने पंडित जी के साथ अनेक अवसरों पर कार्य किया, उनमें प्रमुख हैं श्री केदारनाथ साहनी, श्री विजय कुमार मल्होत्रा, श्री जगदीश अबरोल, श्री बलराज मधोक, श्री श्यामलाल शर्मा, श्री दुर्गा दास वर्मा, श्री चमन लाल गुप्ता, श्री सहदेव सिंह, श्री राजेन्द्र सिंह, श्री मुलख राज परगाल और श्री गोपाल सच्चर। उनके निकट रहकर अनेक कार्यकत्र्ताओं को हर परिस्थिति में धैर्य से काम लेते हुए राष्ट्र के लिए सब कुछ न्योछावर करने की एक अद्भुत प्रेरणा मिलती थी।

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