सप्तर्षि संवत् और भारतीय पञ्चांग


- पं. चन्द्रकान्त बाली "शास्त्री"

एक समय था जब सप्तर्षि-संवत् विलुप्ति की कगार पर पहुंचने ही वाला था, बच गया। इसको बचाने का श्रेय कश्मीर और हिमाचल प्रदेश को है। उल्लेखनीय है कि कश्मीर में सप्तर्षि संवत् को लौकिक संवत् कहते हैं और हिमाचल प्रदेश में शास्त्र संवत्। ऐसा क्यों कहते हैं, इसका स्पष्टीकरण फिर कभी करेंगे। विचाराधीन विषय यह है कि भारतीय पञ्चांग में सप्तर्षि संवत् का जो उल्लेख मिलता है वह प्रामाणिक है या नहीं।

धुर दक्षिण भारत में सप्तर्षि-संवत् का घोर-विरोध हुआ है, जैसा कि कमलाकर भट्ट ने कहा है-

अद्यापि कैरपि नरै गतिरार्यवर्यै:

दृष्टा न यात्र कथिता किल संहितासु।

डेक्कन कालेज (पूना) में गणित के प्राध्यापक शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने सप्तर्षि संवत् की धज्जियां उड़ाई हैं। गर्ग और वराहमिहिर की खिल्ली भी उड़ाई। उन्होंने मजाक-मजाक में कहा-सप्तर्षि गर्गाचार्य के युग में मघा नक्षत्र में ही थे और आज भी वे वहीं हैं। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ है। धुर दक्षिण के आन्ध्रवंशीय राज्यों का इतिहास सप्तर्षि संवत् के माध्यम से लिखा गया है। पौराणिक प्रयोग- इसमें कोई संदेह नहीं कि भाग-भविष्य पुराण में सप्तर्षि संवत् के माध्यम से इतिहास लिखा गया है। आन्ध्र वंश के बारे में यह श्लोक प्रसिद्ध है-

कलेर्गतै- सायकनेत्र वर्षै: सप्तर्षिवर्या: त्रिदिवं प्रयाता:।

सह्रविंशशतैर्भाव्या: आन्ध्राणां तेऽन्वया पुन:।।

(नाना पुराण पाठ)

इसका तात्पर्य यह है कि जब कलिसंवत् 25 में (3076 ई.पू.) सप्तर्षि मघा नक्षत्र छोड़कर पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में प्रविष्ट हुए, उससे 2700 वर्ष बाद आन्ध्र राजा सत्ता में आ गए। अर्थात् 3076 ई.पू. में से 2700 वर्ष घटाने पर 376 ई.पू. से आन्ध्र राजा शासन करने लगे। आन्ध्रवंश के प्रथम राजा शातकर्णि का निधन 321 ई.पू. में हुआ, यह बात हाथी गुम्फा अभिलेख में भी अंकित है। अर्थात् यह तिथि श्रृंखला प्रामाणिक है।

(आन्ध्रवंश की तालिका परिशिष्ट में देखें)

(आन्ध्रवंश की तालिका परिशिष्ट में देखें)मिथ्या प्रयोग-एक अंग्रेज यात्री श्री व्हूलर कश्मीर यात्रा पर गए। वापसी पर उन्होंने कश्मीर-रपट लिखी और प्रकाशित की। उसी रपट में यह दर्ज है-कलेर्गतै: सायकनेत्रवर्षे:...।" श्लोक का पूर्वाद्र्ध उद्धृत कर यह बताने की कोशिश की गई है कि कलि संवत् 25 से सप्तर्षि संवत् की गणना प्रारंभ होती है। बस फिर क्या था, कश्मीर पंडित अपना इतिहास भूल गए और अंग्रेज यात्री के बताए मिथ्या रास्ते

पर चल पड़े। उसके अनुसार ईस्वी सन् 2007 के बराबर है 5083 सप्तर्षि संवत्, जो बिल्कुल गलत है। उनकी देखा-देखी कश्मीरेतर पञ्चांग भी इसी वर्ष-गणना पद्धति को अपना कर लिखने लगे। अगर हम इसको सही मान लें, जैसा कि पञ्चांग परिवार अपने आपको सही मान रहे हैं, तो राज तरंगिणी और दूसरे कश्मीरी इतिहास बेमानी हो जाते हैं। उनका कोई प्रसंग ऐतिहासिक घटनाओं के साथ तालमेल नहीं रखता। जैसा कि यह श्लोक है-

शतेषु षट्सु सार्धेसु त्र्यधिकेषु च भूतले।

काश्मीरे स्वास्त गोनन्द: पार्थानां सेवया नृप:।।

राजतरंगिणी (प्रथम और अष्टम तरंग)

अर्थात् सप्तर्षि संवत् 653 में पाण्डवों की कृपा से गोनन्द (द्वितीय) कश्मीर पर शासन कर रहा था। इतिहासकार विचार करें कि सप्तर्षि संवत् 653 का ई.सन् क्या होगा? भ्रान्त गणना के अनुसार 3073 ई.पू. से 653 घटाने पर 2423 ई.पूर्व में पाण्डवों का अस्तित्व कैसे सिद्ध किया जा सकता है? इस सूक्ष्मतम भूल की किसी को पहचान नहीं है। पञ्चांग परिवार बेखटके सप्तर्षि-संवत् का उल्लेख कर रहे हैं।

मैंने सप्तर्षि संवत् पर विशेष अनुसन्धान किया है। सप्तर्षि संवत् के तीन स्कूल हैं-

1. मुल्तान स्कूल 2. कश्मीर स्कूल 3. पाटलिपुत्र स्कूल

इन तीनों का पार्थक्य इस प्रकार है-

महाभारत काल-मुल्तान स्कूल (610) कश्मीर स्कूल (628) पटना स्कूल (1015)

अर्थात् मुल्तान स्कूल और कश्मीर स्कूल में 18 वर्ष का अन्तर है। मुल्तान स्कूल और पटना स्कूल में 405 वर्षों का अन्तर है। बड़े आश्चर्य का विषय है कि मुल्तान स्कूल और पटना स्कूल का अन्तर नाम लिखे बिना ही राजतरंगिणी में है। इससे अधिक चमत्कारपूर्ण प्रसंग यह है कि मेगस्थनीज ने दोनों स्कूलों का नामोल्लेख किये बिना सन्दर्भ दिया है। हम विस्तार से दोनों स्कूलों का उल्लेख नहीं कर रहे हैं। हमने पाञ्चजन्य के नववर्ष विशेषांक (10 अप्रैल, 2005) में इसका विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। विद्वान लोग उसी का अध्ययन करें।

सप्तर्षियों का नवचक्र आरंभ हमने कृत्तिका अतीत माना है। उल्लेखनीय यह है जब सप्तर्षियों का एक चक्र समाप्त होता है तो उसके पश्चात दूसरा चक्र एक-दो-तीन के क्रम से फिर नया आरंभ हो जाता है। अब तक तीन चक्र समाप्त हो चुके हैं, चौथा चक्र प्रारंभ हो गया है।

हमारा पञ्चांग परिवारों से निवेदन है कि सप्तर्षि संवत् पर स्वयं अनुसन्धान करें और उसका प्रयोग करें। कारण यह है कि स्वतंत्र भारत में इतिहास संशोधन की प्रवृत्ति बढ़ रही है और इसमें पञ्चांग परिवारों की भूमिका अहम् है, इसलिए अपने कर्तव्य का पालन सोच-समझकर करें। हमने जो सात सौ वर्षों की भूल का उल्लेख किया है वह तीनों सारणियों का क्रमश: और पृथक्-पृथक् अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाएगा।

प्रसंगवश- सप्तर्षि संवत् के बारे में एक बात जान लेना जरूरी है, वह यह कि सप्तर्षि मार्गी होते हैं, वक्री नहीं। मार्गी का अर्थ है जो ग्रह अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी के क्रम से संचार करते हैं, वे मार्गी होते हैं। और जो ग्रह रोहिणी, कृत्तिका, भरणी, अश्विनी इस विपरीत क्रम से संचार करते हैं, वे वक्री होते हैं। पञ्चांग परिवार वाले जानते हैं कि दो ग्रह नित्य मार्गी हैं- सूर्य, चन्द्रमा। दो ग्रह नित्य वक्री हैं-राहु और केतु। शेष ग्रह पञ्चांग नियमानुसार वक्री या मार्गी होते हैं। ठीक इसी पद्धति के अनुसार सप्तर्षि गण भी नित्य मार्गी ही रहते हैं।

नित्य मार्गी और कालगणना के अनुसार 18 वर्ष सप्तर्षि गणना में अधिक जोड़े जाते हैं। यह संभव नहीं है कि सप्तर्षि वक्री हों और उससे जुड़ने वाले 18 वर्ष मार्गी हों। इसी सूक्ष्मतम अनुसंधान के आधार पर हमने सप्तर्षियों को मार्गी कहा है। भारत के कुछ इतिहासकारों ने सप्तर्षियों को वक्र गति लिखा है। इसी आधार पर उन्होंने सारा इतिहास लिखा है जो निरर्थक है।

सीकर (राजस्थान) निवासी श्री देवकीनन्दन खेडवाल ने सप्तर्षियों को वक्र गति लिखा है। भारतीय पञ्चांग परिवार श्री खेडवाल को श्रद्धा से देखते हैं। कहीं श्री खेडवाल की देखा-देखी अन्य पञ्चांग परिवार सप्तर्षियों को वक्रगति न मानें- यह बताना बहुत जरूरी है।

सारिणी संख्या-1

सप्तर्षि संवत् नक्षत्र संचार कलिपूर्व ईस्वी पूर्व

00 कृत्तिका अतीत 625 3776 (ध्रुवांक)

भारतीय गणना शून्य से आरंभ होती है।

100 रोहिणी अतीत 525 3676

200 मृगशिरा अतीत 425 3576

300 आद्र्रा अतीत 325 3476

400 पुनर्वसु 225 3376

"सप्तर्षय: तदा प्राप्ता: पुष्ये नक्षत्रे प्रतीपे राज्ञि वै शतम्'

500 पुष्य 125 3276

"षडशीति समतीता: आश्लेषाया: चतुर्दश'

600 आश्लेषा 25 3176

"आसन मघासु मुनय: शासति पृथिवीं युधिष्ठिरे नृपते'

700 मघा - 3076

सारिणी संख्या-2

सप्तर्षि संवत् कलिपूर्व ईसा पूर्व

653 22 3123

"शतेषु षट्सु सार्धेषु साधिकेषु च भूतले"

अ47 -47

700 25 कलि 3076

"कलेर्गतै: सायकनेृत्र वर्षै:...""सप्तविंशैर्शतैर्भाव्या:आन्ध्राणामन्वया:पुन:"

3400 2725 376

सप्तर्षि नियमानुसार 18 अ18 उ 36 अधिक जमा करने होते हैं।

3436 2761 340

(क) कालतन्त्र 3776 (ध्रुवांक) में से 3436 घटाने पर उ340

(ख) कलिसंवत् 2761अ340 उ 3101 ई.पूर्व.

यहां से आन्ध्रवंश का उदय आरम्भ होता है।

अष्टौ दश च वर्षाणि शतकर्णिर्भविष्यतिा

322 - 322

आश्चर्य है भारत के प्रथम शिलालेख हाथीगुम्फा में शातकर्णि का निधन 321 ई.पूर्व लिखा है, जो उपर्युक्त सारिणी को यथार्थ आयाम प्रदान करता है।

सारिणी संख्या -3

सप्तर्षि संवत् ईस्वीं सन् ई.पू. (ध्रुवांक)

5781 2005 3776

5782 2006 3776

5783 2007 3776

5784 2008 3776

5785 2009 3776

5786 2010 377630

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