गवाक्ष


- मौन हुए विद्रोही जी

राष्ट्रीय चेतना के प्रखर प्रवक्ता कविवर दामोदर स्वरूप विद्रोही पिछले दिनों चिर मौन को प्राप्त हो गये। याद आ रही हैं उनकी पंक्तियां-

मैं लिख न सका कुछ भी रिसालों के वास्ते, उत्तर न बन सका हूं सवालों के वास्ते। लेकिन सियाह रात जब छायेगी मुल्क पे, मेरी तलाश होगी उजालों के वास्ते।

आपातकाल के दौरान हिन्दी काव्य मंच पर जो अकम्पित स्वर समय के सत्य को पूरी सक्षमता के साथ गाते रहे, विद्रोही जी उनमें विशिष्ट थे। "दिल्ली की गद्दी सावधान" नामक अपनी रचना से पूरे देश में चर्चित हुए विद्रोही जी ने आजीवन अपने तेवर की तेजस्विता और व्यक्तित्व की ठसक बरकरार रखी। कवि-सम्मेलन के मंच से तो अस्वस्थता के कारण उन्होंने कई वर्ष पूर्व अपने को अलग हटा लिया था किंतु अपनी अमोघ प्रभाव वाली अनेकानेक रचनाओं के कारण वह साहित्यिक मित्र-मंडली और साहित्यानुरागियों के मध्य सदैव स्मरण किये जाते रहे, किये जाते रहेंगे। पद्मश्री नीरज उन्हें हिन्दी का नजरुल इस्लाम कहकर उनकी क्रांतिधर्मिता को रेखांकित करते हैं तो सुप्रसिद्ध शायर अनवर जलालपुरी कहते रहे हैं कि विद्रोही वह राणाप्रताप है जिसका स्वागत हल्दी घाटी के मैदान में अकबर महान को करना चाहिये, विद्रोही ऐसा शिवाजी है जिसका इस्तकबाल तख्ते-ताऊस से उतरकर औरंगजेब को करना चाहिए और विद्रोही वह अदीब है जिसकी सेहत के लिये अदब की इबादतगाहों में दुआएं करनी चाहिए।

राष्ट्रीयता के ध्वजवाहक के रूप में प्रतिष्ठित विद्रोही जी के प्रकाशित काव्य संग्रह हैं-दिल्ली की गद्दी सावधान, गुलाम शैशव, मेरे श्रद्धेय तथा समय के दस्तावेज। उनकी प्रथम कृति में उभरकर आई चेतावनी आज भी उतनी ही सार्थक है-

ओ राजभवन के अधिवासी, भारत के गांवों को देखो। ओ मखमल पर चलने वालो, तुम नंगे पांवों को देखो। जनता के प्रतिनिधि कहलाकर जनता का शोषण बंद करो, तुम कोटि-कोटि का पेट काटकर अपना पोषण बंद करो। तुम लगे हुए हो निशि-वासर जनता का खून सुखाने में, तुम श्रम की कठिन कमाई को पानी सा लगे बहाने में। यह निजी तुम्हारी सम्पत्ति है विश्व-बैंक का महादान-

दिल्ली की गद्दी सावधान।

विद्रोही जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्र के प्रति सहज अनुराग, समग्र समर्पण और उसके जीवन-प्रवाह में व्याघात उत्पन्न करने वालों के प्रबल प्रतिरोध की दीक्षा दी। उनकी दृष्टि में कवि, चिंतक और मनीषी वही है जो जीवन-मूल्यों के प्रति पूर्ण निष्ठावान हो और जिसकी अपनी मान्यताएं सत्ता का रुख देखकर परिवर्तित न होती हों-

बहक जाये हवा के साथ ही जब राष्ट्र का चिंतन, जहां का बुद्धिजीवी स्वार्थ-सुविधा में भटकता हो। तो ऐसा व्यक्ति कवि चिंतक मनीषी हो नहीं सकता, कि जिसका शब्द दुविधा की सलीबों पर लटकता हो।

मंच पर पौरुष के दक्षिणावत्र्त शंख का घोष गुंजित करता विद्रोही जी का स्वर और स्वाभिमान की तेजस्विता से दीप्त उनका दुद्र्धर्ष व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिये प्रेरणास्रोत रहेगा। उनका आत्मविश्वास था-

कोई न अन्यथा ले मेरा सहज समर्पण, रख दूंगा एक पल में वातावरण बदलकर।

और उनकी प्रार्थना थी-

भगवान मौत देना सम्मान वह न देना, स्वीकारना पड़े जो अन्त:करण बदल कर।

अपनी जिंदगी को अपनी कविताओं की व्याख्या बनाने वाले राष्ट्रवाद के इस तप:पूत पुरोधा को पुन: पुन: प्रणाम।

अशुभ संकेत

महाराष्ट्र में राजकीय स्तर पर ऐसा आदेश निर्गत किया गया है कि व्यापारिक प्रतिष्ठानों की नाम-पट्टिकाएं मात्र मराठी में अंकित की जाएं। समग्र देश में इस तरह के कदम प्रतिक्रियाएं जगाते हैं। ऊपर से मराठा स्वाभिमान का संदेशवाहक लगने वाला यह आदेश व्यवहार में हिन्दी विरोधी है। स्वतंत्रता के बाद से आज तक किसी भी केन्द्रीय सत्ता में इतना नैतिक साहस नहीं रहा कि वह सारे देश में सम्पर्क-भाषा के रूप में हिन्दी की अनिवार्यता घोषित करके उसे राजभाषा की मर्यादा तथा राष्ट्रभाषा की स्वीकार्यता दिलाये। व्यावसायिक हितों के चलते आज देश में ही नहीं विदेशों में भी हिन्दी को थोड़ा बहुत सम्मान प्राप्त होने लगा है। तब इस प्रकार के आदेश उसके विकासमान व्यक्तित्व पर कुठाराघात के समान हैं। यदि अन्य भाषा-भाषी प्रांत भी कल ऐसे ही आदेश पारित कर दें तो राजभाषा और राष्ट्रभाषा कही जाने वाली हिन्दी कितनी उपहासास्पद स्थिति को प्राप्त होगी। स्वयं हिन्दी भाषी प्रांतों में हर नगर में कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ते हुए अंग्रेजी भाषी विद्यालयों ने बच्चों के हिन्दी संस्कारों की जड़ों में मट्ठा डालना आरंभ कर दिया है। अब बच्चों को पहाड़े याद नहीं हैं, वे "टेबल्स लर्न" करते हैं। प्राथमिक कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक के विद्यार्थी से कभी बात करके देखिये। अंग्रेजी की वर्णमाला सबको घुट्टी के साथ कंठस्थ करा दी जाती है किंतु बिना हिचक हिन्दी की वर्णमाला सुना पाने वाले बच्चे अब अपवादस्वरूप ही प्राप्त होते हैं। केन्द्रीय स्तर की विचार गोष्ठियों में राजपुरुषों की सम्बोधन भाषा अंग्रेजी ही होती है। हमारे बड़े राजनेता प्राय: अंग्रेजी में जिस प्रवाह के साथ वार्तालाप कर पाते हैं उस प्रकार हिन्दी में नहीं बोल पाते। हिन्दी के सर्वाधिक प्रसार संख्या वाले दैनिक अपनी भाषा को "हिंग्लिश" बनाते जा रहे हैं और इसे युवा पीढ़ी की मांग के कुतर्क से श्री मंडित कर रहे हैं। कुल मिलाकर राष्ट्र की वाणी के लिये ये संकेत शुभ नहीं हैं।

लहर बनने में सलिल को क्लेश होता है राष्ट्रकवि दिनकर ने कभी गहन संवेदनशीलता के साथ लिखा था-

मत छुओ इस झील को कंकड़ी मारो नहीं पत्तियां डारो नहीं फूल मत बोरो और कागज की तरी इसमें नहीं छोड़ो खेल में तुमको पुलक उन्मेष होता है लहर बनने में सलिल को क्लेश होता है।

राष्ट्रकवि ने प्रकृति के प्रति हमारी गहन जड़ता को तोड़ने की चेष्टा की थी। पश्चिमी प्रभाव ने हमें प्रकृति के साथ संघर्ष कर उसे पराजित करने का पाठ पढ़ाया है, उसके साथ समरस होकर रहने की मंत्र दीक्षा नहीं दी। विश्वास नहीं होता कि यह वही देश है जिसके अरण्यों में कभी याज्ञिक आहुतियों के साथ वे शांति मंत्र गूंजा करते थे जो पृथ्वी से लकर अंतरिक्ष तक सबके प्रति एक सामंजस्य, एक सौमनस्य का भाव वहन करते थे। आज येन केन प्रकारेण प्रकृति के पैशाचिक दोहन में लगे युग के पूंजीवादी चित्त ने आसन्न भविष्य में उपस्थित होने वाले अपने दुष्कृत्यों के भयावह परिणामों से आंखें मूंद रखी हैं। रासायनिक उर्वरकों ने कोड़े मार-मार कर दौड़ाये गये अश्व की भांति कुछ समय तक कृषि की प्रगति की रफ्तार का मजा ले लिया है किंतु अब अश्व निढाल होता जा रहा है, कोड़े मारे जाने के बावजूद वह लड़खड़ाकर ही चल पा रहा है। भूगर्भ से निर्ममतापूर्वक खींचे जा रहे जल ने महानगरों की पच्चीस मंजिली इमारतों की प्यास तो बुझाई, गांवों में जगह-जगह खुदे तालाब तो पटवा दिये किंतु अब इसी कारण जगह-जगह धरती की छाती दरक रही है। प्रकृति को उत्पीड़ित करने का परिणाम सामने आने लगा है। काश! हम अपनी प्रहारक प्रवृत्ति को समझा पाते- लहर बनने में सलिल को क्लेश होता है।

अभिव्यक्ति-मुद्राएं

जो जमीनों के भी होकर आसमानों से लड़े, छोटे-छोटे लोग भी दुनिया में हैं कितने बड़े। ये खुशी और गम हैं दोनों जिंदगी के आइने, जाने कब किस आइने के सामने सूरज पड़े।

-माणिक वर्मा

महत्तम हो गया लघुतम मनुजता हो गई बौनी, ह्मदय में जब हुआ विस्तार अपनी कामनाओं का। बहलता ही नहीं मन कागजी रंगीन फूलों से, करेंगे कब तलक सम्मान थोथी घोषणाओं का।

-गिरिधर गोपाल गट्टानी

दौड़ते थे पुत्र इक आवाज पर मां-बाप की, कब ये सोचा था बुढ़ापा अनसुना हो जायेगा।

-आचार्य भगवत दुबे

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