स्व. डा. श्याम बहादुर वर्मा - बौद्धिक साधना में लीन स्वयंसेवक - देवेन्द्र स्वरूप


इसी 20 नवम्बर की सायंकाल जब मैं हरिद्वार में अपने एक निकट संबंधी के अंतिम संस्कार का साक्षी बनकर दिल्ली के लिए वापस चला तो रुड़की पार करते ही दिल्ली से बड़े पुत्र ने सूचना दी कि आज सायंकाल 4 बजे डा. श्याम बहादुर वर्मा का स्वर्गवास हो गया। सहसा विश्वास नहीं हुआ। अभी 4 नवम्बर की रात मैं दो घंटे उनके पास बैठा था। मेरे एक पूर्व छात्र, जो पिछले 30 वर्ष से पूर्णकालिक सामाजिक कार्यकत्र्ता हैं और संत भारती के नाम से जाने जाते हैं, अपने तीन शिष्यों के साथ आये थे। वे एक पुस्तकालय भी चलाते हैं। श्याम बहादुर जी काफी समय से अपने विशाल पुस्तक-संग्रह को योग्य विद्यानुरागी लोगों में वितरण करने के लिए चिंतित रहते थे। इसीलिए मैं संत भारती को उनसे मिलाने ले गया था। उन्होंने संत जी के तीनों शिष्यों का विस्तृत साक्षात्कार लिया। सार्थक प्रश्न पूछे। उनकी आवाज में कम्पन नहीं था। चलते समय संत भारती ने पूछा कि "क्या अगले सप्ताह मैं पुस्तकों के लिए आऊं?" श्याम बहादुर जी ने कहा, "चार-पांच महीने के बाद आयें। तब तक मैं स्वयं आपके लिए पुस्तकें छांट कर रख दूंगा।" उनके आग्रह पर मैंने भी पहले एक दिन आकर कुछ पुस्तकें छांटी थीं। उस दिन जब मैं उनमें की छह पुस्तकें लेकर चलने लगा तो मैंने एक-एक पुस्तक का शीर्षक उन्हें सुनाया और वे हर शीर्षक को सुनकर कहते कि, देवेन्द्र जी, अभी इन्हें छोड़ दीजिए, ये मेरे काम आने वाली हैं। चलते समय संत जी ने कहा, "इनसे पुस्तकें लेना अन्याय होगा, पुस्तकों से इन्हें गहरा मोह है।" मुझे पुस्तकों के मोह से अधिक उनकी जिजीविषा पर आनंद हो रहा था। हममें से प्रत्येक को लगा कि उनका स्वास्थ्य सुधार की ओर है और वे संकट से बाहर निकल आए हैं। अत: 20 नवम्बर को उनकी मृत्यु का समाचार अकल्पित लगा। उनके छोटे भाई धर्मेन्द्र ने बताया कि जिन व्याधियों से वे कई महीनों से जूझ रहे थे, वे उनकी मृत्यु का कारण नहीं बनीं। अचानक ह्मदयगति रुक जाने से उन्हें शांतिपूर्ण मृत्यु प्राप्त हुई।

श्याम बहादुर 1967 में दिल्ली आए, पी.जी.डी.ए.वी.कालेज (सांध्य) में हिन्दी के प्राध्यापक बनकर। मैं उसी कालेज की प्रात:कालीन कक्षाओं में पढ़ाता था। दिल्ली आते तक श्याम बहादुर जी पांच विषयों में एम.ए. या एम.एस.सी. कर चुके थे। उनकी यह ख्याति कालेज में चर्चा का विषय बन चुकी थी। संघ के स्वयंसेवक और बौद्धिक अभिरुचियों के कारण हम परस्पर जुड़ गये। फिर 1990 में हम दोनों सहयोग अपार्टमेंट्स में पड़ोसी बन गये। 1968 में पाञ्चजन्य लखनऊ से दिल्ली आ गया और मुझे उसके संपादन का दायित्व मिला, तब श्याम बहादुर जी जैसे बौद्धिक स्वयंसेवक से सहज घनिष्ठता हो गयी। उन दिनों पाञ्चजन्य के कुछ विशेषांकों के सामग्री- संयोजन में उनसे बहुत सहयोग मिला। कुछ विशेषांकों पर सम्पादकीय सहयोगी के नाते उनका नाम भी छपा था। इस 42 वर्ष लम्बे सम्पर्क काल में श्याम बहादुर जी के दो ही प्रेरणा सूत्र ध्यान में आये-एक, संघ से प्राप्त प्रखर राष्ट्रभक्ति व संस्कृतिनिष्ठा; दूसरा, अथक ज्ञान-पिपासा और बौद्धिक सक्रियता। इन 42 वर्षों में उन्हें सदैव धोती-कुर्ते में ही देखा। हिन्दी-संस्कृत के अन्य प्राध्यापकों का अनुकरण कर उन्होंने सूट-बूट कभी नहीं अपनाया, न किसी सेमिनार में, न किसी विद्वत सम्मेलन में। प्रत्येक पुस्तक मेले में उन्हें कंधों पर झोले लटकाए देखा जा सकता था। उनके अपने नियम, अपने आग्रह थे। होली से दीवाली तक चाय नहीं पीनी तो नहीं पीनी।

श्याम बहादुर जी ने विवाह नहीं किया। पुस्तकें ही उनकी जीवन संगिनी थीं। सहयोग के तीन कमरों वाले फ्लैट में अकेले श्याम बहादुर और प्रत्येक कमरे में फर्श से छत तक पुस्तकों का अम्बार। वे किसी मित्र के घर जाते तो उसका पुस्तक संग्रह अवश्य देखते, उसमें से एक-दो पुस्तकें छांटकर पढ़ने के लिए अवश्य लाते। भौंरे की तरह जिस फूल पर भी बैठते उससे बौद्धिक रस अवश्य ग्रहण करते। उनकी ज्ञान - पिपासा और बौद्धिक सक्रियता का प्रत्यक्ष साक्षात्कार मुझे उनके संघ साहित्य के संकलन को देखकर हुआ। जब उन्होंने मुझसे कहा कि "आप मेरे पुस्तक संग्रह में से किन विषयों की पुस्तकें लेना चाहेंगे" तो मैंने उन्हें संघ साहित्य को देने की प्रार्थना की। तब वे अस्वस्थ होते हुए भी काम करने की स्थिति में थे अत: उन्होंने संघ संबंधी पुस्तकों को मेरे लिए एक जगह इकट्ठा कर दिया। उन पुस्तकों के दो ऊंचे-ऊंचे ढेर बन गये। 1948 के पूर्व संघ के पास दो छोटी-छोटी पुस्तकों के अतिरिक्त कोई साहित्य नहीं था। 1949 में संघ पर से प्रतिबंध उठने के बाद साहित्य प्रकाशन की गति बढ़ी। पर अधिकांश साहित्य छोटी-छोटी पुस्तिकाओं या पेम्पलेट के रूप होता था। श्याम बहादुर जी ने ऐसी अनेक पुस्तिकाओं और पेम्पलेटों को इकट्ठा करके दस मोटी-मोटी जिल्दों में बंधवाया हुआ था। मैंने जब उनके संघ साहित्य का अवलोकन किया तो पाया कि प्रत्येक पुस्तक में उनके हाथ की टिप्पणियां दर्ज थीं अर्थात् उन्होंने केवल संग्रह नहीं तो उनका अध्ययन भी किया था। संघ साहित्य का इतना विशाल संग्रह विरले स्वयंसेवकों के घर में होगा। मेरे लिए उन्होंने उस संग्रह का वर्गीकरण करके अलग-अलग बांध दिया था।

10 अप्रैल, 1932 को बरेली (उ.प्र.) जिले के आंवला नामक स्थान पर जन्मे श्याम बहादुर 1946 में चौदह वर्ष की आयु में संघ के स्वयंसेवक बने और 1948 में संघ पर अन्यायपूर्ण प्रतिबंध के विरोध में सत्याग्रह करके जेल गये। उन दिनों वे शाहजहांपुर में बी.एससी.के छात्र थे। 1950 में बी.एससी.पास करने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे एस.एससी.में प्रवेश नहीं ले पाये और एक वर्ष तक अपना पूरा समय संघ कार्य में ही लगाया। उस समय उन पर तीन धुन सवार थीं-संघ कार्य, अधिक से अधिक शिक्षार्जन और परिवार को आर्थिक सहारा। पर उनमें शिक्षार्जन की भूख बहुत प्रबल थी। अत: ट्यूशन पढ़ा कर उन्होंने बरेली कालेज से 1953 में गणित विषय में एस.एससी.पास कर ही लिया। संघ कार्य और जीविकार्जन को एक साथ जोड़कर वे संघ के आदेशानुसार अल्मोड़ा जिले के अस्कोट नामक स्थान पर नारायण विद्यालय में शिक्षक बन गये। पर वहां ईसाई मिशनरियों के मतांतरण प्रयासों का विरोध करने के कारण अगले ही वर्ष हल्द्वानी आ गये। वहां उन्होंने शिशु मंदिर आरंभ किया। शिशु मंदिर को सुदृढ़ आधार देकर वे 1956 में मैनपुरी जिले के भोगांव के कालेज में गणित के शिक्षक बनकर पहुंच गये। भोगांव में सात वर्ष का वास्तव्य उनकी अनेकमुखी प्रतिभा व कर्तृत्व के प्रस्फुटन में मुख्य कारण बना। मैनपुरी के जिला कार्यवाह के नाते संघ कार्य में पूरी शक्ति लगाते हुए भी उन्होंने वहां रहकर अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं में एम.ए. की परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। 1963 में वे भोगांव से बिजनौर जिले के धामपुर नामक नगर के रणजीत सिंह मेमोरियल डिग्री कालेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक बनकर आ गये। यहां भी वे पूरी गति के साथ संघ कार्य में जुटे रहे। भोगांव और धामपुर दोनों स्थानों पर वे संघ कार्यालय में ही रहते थे। संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री ओमप्रकाश जी के अनुसार, उनकी गणना जिले के श्रेष्ठतम कार्यकत्र्ताओं में होती थी। धामपुर में रहते हुए श्याम बहादुर जी ने 20 वर्ष बाद हिन्दी विषय में एम.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, जिससे प्रभावित होकर कालेज ने उन्हें हिन्दी विभाग में पहले प्राध्यापक और फिर विभागाध्यक्ष बना दिया।

चार वर्ष तक धामपुर में संघकार्य और शिक्षक भूमिका का निर्वाह करते हुए उन्होंने 1967 में आगरा विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति में एम.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली। मेरठ विश्वविद्यालय के लाजपतराय कालेज (साहिबाबाद) में हिन्दी के विभागाध्यक्ष के नाते कुछ समय कार्य कर वे 1967 में दिल्ली पहुंच गये। और जीवन के शेष 42 वर्ष उन्होंने दिल्ली में ही व्यतीत किए। दिल्ली पहुंच कर भी उनका विद्याध्ययन जारी रहा। दिल्ली विश्वविद्यालय में डा. विजेन्द्र स्नातक के मार्गदर्शन में "हिन्दी काव्य में शक्तितत्व" विषय पर शोध करके पी.एचडी.उपाधि अर्जित की। यह सचमुच अजूबा ही लगता है कि गणित से लेकर अंग्रेजी, संस्कृत, हिन्दी और प्राचीन भारतीय इतिहास जैसे अलग-अलग विषयों पर उन्होंने एम.ए. की परीक्षाएं केवल पास ही नहीं कीं बल्कि प्रथम श्रेणी प्राप्त की। एक दिन मजाक में जब उन्हें कहा गया कि अभी आप बनारस के रामदास गौड़ से बहुत पीछे हैं, क्योंकि उन्होंने बाईस विषयों में एम.ए. पास किया था तो श्याम बहादुर जी ने मुस्कराते हुए कहा कि अंतर सिर्फ इतना है कि उन्होंने हर बार तृतीय श्रेणी पायी और मैंने प्रथम श्रेणी। परीक्षाएं तो उनकी ज्ञान पिपासा की तृप्ति का निमित्त मात्र थीं। उनकी मुख्य प्रेरणा तो भारतीय संस्कृति में गहन अवगाहन थी, जिसका दर्शन उनके विशाल पुस्तक संग्रह को देखकर किया जा सकता है। बरेली में रहते हुए ही 1952 में उन्होंने साहित्य रत्न और आयुर्वेद रत्न की परीक्षाएं पास कर ली थीं।

वे ज्ञान संचय और ज्ञान वितरण, दोनों दिशाओं में एक साथ सक्रिय थे। उनकी बौद्धिक प्रतिभा को उनकी किशोरावस्था में ही बरेली के "आचार्यपीठ" के सुप्रसिद्ध स्वामी राघवाचार्य जी ने पहचाना और 1952 में ही उनकी "श्री नृसिंह प्रिया", "आचार्य" और "श्री वैष्णव सम्मेलन" आदि पत्रिकाओं में श्याम बहादुर जी की प्रारंभिक रचनाएं प्रकाशित हुर्इं जिनको बरेली के पं. भोलानाथ शर्मा एवं पं.विद्यासागर शास्त्री सरीखे विद्वानों ने सराहा और प्रोत्साहित किया। दिल्ली आने के बाद भी श्याम बहादुर जी का बरेली से बौद्धिक संबंध निरंतर बना रहा। वहां उन्होंने अनुशीलन परिषद् नामक एक साहित्यिक मंच का गठन किया। उसकी ओर से अनुशीलन पुस्तकालय स्थापित किया गया। इस परिषद् के माध्यम से उन्होंने बरेली के सब आयु वर्ग के लोगों को भारतीय संस्कृति और इतिहास का परिचय देने वाले कार्यक्रमों की रचना की। एक बार 1971 में वे मुझे भी शिवाजी पर व्याख्यानमाला के लिए ले गये थे। उन्होंने स्वयं रामायण, महाभारत, गीता, उपनिषद् और पुराण जैसे विषयों पर कई भाषणमालायें दीं। कहानी कहने की कला में वे पारंगत थे और घंटों श्रोताओं को बांधे रखते थे।

उनकी माता श्रीमती विद्यावती वर्मा बरेली में बड़ी समर्पित सामाजिक व राजनीतिक कार्यकत्र्ता थीं और 1960 से होमियोपेथी की प्रेक्टिस करती थीं। बड़ी कठिन परिस्थितियों में उन्होंने परिवार को न केवल चलाया अपितु श्रेष्ठ संस्कार भी दिए।

दिल्ली आकर श्याम बहादुर संघ परिवार की अनेक संस्थाओं, जैसे विश्व हिन्दू परिषद्, भारतीय साहित्य परिषद, विवेकानंद केन्द्र आदि में सक्रिय हो गये। अनेक वर्षों तक उन्होंने विवेकानंद केन्द्र की हिन्दी "केन्द्र पत्रिका" का संपादन किया। "हिन्दू चेतना", "हिन्दू विश्व", "पाञ्चजन्य", "राष्ट्रधर्म" आदि पत्रिकाओं में वे लिखते ही थे, हिन्दुस्तान और नवभारत टाइम्स जैसे दैनिक पत्रों ने भी उन्हें प्रकाशित किया। 1972 में महर्षि अरविंद के जन्म शताब्दी वर्ष में उन्होंने "क्रांति योगी श्री अरविंद", "महायोगी श्री अरविंद", "श्री अरविंद साहित्य दर्शन" एवं "श्री अरविंद विचारदर्शन" नामक चार स्वतंत्र ग्रंथों का प्रकाशन किया। "राष्ट्र निर्माता स्वामी विवेकानंद" और "युग पुरुष श्री राम" जैसे प्रेरणादायी ग्रंथों की भी उन्होंने रचना की। दिल्ली की हिन्दी अकादमी ने उन्हें 1997-98 में साहित्यकार सम्मान से अभिनंदित किया।

अब वे जीवनीकार से कोशकार की दिशा में बढ़ रहे थे। तीन विशाल खंडों में प्रकाशित उनका बृहत विश्व सूक्ति कोश एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ बन चुका है। बड़े आकार के लगभग 2000 पृष्ठों के इस कोश के कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। सूक्ति कोश से निबटकर श्याम बहादुर पिछले 19 साल से आधुनिक शैली का एक "हिन्दी-हिन्दी शब्द कोश" तैयार करने की साधना में रत थे। जोड़ों के दर्द ने उनका चलना-फिरना दूभर कर दिया था। चौथी मंजिल के लिफ्ट रहित फ्लैट से नीचे उतरने में उन्हें बहुत कष्ट होता था। उन्हें हर समय अपने ड्राइंगरूम में एक कुर्सी पर बैठकर शब्द कोश के निर्माण में निमग्न देखा जा सकता था। चारों ओर हस्तलिखित कार्ड, पुस्तकें व कागज बिखरे हुए। कैसा विचित्र संयोग है कि इसी जुलाई 2009 में उन्होंने अपने "हिन्दी शब्द कोश" को सब प्रकार से पूरा करके प्रकाशक को सौंपा कि उसके तुरंत बाद ही उनकी अनेक व्याधियों ने उभरकर उन्हें खाट से बांध दिया और अस्पताल में भर्ती होने के लिए बाध्य कर दिया।

इस बीच जब वे स्वयं उठ-बैठ नहीं सकते थे, उनसे जब भी भेंट हुई वे अपनी अगली साहित्यिक योजनाओं की चर्चा करते। हिन्दी शब्दकोश के बाद वे एक बृहत "चरित्रकोश" की तैयारी में लगे थे। उनके प्रकाशक से अधिक उनके अभिभावक मित्र श्री श्याम सुंदर ने बताया कि "एक दिन मैंने उनके स्वास्थ्य का हालचाल जानने के लिए फोन किया। काफी देर तक मैं उसी बारे में पूछता रहा तो अंत में श्याम बहादुर जी ने कहा कि आपने "चरित्रकोश" के बारे में तो पूछा ही नहीं।" ऐसी थी उनकी जिजीविषा। रुग्णावस्था में उनकी एकमात्र चिंता अपने पुस्तक संग्रह के भविष्य की थी। वही उनकी जीवनभर की पूंजी थी, जिसे बड़े जतन से, कष्टों से उन्होंने संजोया था। वे दुखी थे कि पुस्तकालयों में अब पाठक आते नहीं। केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ते हैं। अत: वे ऐसे पुस्तक प्रेमियों को ढूंढ रहे थे जिनमें अध्ययन की भूख हो, उन्होंने अनेक परिजनों को टटोला, पर निशारा ही मिली। वे आग्रही थे, स्पष्टवादी थे, निर्भीक थे। कभी-कभी उनके ये गुण उनकी व्यंग्यशैली और कटाक्षी भाषा में प्रगट होते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि विधाता ने यह उनके इस जन्म की इति "हिन्दी शब्द कोश" पर ही तय की थी, "चरित्र कोश" पूरा करने के लिए वह उन्हें दूसरा जन्म देगा। तब तक वे हम सबकी ओर से "पुत्रदार विवर्जिता: की श्रेणी में तर्पण पाने के अधिकारी रहेंगे। आयु में वे मुझसे 7 वर्ष पीछे, पर विद्वता और साहित्य साधना में अनेकों मील आगे पहुंचे। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि। द

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