तिब्बत पर चीन के खूनी अत्याचारों के पचास वर्ष - डा.सतीश चन्द्र मित्तल


पंडितजवाहर लाल नेहरू ने 1935 में कहा कि तिब्बत एक स्वतंत्र देश है परन्तु चीन में साम्यवादी शासन स्थापित हो जाने पर, माओत्से तुंग की सरकार की भांति उन्होंने भी तिब्बत को चीन का आंतरिक मामला बतलाया, जो इतिहास की भयंकर भूल है। गृहमंत्री सरदार पटेल ने नवम्बर, 1950 में पंडित नेहरू को लिखे एक पत्र में परिस्थितियों का सही मूल्यांकन करते हुए लिखा- "मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि चीन सरकार हमें शांतिपूर्ण उद्देश्यों के आडम्बर में उलझा रही है। मेरा विचार है कि उन्होंने हमारे राजदूत को भी "तिब्बत समस्या शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने" के भ्रम में डाल दिया है। मेरे विचार से चीन का रवैया कपटपूर्ण और विश्वासघाती जैसा ही है।" सरदार पटेल ने अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को "किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा" कहा है। भविष्य में इसी प्रकार के उद्गार देश के अनेक नेताओं ने व्यक्त किए। डा. राजेन्द्र प्रसाद ने चीनियों को तिब्बत का लुटेरा, राजर्षि टण्डन ने चीन सरकार को "गुण्डा सरकार" कहा। इसी प्रकार के विचार डा. भीमराव अम्बेडकर, डा. राम मनोहर लोहिया, सी. राजगोपालाचारी तथा ह्मदयनाथ कुंजरू जैसे विद्वानों ने भी व्यक्त किए हैं।

यह इतिहास तथा भूगोल का सामान्य छात्र भी जानता है कि भारत के तिब्बत के साथ धार्मिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सम्बंध अत्यन्त प्राचीन हैं। तिब्बत को विश्व की छत कहा गया है। स्वामी दयानन्द ने इसे "त्रिविष्टप" अर्थात् स्वर्ग कहा है, साथ ही आर्यों का आदि देश माना। सम्राट हर्षवर्धन कालीन तिब्बत के सम्राट सौगंत्सेन गैम्पों (617-649 ई.) के काल में उसने चीन को परास्त कर वहां की राजकुमारी वैन चैंग से विवाह किया तथा नेपाल की राजकुमारी भृकुटी से भी विवाह किया। तभी उन्हें भगवान बुद्ध की एक प्रतिमा भी भेंट में मिली और तभी से बौद्ध धर्म वहां का धर्म बन गया। इसी समय तिब्बती यात्री थानंमी सान का भारत आना हुआ तथा भारत की भाषा तथा व्याकरण के आधार पर तिब्बती भाषा को संजोया गया।

राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का अंग नहीं रहा। ईसा से एक शताब्दी पूर्व मगध के एक राजा ने तिब्बत के विभिन्न समुदायों को संगठित किया था। यह सम्बंध अनेक वर्षों तक बना रहा। 7वीं शताब्दी तक मध्य एशिया के एक भू-भाग पर तिब्बत का आधिपत्य रहा। चीन का तिब्बत के साथ सम्बंध 7वीं शताब्दी में हुआ, वह भी चीन की पराजय के रूप में। 821 में चीन की तिब्बत के साथ युद्ध में भारी पराजय हुई तथा दोनों देशों की सीमाएं भी तय हो गर्इं। 1249-1368 तक मंगोलों का आधिपत्य अवश्य रहा। 1649-1910 तक मंचू शासक रहे। परन्तु तब से 1949 तक तिब्बत एक स्वतंत्र देश रहा। 1947 में नई दिल्ली में हुए एफ्रो-एशियाई सम्मेलन में तिब्बत एक स्वतंत्र देश के रूप में आया। तब तक इस देश में भारतीय मुद्रा चलती थी तथा भारत की ओर से डाक व्यवस्था थी।

माओत्से तुंग को तित्बत के बिना चीन की आजादी अधूरी लगी। 1 जनवरी, 1950 को चीन सरकार ने घोषणा की कि तिब्बत की "मुक्ति" चीन सेना का एक मुख्य उद्देश्य है। अत: 7 अक्तूबर, 1950 को चीन ने तिब्बत पर विशाल सेनाओं के साथ आक्रमण कर दिया। 40,000 चीनी सेना तिब्बत के 410 किलोमीटर भीतर तक घुस गई। भारत को इसकी जानकारी 25 अक्तूबर को मिली। अप्रैल, 1951 में चीन ने तिब्बत को हड़प लिया। 1954 में भारत के साथ एक समझौता हुआ, जिसमें भारत ने दब्बू नीति का परिचय देते हुए तिब्बत को चीन का क्षेत्र स्वीकार कर लिया।

स्वाभाविक रूप से चीन के दबाव से तिब्बत में बेचैनी तथा विद्रोह की भावना भड़की। 1956-1958 के दौरान तिब्बत में स्वतंत्रता के लिए कई संघर्ष हुए। 1959 तिब्बत के स्वतंत्रता इतिहास में बड़ा संघर्ष का वर्ष रहा। चीन ने स्वतंत्रता आन्दोलन को दबाने के लिए सभी हथकण्डे अपनाए। हजारों तिब्बतियों को पकड़कर चीन ले जाया गया तथा उन्हें कम्युनिस्ट बनाया गया। लगभग 60,000 तिब्बतियों का बलिदान हुआ। 11 हजार से अधिक को चीन की जेलों में रखा गया। तिब्बत के अन्न भण्डार चीन ले जाए गए। 50 लाख चीनियों को तिब्बत में बसाने की योजना बनी। सोना, चांदी तथा यूरोनियम आदि बहुमूल्य पदार्थ चीन ले जाए गए। तिब्बत के धर्म गुरुओं तथा बौद्ध भिक्षुओं का अपमान किया गया। उन्हें "मुण्डित मस्तक" "चीवरधारी आवारा", "लाल रंग का चोर" आदि कहकर अपमानित किया गया। करीब 27 प्रतिशत आबादी का सफाया कर दिया गया।

1959-2009 तक अर्थात पिछले 50 वर्षों से चीनियों का तिब्बत में यह खूनी दमन चक्र निरन्तर चल रहा है। चीन द्वारा तिब्बतियों या दलाई लामा से भी बार-बार बातचीत का नाटक किया जा रहा है। 2002-2006 तक 6 बार वार्ता का ढोंग हो चुका है। मार्च, 2008 में जब तिब्बत के युवक, महिलाएं तथा नागरिक स्वतंत्रता संघर्ष की पचासवीं वर्षगांठ मनाने#े के लिए प्रदर्शन रहे थे तब चीन सरकार ने घिनौने तरीके से उनका दमन किया। स्थान-स्थान पर चीनी सेना ने पहले स्वयं भिक्षुओं का चोला पहनकर उन्हें उसकाया तथा बाद में सामूहिक हत्या एवं नरसंहार किए। तिब्बत में विदेशी पत्रकारों के घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया। मोबाइल व इन्टरनेट सेवा यह कहकर बन्द कर दी कि इसमें सुधार करना है। विदेश मंत्री याग जीयेची ने विश्व शक्तियों को चेतावनी दी कि वे दलाई लामा की चीन विरोधी नीतियों को जरा भी प्रोत्साहन न दें। इतना ही नहीं, बौद्ध भिक्षुओं को देशभक्ति का पाठ पढ़ाने वाले बौद्ध शिविरों पर ताले लगा दिए गए।

परन्तु तिब्बतियों ने अपने संघर्ष को जारी रखा। बीजिंग में होने वाले ओलम्पिक में विश्व के देशों के सम्मुख अपनी बात रखी। स्थान-स्थान पर ओलम्पिक मशालें न ले जाने देने या बुझाने का प्रयास किया। इसका प्रारम्भ ओलम्पिक के प्राचीन नगर एथेन्स से किया। इसके लिए लन्दन, पेरिस, सान फ्रांसिस्को आदि देशों में भी प्रदर्शन हुए। दिल्ली की सरकार ने दब्बू नीति का परिचय देते हुए 17 अप्रैल,2008 को उस मार्ग को ही बंद कर दिया जिस ओर से मशाल जानी थी। 2-3 किलोमीटर की सुरक्षा के लिए 21,000 सुरक्षा कर्मचारी लगाए गए। प्रदर्शनकारियों ने राजघाट पर महात्मा गांधी का चित्र लेकर प्रदर्शन किया। विश्व भर के दबाव के बाद चीन ने पुन: बातचीत का ढोंग रचा। मई के प्रारम्भ में दलाई लामा के दो प्रतिनिधियों से बात हुई, परिणाम वही ढाक के तीन पात। चीन सरकार ने दलाई लामा को अनेक गालियां दीं, अपराध करने वाले, अलगाववादी, फ्राड आदि कहा। सही बात तो यह कि चीन नहीं चाहता कि लोग दलाई लामा का स्मरण भी करें।

प्रश्न यह है भारत कब तक मूकदर्शक बन अपनी दब्बू नीति का परिचय देता रहेगा? भारत को तिब्बत के बारे में पुनर्विचार करना होगा। यह यद्यपि सही है कि चीन तिब्बत में धार्मिक स्वतंत्रता तथा सांस्कृतिक विरासत के साथ अधिक दिनों तक खिलवाड़ नहीं कर सकेगा। लेकिन यह जरूरी है कि भारत कोई ठोस और सबल सुरक्षा नीति अपनाए। प्रो. परिमल दास का यह कथन सही है कि तिब्बत की आजादी में ही भारत का राष्ट्रीय हित निहित है। जब तक तिब्बत स्वतंत्र नहीं होगा तब तक भारत और चीन के बीच स्थायी मित्रता भी नहीं हो सकती है। द

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