पवित्र गंगा एवं सिख इतिहास "भट बही एवं पण्डा बही" सिख इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत स. चिरंजीव सिंह


पंजाब के इतिहास में गुरुओं की यात्राओं का योगदान अद्वितीय है। उनका मुख्य आदर्श धार्मिक जागरण था। इसी जागरण के आधर पर उन्होंने सामाजिक क्रांन्ति पैदा की और आगे चलकर राजनैतिक क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त किया। प्राचीन मान्यताओं वाले को वह नई दिशा देने में सफल रहे। मीरी-पीरी के सिद्धान्त का सृजन कर खालसा का निर्माण किया और खालसा ने त्याग और अगणित बलिदान देकर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। परन्तु यह दु:खद है कि गुरुओं की इस क्रान्तिकारी देन का सिलसिलेवार ब्योरा अंकित नहीं हो सका।

प्राचीन साखियां चमत्कारी वर्णन तो करती हैं परन्तु तिथि, संवत्, रचना आदि का ब्योरा नहीं देतीं। यही सत्य संपूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास है। कविता महाकाव्य के माध्यम से रोमांचकारी प्रसंग उपलब्ध होते हैं, परन्तु उनको ऐतिहासिक तथ्यों के रूप में लिपिबद्ध करना संभव नहीं हो पाता।

आधुनिक इतिहास लेखन

वर्तमान समय में सुप्रसिद्ध सिख विद्वान प्यारा सिंह पद्म, जिन्होंने सिखपंथ के बारे में आधुनिक दृष्टिकोण से उच्च स्तरीय दार्शनिक खोज की है, के अनुसार "संभवत: यह बात मुस्लिम इतिहासकारों के प्रभाव से शुरू हुई कि प्रत्येक घटना का समय, स्थान और संबंधित पात्रों की ऐतिहासिक जानकारी भी दी जाए। पुराने समय में प्रत्येक कबीले के विशेष व्यक्ति अपने कबीले व खानदान की संभाल करते थे। प्राचीन विरासत या "मीरास" को संभालने के कारण ही यह लोग "मिरासी" कहलाते थे, जिसका अरबी भाषा में अर्थ है "पुश्तैनी" अथवा खानदानी याददाश्त की रक्षा करने वाला। भारत में यह कार्य भाट (भट्ट) ब्राह्मण करते थे।

भट्ट लोग पुरोहिताई करते थे। यह लोग अपने यजमानों की खुशी व गम के मौके पर उपस्थित होकर कार्य कर अपनी दक्षिणा लेते थे। यह इनका रोजगार भी था। इसलिए ये अपने पास बहियां रखते थे। जहां जाते थे यजमानों के नाम-पते वंशावली के साथ-साथ दर्ज करते जाते थे। कोई खास घटना घटी तो यह लोग उसका ब्योरा भी तुरन्त मौके पर जाकर लिख लेते थे। इसका लाभ यह था कि जब इनके यजमान का कोई खास समागम होता तो यह खाते पढ़कर यजमानों के पूर्वजों की वीरता सुना देते। इस तरह नई पीढ़ी में जोश भर देते और अपनी दक्षिणा भी यजमानों को प्रसन्न करके लेते थे।

साधरणतया भट्ट राजपूतों के पुरोहित थे। चौहान, पंवार, राठौर, तूमर, जादों- इनके पूर्वजों की गौरव गाथा सुनाकर भट्ट इनको प्रसन्न रखते और इस प्रकार खानदानों का रिकार्ड भी इकट्ठा करते रहते थे।

पंडा बहियां

भट्टों के समान पण्डा लोग भी अपनी बहियों में अपने यजमानों के पुरखों के कारनामे दर्ज करते थे। यह परंपरा आज भी चालू है। अन्तर इतना है कि भट्ट चक्रवर्ती थे। वह घूम-घूम कर अपने यजमानों के नए कारनामे लिखते थे, पुरानी घटनाओं को सुनाते थे। परन्तु पण्डा लोग तीर्थों पर निवास करते थे और आने वाले यात्रियों में अपने गोत्र के यजमानों को उनका इतिहास बताते थे। यह पण्डा लोग हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, पिहोवा, थानेसर, बनारस, मटन (कश्मीर), गया, इलाहाबाद जैसे बड़े तीर्थों पर निवास करते थे, आज भी करते हैं। कुछ घटनाएं भट्ट बही और पण्डा बही में समान रूप से मिल जाती हैं, विशेषकर उनकी तिथि, स्थान, समय और प्रसंग, इससे उनकी प्रामाणिकता और बढ़ जाती है उसका लाभ इतिहासकारों को हो जाता है।

बहियां और सिख इतिहास

यह सब प्रसंग प्रो. प्यारा सिंह पद्म द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक "गुरु किआं साखिआं" पंजाबी से लिये गये हैं। यह उनकी पंजाबी भाषा का अनुवाद मात्र है। उनके प्रति आभार प्रकट करना हमारा कर्तव्य है। भट्टों का संबंध सिख आंदोलन के साथ तीसरे गुरु अमरदास जी से शुरू हुआ। पांचवें गुरु अर्जुन साहिब जी के समय अनेक भट्ट सिख बन गए और गुरु साहिबान की सरगर्मियों के लेखन समय, स्थान, पता यथासंभव अपनी बहियों में दर्ज करने लगे। यहां हम उन ब्राहृज्ञानी भट्टों का उल्लेख नहीं कर रहे हैं जिनकी वाणी श्री गुरुग्रंथ साहिब जी में दर्ज है और जिन्होंने गुरु चरण में बैठकर ऐसी गुरु महिमा गाई है कि उनकी वाणी भी गुरु रूप का दर्जा हासिल कर चुकी है।

ऊपर उन भट्टों का उल्लेख है कि जो जन साधारण होते हुए भी गुरु सिख इतिहास के ऐसे प्रसंग अपनी बहियों में दर्ज कर गए जिनके कारण हमें बिखरे हुए साखियों के इतिहास को क्रम देने में सहायता मिलती है। यह भट्ट कोई विद्वान इतिहासकार नहीं थे, न ही उनका उद्देश्य इतिहास लिखना था परन्तु वह अपनी बहियों में तथ्यों का एक ऐसा खजाना दर्ज कर गए कि आज बड़े-बड़े इतिहासकार उनकी खोज करने में अपनी जिंदगी लगा रहे हैं।

सिख इतिहास के प्रसंग

उदाहरण के तौर पर प्रो. प्यारा सिंह जी पद्म सिख इतिहास के कुछ प्रसंगों का वर्णन करते हैं। बाबा तेगबहादुर जी के 1713 (विक्रमी संवत्)में तीर्थयात्रा पर जाने के बारे में बड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भट बही में मिलती है। वह कब गए, उनके साथ कौन गए आदि बही में निम्न शब्द लिखे हैं-

1. गुरु तेगबहादुर जी, बेटा गुरु हरगोबिन्द जी महल छटेका, पोता गुरु अर्जन का, सोढी खतरी, बासी कीरतपुर, परगणा कहलूर, संवत् 1713 अषाढ़ परविष-11, तीर्थ यात्रा जाने की तिआरी की। गैलों माता नानकी जी आर्इं, इस तरह गुरु हरगोबिन्द जी माता नेति जी आर्इं स्त्री गुरदिता जी की, माता हरि जी आर्इं-स्त्री गुरु सूरजमल जी की, बाबा बालू हसना ते, बाबा अलमस्त जी आए। चेले गुरु गुरदिता जी की माता गुजरी जी आर्इं स्त्री गुरु तेग बहादुर जी की, कृपाल चंद आइआ, बेटा बाबा लाल चन्द, सुभीखी का, दीवान दरगा मल आइआ बेटा द्वारका दास छिब्बड ब्राह्मण का, साधू सिंह आइआ बेटा श्री चन्द खोसले का, दुर्गादास आइआ बेटा पदमराय हजावत चौहान का, दिआलदास आइआ बेटा माईदास, पवार बलवंत का, चउपत राय आइआ-बेटा पेरा राम छिबर का होर सिख आए। (भट बही तलाउंदा परगणा जींद)। ऐसा लगता है यह यात्रियों का दल आराम से पैदल चलता और स्थान-स्थान पर पड़ाव करता हुआ पांच महीने बाद हरिद्वार पहुंचा जैसा कि वहां की बही में दर्ज है।

2. लिखतं तेगबहादुर, बेटा गुरु हरिगोबिन्द जी, बासी कीरतपुर, तालुका राज कहलूर, संवत् 1713 माघ मास की पूर्णिमा के दिन, श्री गंगा जी आए साथ माता नानकी जी आए। साथ स्त्री माता गुजरी जी आर्इं, सणे संगी साथिआं सुख दे स्नान। (पण्डा बही भवानी दास हवेली सोढिआं हरिद्वार)।

बाबा रामराय जी खुद गुरु हरिकिशन जी के संस्कार (अन्तिम फूल) लेकर गए थे। इसका उल्लेख भट बही में इस प्रकार है-

3. गुरु रामराय बेटा हरिराय महल सप्तमें का, बासी कीरतपुर, परगणा कहलूर संवत् 1721 माह जेष्ठ कृष्ण पक्ष तेरस के दिन दिंहु गुरु हरि किशन जी कीआं असतीआं लै#ै के गंगा जी गिआ। गैलों माता सुलखणी जी आर्इं, माता गुरु हरिकिशन जी की, गैल दीवान दरगाह मल छिब्बर आइआ। (भट बही मुलतानी)

4. लिखतं गुरु रामराय, बेटा गुरु हरिराय जी का, पोता गुरुदिता जी का, सोढी खतरी, वासी कीरतपुर परगणा कहलूर संवत् 1721 माह जेठ वदी तेरस के दिंहु अपने भाई गुरु हरकिशन जी की अस्थियां लेकर गंगा जी गया। गैलो माता सुखलणी जी आर्इं, माता हरकिशन जी की गैल दीवान दरगाह मल छिब्बर आइआ। (भट बही मुल्तानी सिंध)

अब इस बारे में पंडा बही का लेख भी उल्लेखनीय है। आगे लिखतं गुरु रामराय बेटा गुरु हरिराय जी का, पोता गुरु गुरदित्ता जी का, 21 जेट वदी तेरस के अपने भाई गुरु हरिकिशन जी के फूल लै के गंगा जी आइआ। साथ माता सुलखणी आर्इं। साथ दरगाह मल छिब्बर आया। (पंडा बही भवानीदास हवेली सोढियां, हरिद्वार)

गुरु गोबिन्द सिंह जी के बारे में

गुरू गोबिन्द सिंह जी के प्रकाश के बारे में यत्र तत्र परन्तु निश्चित जानकारी देने वाला विवरण इस प्रकार है-

5. गुरु गोबिंद दास बेटा गुरु तेगबहादुर महल नौमां का, पोता गुरु हरिगोबिन्द जी का, सोढी खतरी वासी पटना शहर तट नदी गंगा संवत् 1718 मास सुदी सप्तमी बुधवार के दिंहु ढली रैण जनम हुआ दिंहु ढलें। माता नानकी जी ने गरीब-गुरबे को दान दीआ, रैण पई, दीप माला हुई, बडा कोतूहल हुआ। काई बार पार नहीं सी आई रहा, गुरु-गुरु जपणा, जनम सउरेगा गुरू हर थाई सहाइ होगु। (भट बही पूर्वी दखिणी) दशम गुरु देहरादून से वापस आते हुए 1751 विक्रमी शुरू में हरिद्वार गए थे। उसके बारे में बहियों का रिकार्ड इसकी पुष्टि करता है।

6. लिखतं गुरु गोबिन्द दास बेटा सोढी खतरी, बासी चक नानकी, तालुका राज कहलूर। संवत् 1751 चैत्रा मास की पहली के दिवस के गंगा जी आए। सुख के स्नान। साथ माता पंजाब कोइर आर्इं, इस तरह गुरु रामराय जी के साथ दीवान चन्द्र छिब्बर आया। साथ दीवान मनीराम आया। (पण्डा बही हवेली सोढियां पं. भवानी दास)

7. लिखतं मनीराम बेटा नाइक भाई दास का पोता वल्लू का पडपोता मूले का, जतीआ पुआर, बंस बीझे का, जलाना बासी अलीपुर परगना मुलतान संवत् 1751 मिति 2 चेत, गुरू गोबिन्दराय जी के साथ दीवान होईकर हरिद्वार आए सुख के स्नान। (हरिद्वार पण्डा बही पंडत खेमचन्द चुन्नीलाल)

8. गुरु गोबिन्द सिंह जी महला दसमा, बेटा गुरु तेगबहादुर जी का साल 1755 मंगलवार बैसाखी दिहु पांच सिखों को खण्डे की पाहुल दी, सिंघ नाम रखा। प्रिथमै दयाराम सोपती खतरी, बासी लाहौर खड़ा हुआ, पाछे मोहकम चन्द छीपा वासी द्वारका, साहब चन्द नाई बासी बीदर (जाफराबाद) श्री चन्द जवंदा जाट हस्तनापुर, हिमत चंद झीवर वांसी जगन्नाथ बारे बारी खड़े हुए, सबको नीला अंबर पहिनाइआ। वही वेस अपना कीआ। हुक्का, हलाल, हजामत हराम, टिका जंझू धोती का तिआग कराइआ। मीणे, धीर मल्लीए, राम राईए, सिर गुंमे, मंसदा की वरतन बंद की। कंघा, करद केस, कड़ा, कछहिरा सबको दिआ। सब केशधरी कीए।

सबका जनम पटना, वासी, आनंदपुर बताई। आगे गुरु की गति गुरु जाने। गुरू गुरू जपना -गुरु हरथाई सहाई होगु। (भट बही भादसो परगना मानेसर)

9. गुरू गाबिंद सिंह महला दसमा, बेटा गुरू तेगबहादुर जी का संवत 1765, असु दिंहं चार गए, गाम नांदेड देस, दखन में गुरु जी ने दया सिंह से कहा-माधे दास शस्त्रा बस्तर सजाए, हाथ में नेजा पकडि । गुरु जी के साहवें आइखला हुआ। सतिगुरु इसे अपने दसति मुबारिक से पाहुल दी, बंदा सिंह नाम रखा। इसे रहित बहित बताई।

(भट बही मुल्तानी)

10. गुरु गोबिन्द सिंह महला दसमा बेटा गुरु तेगबहादुर जी का ने संवत 1765 कार्तिक मास सुदी तीन मंगलवार के दिंहु गाम नान्देड देस दखन तट गोदावरी से बंदा सिंह के मद्रदेश जाने का बचन हुआ। गैलों बाबा बिनोद सिंह, काहन सिंह, भगवंत सिंह, कुइअर सिंह, बाज सिंह, पांच सिख तैयार किए। छिए सिख बणजारा टांडा में पंजाब आए। (भट बही मुल्तानी सिंध)

11. गुरु गोबिन्द सिंह महला दसमा, बेटा गुरु तेग बहादुर जी का, मुकाम नांदेड तट गोदावरी से देश दखन, 1765 कार्तिक मास सुदी चौथ, शुक्ल पक्ष बुधवार के दिंहु भाई दया सिंह से बचन हुआ। श्री गुरु ग्रंथ साहिब ले आओ, बचन पाए दया सिंह गुरुग्रंथ साहब ले आए। गुरू जी ने पांच पैसे एक नारियल आगे भेंट रखा, माथा टेका। सरबत संगत से कहा-मेरा हुक्म है, मेरी जगह गुरु श्री गुरुग्रंथ जी को जानना। जो सिख जानेगा, गुरु तिस की बहुडी करेगा, सतकार मानना।

(भट बही तलाउंदा, परगणा जींद)

भट एवं पंडा बहियों में दर्ज की गई घटनाओं का महत्व संपूर्ण भारतवर्ष में है। आजकल तो न्याय प्रक्रिया में भी भट/पण्डा बही को प्रमाणिक माना जाता है। आम धारण है कि पण्डा लोग पंडताई पुरोहताई के धंधे को अपने स्वार्थ के लिए चलाते हैं। परन्तु इन घटनाओं के ऐतिहासिक महत्व पर बहुत कम लोगों का ध्यान में जाता है। विशेषकर सिखों को इस बात की हैरानी होती है कि सिख परंपरा और गुरूघर की घटनाएं भी पण्डों/भटों के खातों में दर्ज हैं। आज यह सिद्ध हो गया है कि विद्वानों, इतिहासकारों को इन बहियों का प्रमाणिक सहारा है। ये और भी आश्चर्यजनक है कि गुरु गोबिन्द सिंह जी के खालसा सजाने की घटना के बाद भी भट बहियों में सम्पूर्ण घटना दर्ज हैं। गुरु घर के व्यक्ति सिंह सजने के बाद पुरानी रीति-नीति छोड़ने के बाद भी पण्डों और भटों को पूर्ण जानकारी देते रहे। द

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