इस रंग ने ही देश का इतिहास रचा है


शिवओम अम्बर

इस देश का राष्ट्रवादी मानस यह देख-सुनकर विक्षोभ से ग्रस्त हो रहा है कि सत्ता के शिखर पुरुषों के लिए भगवा शब्द आतंकवाद से पूर्व विशेषण के रूप में प्रयुक्त किए जाने योग्य हो गया है। जिस भगवा रंग में इस राष्ट्र की हजारों वर्षों की संस्कृति अपनी प्रतीकात्मकता पाती रही है, जो सर्वोच्च आश्रम (संन्यास) का रंग रहा है, जो बलिदानियों की आजस्र परम्परा का सम्वाहक संघोष रहा है, जिसे राष्ट्रीय चेतना त्रिवर्णध्वज के प्रथम रंग के रूप में प्रथम प्रणाम का अधिकारी मानती है, वह इस देश के अंग्रेजी-भाषी गृहमंत्री के लिए एक व्यंग्य की वस्तु है, नकारात्मकता का विशेषण है। मानसिक दासता के इस दुर्भाग्यपूर्ण दृष्टान्त के दर्शन इसी देश की नियति की विडम्बना को करने हैं! डा. नरेश काव्यायन की पंक्तियां याद आ रही हैं-

ये भगवा रंग चढ़ती जवानी की तरह है,

सदियों के त्याग-तप की कहानी की तरह है।

बलिवेदियों पे शीश के दानी की तरह है,

यह शौर्य की तलवार के पानी की तरह है।

इस रंग की अरुणाई में सूरज की कथा है,

रक्तिम जलधि की उग्र तरंगों की व्यथा है।

भारत के स्वाभिमान का आकाश रचा है,

इस रंग ने ही देश का इतिहास रचा है।

गृहमंत्री महोदय को शायद इस तथ्य का बोध नहीं है कि सूरज पर कीचड़ उछालने से उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता, सम्बंधित व्यक्ति के हाथ जरूर मैले हो जाते हैं। वाक्संयम को विश्व मैत्री की पहली सीढ़ी की संज्ञा दी गई है किन्तु यह विधाता का कैसा परिहास है कि जिस व्यक्ति की अपनी संज्ञा में चित् और अम्बर का आध्यात्मिक-सांस्कृतिक संगुम्फन है उसी की वाणी भारत की विश्ववारा संस्कृति के प्रतीक रंग का विकृत भाव से प्रयोग करते समय नहीं हिचकिचाई। काका हाथरसी ने कभी हंसते-हंसाते नाम और नामों की इसी विसंगति पर टिप्पणी की थी-

नाम-रूप के भेद पे कभी किया है गौर,

नाम मिला कुछ और तो शक्ल-अक्ल कुछ और...

कह काका कवि दयाराम जी मारें मच्छर,

विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर।

यह देश ऐसी तमाम विसंगतियों को सहने को विवश है। डा. मनमोहन सिंह अपने आचरणों से भारतवन्दन कम शत्रुनन्दन अधिक लगते हैं। ममता बनर्जी की सारी ममता माओवादियों तक सिमट कर रह गई है और उनका अपना विभाग उनकी प्रशासनिक अक्षमता का प्रतीक बनता जा रहा है। एक तरफ कश्मीर में निरन्तर अशान्ति है, नक्सलियों का बढ़ता हुआ प्रभाव है, आतंकवाद का चौतरफा दबाव है, चीन की सर्वग्रासी लिप्सा का बढ़ता हुआ शिकंजा है तो दूसरी तरफ वोटवादी दृष्टि के कारण चिन्तनमूढ़, निर्णय-अक्षम, परमुखापेक्षी राष्ट्रीय नेतृत्व है। (स्व.) राजबहादुर विकल ने ऐसे ही परिवेश को गहराते हुए देखकर अभी कुछ दिन पूर्व कहा था-

सामथ्र्यहीन कौटिल्य,

उतर सिंहासन से नीचे आओ,

शासन संभालने के बदले

कुछ और करो घर को जाओ।

ओ सन्धिपत्र के हस्ताक्षर,

सामथ्र्यहीन चिन्तन जाओ,

कायरता के अनुवाद प्रखर,

जलते प्यासे सावन जाओ।

चन्दन को लपटों ने घेरा,

रोको विष के जंजालों को।

गद्दी त्यागो या जनमेजय,

फन कुचलो मारो व्यालों को!

राजनीति क्या करेगी, कहा नहीं जा सकता। किन्तु जनशक्ति तो सही दिशा में संचरण कर ही सकती है। श्रद्धेय विकल जी की ही इन उद्बोधनी पंक्तियों के साथ आशा प्रदीप जगाता हूं-

गिरिवासी हो वनवासी हो

सबको जोड़ो समुदाय बनो,

पूरा भारत हो महाकाव्य

उजियालों के अध्याय बनो।

माता की प्रतिमा कर अखण्ड

तप लिखो और बलिदान लिखो,

धरती के कागज पर पौरुष से

पूरा हिन्दुस्थान लिखो।

बौद्धिकता की विकृत व्यञ्जना

स्वयं को तर्कनिष्णात समझने वाले कुछ बुद्धिजीवी कितने विभ्रान्त हो सकते हैं, चिन्तन-सरणि किसी मूल्य की स्थापना करने के स्थान पर किस तरह कुतर्की आग्रह से जाने-अनजाने बिखराव और विखण्डन की वाहिका बन जाती है- इसका दृष्टान्त है साहित्यिक मासिकी "हंस" का एक आलेख। सितम्बर, 2010 के अंक में "बीच बहस में" श्री प्रेमकुमार मणि के द्वारा "हनुमान और शम्बूक" नामक आलेख में उपस्थित कुछ अनर्गल तथ्य और अविचारित आक्षेप हैं! आलेख के दो अनुच्छेद उद्धृत कर रहा हूं- "ये हनुमान हैं कौन? तुलसीदास कहते हैं- "अंजनीपुत्र पवनसुत नामा"। अर्थात् किसी दूसरे के पुत्र लेकिन रजिस्टर में नाम किसी अन्य का। जारज सन्तान न भी कहा जाए तो कृष्ण की तरह विवादास्पद तो अवश्य हैं। "गोरे नन्द जसोदा गोरी तू कत स्याम सरीर, चुटकी दै-दै हंसत ग्वाल सब सिखै देत बलवीर"। ग्वाल-बाल कृष्ण को लेकर हंसते थे कि यह कलूटा नन्द के परिवार में कैसे आ गया, जरूर कोई बात है। और तो और यशोदा का अपना खांटी वाला बेटा बलराम ही ग्वाल बालकों को सीख दे रहा है। उसे "मोल को लीन्हो" यानी खरीदा हुआ बतला रहा है।

कृष्ण की पीड़ा बड़ी थी। हनुमान की पीड़ा भी बड़ी है। अंजनी बाबू या बबुनी का बेटा पवन बाबू के बेटे के रूप में जाना जा रहा है-कितनी बड़ी पीड़ा है।.... हनुमान और शम्बूक की कथाएं आज भी सवाल उठाती हैं। राजसत्ता के साथ कैसा बर्ताव किया जाए।..... यदि हनुमान की तरह पूंछ हिलाना, जूते सहलाना और अभिनन्दन के करताल बजाना है तो चांदी ही चांदी है। दरबार में जगह से लेकर अनन्त संभवानाएं, मरने के बाद भी हर मोड़ पर मूर्ति और लड्डू के पुख्ता इन्तजाम।"

उपर्युक्त पंक्तियां लेखक की विभ्रान्त बौद्धिकता, विषाक्त मानसिकता, अधकचरे अध्ययन और कुतर्कमय विश्लेषण का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। महाकवि तुलसी और सूर की काव्य-पंक्तियां उद्धृत करके लेखक ने अपने अध्ययन को सन्दर्भित करने की चेष्टा की है किन्तु दुर्भाग्य से न तो उसके पास काव्य के अनुशीलन की पर्याप्त क्षमता है और न पौराणिक पात्रों की प्रतीकात्मकता को अनुभव कर पाने की बौद्धिक क्षमता। जिस परिवार में उसका जन्म हो गया उसने शायद उसे ये संस्कार भी नहीं दिए कि किसी भी धर्म से जुड़े आस्था-पात्रों के सन्दर्भ में कुछ कहने से पूर्व लेखनी को शिष्टता की शब्दावली को आत्मसात कर लेना आवश्यक होता है। किसी भी हिन्दू परिवार के संस्कार सम्पन्न बच्चे को भी बोध होता है कि वानरराज केसरी और उनकी धर्मपत्नी अंजनी के पुत्र का नाम हनुमान है। आगे की गाथा में काव्यात्मक संकेत ध्वनियां हैं। विविध पुराणों के अनुसार उन्हें कहीं शिव और कहीं पवन के वरदानस्वरूप उत्पन्न होने के कारण शंकरसुवन तथा पवनपुत्र कहकर पुकारा गया। गोस्वामी तुलसीदास जी की भावदृष्टि उन्हें सेवाकांक्षी शिव के अवतार के रूप में देखती है तथा "मानस" में जानकी जी तथा श्रीराम के साथ उनके भावपुत्र के रिश्ते का उल्लेख करती है। सुन्दरकाण्ड में श्रीराम का उनके प्रति कथन है-

सुनु सुत तोहि अरिन मैं नाहीं,

देखेउं करि विचार मन माहीं।

लेकिन ये सब काव्यजगत् की उद्भावनाएं हैं जिन्हें ओछी मानसिकता और कुतर्काच्छादित बौद्धिकता नहीं समझ सकती। स्वयं हनुमान जी की दृष्टि में श्रीराम कोई चक्रवर्ती सामन्त नहीं अपितु निखिल भुवनपति हैं जिन्होंने भवभारहरण के लिए अवतार लिया है। "मृत्यु के बाद" जैसा शब्द हनुमान के साथ नहीं जुड़ता क्योंकि हमारी सांस्कृतिक परम्परा उन्हें आठ चिरंजीवियों में स्थान देती है, जगज्जननी का उन्हें आर्शार्वचन है-

अजर अमर गुनविधि सुत होहू,

करहूं बहुत रघुनायक छोहू!

अत: विभ्रान्त बौद्धिकता की इस विकृत व्यञ्जना के प्रति आक्रोश व्यक्त करने के लिए मुझे गोस्वामी जी की पंक्तियां ही सटीक लग रही हैं। अपने युग की ऐसी ही मानसिकता के प्रति उन्होंने जो कहा था उसी को उद्धृत करते हुए इस टिप्पणी को विराम देता हूं-

कहहिं सुनहिं अस अधम

नर ग्रसे जे मोह पिसाच,

पाखंडी हरि पद विमुख

जानहिं झूठ न सांच।

बातुल भूत बिबस मतवारे,

ते नहिं बोलहिं बचन सम्हारे।

मुकुर मलिन अस नयन विहीना,

रामरूप देखहिं किमि दीना।

प्रभु, ऐसे "बौद्धिकों" पर कृपा कर उन्हें कुछ हार्दिकता भी प्रदान करें-ऐसी प्रार्थना करता हूं।द

अभिव्यक्ति मुद्राएं

हाल हुआ बेहाल सभी की झोली खाली है,

सपनों की टकसाल न सच्चे सिक्कों वाली है।

क्या खाकर मेहनतकश सही दिहाड़ी पाएगा,

टूटे सांचे में ही सारा देश ढल रहा है।

कांटों वाला ताज पहनकर देश चल रहा है,

आने वाले कल में शायद ध्वंस पल रहा है।

-सोम ठाकुर

झेलम नदी का पावन कोई नीर हमसे छीने,

धरती पे स्वर्ग जैसी तस्वीर हमसे छीने।

केसर की क्यारियों की जागीर हमसे छीने,

किसके लहू में दम है कश्मीर हमसे छीने।

-फारुख सरल

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