विजयनगर साम्राज्य की गौरव गाथा-2 - राजा कृष्णदेव राय बन गए


लोककथाओं के नायक - देवदत्त

दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य के प्रतापी राजा हिन्दू ह्मदय सम्राट कृष्णदेव राय के राज्याभिषेक के 500 वर्ष इस वर्ष पूर्ण हुए हैं। इस अवसर पर देशभर में, विशेषकर कर्नाटक में अनेक सरकारी व गैर सरकारी आयोजन किए गए हैं। यहां प्रस्तुत हैं विजयनगर साम्राज्य एवं राजा कृष्णदेव राय का इतिहास और उनके महत्व पर विस्तृत आलेख की दूसरी व समापन किस्त। सं.

(गतांक से आगे)

राजा कृष्णदेव राय ने पहले विजय नगर साम्राज्य के दक्षिणी प्रदेशों पर अपनी पकड़ मजबूत और इस क्षेत्र में सुख-शांति की स्थापना के साथ राज्य की आय में भी वृद्धि की। कराधान कृषि के अतिरिक्त विविध वस्तुओं और पशुओं पर, यहां तक कि राज्य में आने वाले व्यक्तियों और वेश्याओं पर भी कराधान लगाकर और विवाह आदि सामाजिक उत्सवों पर भी कर लगाकर समाज व्यवस्था को कानून के घेरे में ले लिया था। अष्ट प्रधान या अष्ट दिग्गजों की मंत्रिपरिषद् समाज के रक्षण कार्य पर दृष्टि रखती थी। सेना और गुप्तचर सीधे राजा के अधीन थे। राजा तक प्रजा की सीधे पहुंच थी और कोई भी व्यक्ति निश्चित समय पर राजा को अपनी वेदना सुना सकता था।

पराक्रमी राजा

राजा वैष्णव थे, पर सभी सम्प्रदाओं को अपना व्यक्तिगत धर्म पालन की पूर्ण स्वतंत्रता थी। जब पुर्तगाली और बहमनी सुल्तान हिन्दुओं पर अत्याचार और उनका मतान्तरण करा रहे थे तब भी विजय नगर साम्राज्य में उनको समान अधिकार थे। नागरिकों को भी शिक्षा और विभिन्न राजकीय सेवाओं में प्रचुर अवसर प्राप्त थे। शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चिन्ता प्रवत्र्तते के अनुसार कन्नड़ में लोकोक्ति है कि राजा नींद में भी सीमाओं को देखा करता है। दक्षिण की विजय में ही राजा कृष्णदेव राय ने शिव-समुद्रम के युद्ध में कावेरी नदी के प्रवाह को परिवर्तित करके अपूर्व रण-कौशल का परिचय दिया और उस अजेय जल दुर्ग को जीत लिया था। कृष्णदेव राय ने वीर नृसिंह राय को उनकी मृत्युशैया पर वचन दिया था कि वे रायचूर, कोण्डविड और उड़ीसा को अपने अधीन कर लेंगे। उस समय गजपति प्रताप रुद्र का राज्य विजयवाड़ा से बंगाल तक फैला था। गजपति के उदयगिरि किले की घाटी अत्यंत संकरी थी, अत: एक अन्य पहाड़ी पर मार्ग बनाया गया और चकमा देकर राजा कृष्णदेव राय की सेना ने किला जीत लिया था। इसी तरह कोण्डविड के किले में गजपति की विशाल सेना थी और किले के नीचे से ऊपर चढ़ना असंभव था। राजा कृष्णदेव राय ने वहां पहुंचकर मचान बनवाए ताकि किले के समान ही धरातल से वाण-वर्षा हो सके। इस किले में प्रतापरुद्र की पत्नी और राज परिवार के कई सदस्य बन्दी बना लिए गए थे। अन्तोगत्वा सलुआ तिम्मा की कूटनीति से गजपति को भ्रम हो गया कि उसके महापात्र 16 सेनापति कृष्णदेव राय से मिले हुए हैं। अत: उन्होंने कृष्णदेव राय से सन्धि कर ली और अपनी पुत्री जगन्मोहिनी का विवाह उनसे कर दिया। इस तरह मदुरै से कटक तक के सभी किले हिन्दू साम्राज्य में आ गए थे। पश्चिमी तट पर भी कालीकट से गुजरात तक के राजागण सम्राट कृष्णदेव राय को कर देते थे।

सुल्तानों के विरुद्ध रणनीति

यह नियम और मर्यादाएं केवल हिन्दू राजाओं के लिए थीं। बहमनी के सुल्तानों की प्रचण्ड शक्ति के समक्ष अधिक धैर्य और कूटनीति की आवश्यकता थी। गोलकुण्डा का सुल्तान कुली कुतुब शाह क्रूर सेनापति और निर्मम शासक था। वह जहां भी विजयी होता था वहां हिन्दुओं का कत्लेआम कर देता था। राजा कृष्णदेव राय की रणनीति के कारण बीजापुर के आदिल शाह ने कुतुबशाह पर अप्रत्याशित आक्रमण कर दिया। सुल्तान कुली कुतुब शाह युद्ध में घायल होकर भागा। बाद में आदिल शाह भी बुखार में मर गया और उसका पुत्र मलू खां विजय नगर साम्राज्य के संरक्षण में गोलकुण्डा का सुल्तान बना।

गुलबर्गा के अमीर बरीद और बेगम बुबू खानम को कमाल खां बन्दी बनाकर ले गया था। कमाल खां फारस का था। खुरासानी सरदारों ने उसका विरोध किया था। तब राजा कृष्णदेव राय ने बीजापुर में बहमनी के तीन शाहजादों को कमाल खां से छुड़ाया और मुहम्मद शाह को दक्षिण का सुल्तान बनाया। बाकी दो की जीविका बांध दी। वहां उनको व्यवनराज्य स्थापनाचार्यव् की उपाधि भी मिली थी। बीजापुर विजय के पश्चात कृष्णदेव राय कुछ समय वहां रहे किन्तु सेना के लिए पानी की समस्या को देखते हुए वे सूबेदारों की नियुक्ति कर चले आए।

एक बार सुलतानों ने मिलकर उनके विरुद्ध जिहाद बोल दिया। यह युद्ध दीवानी नामक स्थान पर हुआ। मलिक अहमद बाहरी, नूरी खान ख्वाजा-ए--जहां, आदिल शाह, कुतुब उल-मुल्क, तमादुल मुल्क, दस्तूरी ममालिक, मिर्जा लुत्फुल्लाह-सभी ने मिलकर हमला बोला था। इसमें बीदर का सुल्तान महमूद शाह (द्वितीय) घायल होकर घोड़े से गिर पड़ा। पर जब घायल सुल्तान महमूद शाह को सेनापति रामराज तिम्मा ने बचाकर मिर्जा लुत्फुल्लाह के खेमे में पहुंचाया और यूसुफ आदिल खां मार डाला गया तो इसे पक्षपात मानकर भ्रम हो गया और सुल्तानों में अविश्वास के कारण जिहाद असफल हो गया। इस लड़ाई में सुल्तानों को भारी क्षति उठानी पड़ी थी। पर उन्हें समूल नष्ट नहीं करना बाद में मंहगा पड़ा और सभी मुस्लिम रियासतें राजा के विरुद्ध तालीकोट के युद्ध में पुन: संगठित हो गयी थीं।

विभिन्न युद्धों में लगातार विजय के कारण अपने जीवनकाल में ही राजा कृष्णदेव राय लोककथाओं के नायक हो गए। उन्हें अवतार कहा जाने लगा था और उनके पराक्रम की कहानियां प्रचलित हो गयी थीं। रायचूर विजय ने सचमुच उन्हें विश्व का महानतम सेनानायक बना दिया था। सबसे कठिन और भारतवर्ष का सबसे विशाल युद्ध रायचूर के किले के लिए हुआ था। कृष्ण देव राय ने वीरनृसिंह राय को वचन दिया था कि वे रायचूर का किला भी जीतकर विजय नगर साम्राज्य में मिला लेंगे।

रायचूर की विजय

यह अक्सर भी अनायास ही हाथ आया। घटनाक्रम के अनुसार राजा कृष्णदेव राय ने एक मुस्लिम दरबारी सीडे मरीकर को 50,000 सिक्के देकर घोड़े खरीदने के लिए गोवा भेजा था। पर वह आदिल शाह के यहां भाग गया। सुल्तान आदिल शाह ने उसे वापस भेजना अस्वीकार कर दिया। तब राजा ने युद्ध की घोषणा कर दी और बीदर, बरार, गोलकुण्डा के सुल्तानों को भी सूचना भेज दी। सभी सुल्तानों ने राजा का समर्थन किया। 11 अनी और 550 हाथियों की सेना ने चढ़ाई कर दी। मुख्य सेना में 10 लाख सैनिक थे। राजा कृष्णदेव राय के नेतृत्व में 6000 घुड़सवार, 4000 पैदल और 300 हाथी अलग थे। यह सेना कृष्णा नदी तक पहुंच गयी। 19 मई, 1520 को युद्ध प्रारंभ हुआ और आदिल शाही फौज को मुंह की खानी पड़ी। लेकिन उसने तोपखाना आगे किया और विजय नगर की सेना को पीछे हटना पड़ा था।

आदिल शाह को शराब का व्यसन था। एक रात्रि वह पीकर नाच देख रहा था कि उठा, नशे के जोश में हाथी मंगाया और नदी पार कर विजय नगर की सेना पर हमला करने चल दिया। उसका सिपहसालार सलाबत खां भी दूसरे हाथी पर कुछ अन्य हाथियों को लेकर चला। राजा कृष्णदेव राय के सजग सैनिकों ने हमले का करारा जवाब दिया। और नशा काफूर होते ही आदिल शाह भागा। सवेरा होने तक उसके सिपाही और हाथी कृष्णा नदी में डूब गए या बह गए थे। ऐसी रणनीति ने उसके सिपाहियों और सेनापतियों का यकीन डिगा दिया। दूसरी ओर कृष्णदेव राय तब तक रणभूमि नहीं छोड़ते थे जब तक आखिरी घायल सैनिक की चिकित्सा न हो जाए। अत: जब तोपखाने के सामने उनकी सेना पीछे हट गयी तो राजा ने केसरिया बाना धारण कर लिया। अपनी मुद्रा सेवकों को दे दीं ताकि रानियां सती हो सकें और स्वयं घोड़े पर सवार होकर नई व्यूह रचना बनाकर ऐसा आक्रमण किया कि सुल्तानी सेना घबरा गयी और पराजित होकर तितर-बितर हो गयी। सुल्तान आदिल शाह भाग गया और रायचूर किले पर विजयनगर साम्राज्य का अधिकार हो गया। आस-पास के अन्य सुल्तानों ने राजा की इस विजय का भयभीत होकर अभिनन्दन किया। जब आदिल शाह का दूत क्षमायाचना के लिए आया तो राजा का उत्तर था कि स्वयं आदिल शाह आकर उसके पैर चूमे। उत्तर न आने पर बीजापुर विजय की कथा तो पूर्व वर्णित ही है।

लोकनायक

अजेय सेनापति, कुशल संगठक और प्रजारंजक प्रशासक होने के साथ-साथ राजा कृष्णदेव राय परमभक्त और कवि भी थे। अल्लासनी, पेदन्ना, मुक्कू तिरुमलराय, मदय्यागिरि मुदुपल्ककु जैसे कवि राज-सभा की शोभा थे। विभिन्न विषयों के देशी-विदेशी विशेषज्ञ राजा के आश्रय में साम्राज्य की श्री-वृद्धि करते थे। वे जहां-जहां गए वहां प्राचीन मन्दिरों का जीर्णोद्धार किया, उनमें राजगोपुरम् का निर्माण कराया तथा नए मन्दिर बनवाए। फलस्वरूप विजयनगर स्थापत्य शैली का प्रवत्र्तन हुआ। रामेश्वरम् से राजमहेन्द्रपुरम, अनन्तपुर तक इसके उदाहरण दिखाई देते हैं। इस शैली पर शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। मन्दिरों के कारण विद्यालयों का जाल भी विजयनगर साम्राज्य में बिछ गया था।

व्यापक कराधान के द्वारा धन संग्रह के साथ सामाजिक अभिलेख भी संग्रह हो गए थे। इस धन का मुख्य उपयोग सेना और सिंचाई के लिए होता था। उस साम्राज्य में हजारों छोटी-बड़ी सिंचाई की योजनाएं और जलस्रोतों पर बांध बने या नए नगर बसाए गए। आन्तरिक शान्ति के कारण प्रजा में साहित्य, संगीत और कला को प्रोत्साहन मिला था। जनता रोम के साम्राज्य की नकल करके कुछ विलासी भी हो गयी थी। मदिरालयों और वेश्यालयों पर कराधान होने के कारण इनका व्यापार स्वतंत्र था।

पर सूर्य मध्यान्ह में ही ढल गया। राजा के इकलौते पुत्र तिरुमल राय की एक षड्यंत्र के तहत हत्या हो गयी। राजा ने युवराज को राजगद्दी देकर प्रशिक्षित करना प्रारंभ कर दिया था। इसी विषाद में उनकी भी 1530 में मृत्यु हो गयी। और इस तरह महाप्रतापी राजा कृष्णदेव राय ने उदात्त हिन्दू जीवन मूल्यों पर आधारित एक पराक्रमी और विशाल साम्राज्य की गौरवगाथा लिखकर इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कर दिया। द

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