मानवाधिकारवादी लियू का चीन में दमन - भारत की चुप्पी आश्चर्यजनक - डा.सतीश चन्द्र मित्तल


मानवधिकारों पर कुठारा- घात तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाशविक एवं क्रूर दमन साम्यवादी देशों-विशेषकर रूस तथा चीन की नीति का अंग रहा है। यद्यपि ये दोनों देश संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य हैं तथा मानवाधिकारों की सुरक्षा की घोषणा से प्रतिवद्ध हैं, तथापि दोनों ही देश सामूहिक नरसंहार, क्रूर नृशंस हत्या, सरकार विरोधियों को देश निकाला तथा कारागारों में अनिश्चितकालीन रखने में एक-दूसरे से होड़ करते रहे हैं। सोवियत संघ में 1970 ई. में, वहां के शासक ब्रोझनेव (1964-1982) ने महान रूसी इतिहासकार अलेक्जेण्डर सोलझेनित्सिन को नोबल पुरस्कार लेने के लिए नहीं जाने दिया था, बल्कि उन्हें देश निकाला दे दिया। मानवाधिकार के पोषक एंड्री सखारोव को भी विश्व शांति पुरस्कार प्राप्त करने ओस्लो नहीं जाने दिया था। चीन के महान विचारक लियू जियाबाओ को 8 अक्तूबर, 2010 को विश्व शांति पुरस्कार देने की घोषणा की गई थी। परन्तु चीन की सरकार ने पहले से ही जेल में बन्द लियू पर शिकंजा कस दिया और अब उन्हें व्अपराधीव् घोषित कर दिया है।

28 दिसम्बर, 1955 को चीन में जन्मे लियू जियाबाओ ने अधिनायकवाद से त्रस्त होकर मानव की व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा मानवाधिकारों की रक्षा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। अपने लेखों के माध्यम से चीन में राजनीतिक चेतना जगाई। अहिंसक मार्ग से चीन सरकार के असंवैधानिक कार्यों की आलोचना की।

जून, 1989 में चीन के थ्येन आनमन चौक पर प्रजातंत्र की मांग को लेकर हुए छात्रों के विशाल प्रदर्शन में वे प्रमुख सहभागी थे। इस सन्दर्भ में उसकी गिनती चार प्रमुख छात्र प्रदर्शनकारियों में से एक के रूप में की जाती है। उस समय थ्येन आनमन चौक पर 400 छात्र (सरकारी स्वीकारोक्ति के अनुसार) मारे गए थे। लियू ने उस भीषण हत्याकाण्ड के लिए पूर्णत: चीन सरकार को उत्तरदायी बताया था। तब से लेकर वर्तमान तक जेल का जीवन अथवा घर में नजरबन्दी ही उनके जीवन का अंग बन गया है। उन्हें चार-बार श्रमिक शिविरों में भेजा गया। उन पर सरकार के विरुद्ध प्रचार तथा लोगों को उकसाने का आरोप लगाया गया। उन्हें शांति व्यवस्था भंग करने के लिए विद्रोही भी कहा गया, परन्तु उन्होंने अपना शांतिपूर्ण अहिंसक सुधार आन्दोलन नहीं छोड़ा।

चीन सरकार द्वारा लियू को दी जा रही तरह-तरह की यातनाओं के समाचारों से उनके प्रति विश्वव्यापी सहानुभूति पैदा हुई, उन्हें समर्थन मिला। लियू ने अपने एक मित्र की सहायता से व्चार्टर आठव् लिखा। यह चार्टर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मनाये जाने वाले व्मानव अधिकार दिवसव् को प्रसारित किया गया। इस चार्टर में चीन के संविधान (1982) की अवहेलना न करने, मानव अधिकारों को लागू करने, धर्म, प्रेस तथा लेखन पर प्रतिबंध आदि को समाप्त करने को कहा गया था। साथ ही स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना, संस्थाओं को गठित करने की स्वतंत्रता तथा एक से अधिक राजनीतिक पार्टियों की स्थापना की मांग की गई थी।

300 से अधिक चीनी विद्वानों, लेखकों, शिक्षाविदों के हस्ताक्षरों से युक्त उपरोक्त चार्टर को मानव अधिकार दिवस की 60वीं जयन्ती (10 दिसम्बर, 2008) का एक घोषणा पत्र के रूप में प्रकाशित किया गया। मई, 2009 तक इस पर 8600 हस्ताक्षर हो गए थे। परिणामस्वरूप 23 जून, 2009 को एक बार फिर लियू को जेल की काल कोठरी में बंद कर दिया गया। परिवार के सदस्यों तथा वकीलों से मिलने पर प्रतिबंध लगा दिया। झूठे न्याय का नाटक किया गया। जिसने शासन को उलटने के लिए लोगों को उकसाने का दोषारोपण किया। अपने बचाव में उन्होंने कहा- मैं किसी बुरी सरकार के आदेश को, अराजकता की अस्त-व्यस्तता से अच्छा मानता हूं। अत: मैं सरकार की व्यवस्थाओं का विरोध करता हूं जो अधिनायकवादियों तथा एकाधिकारों पर टिकी है।व् साथ ही उन्होंने सरकार के द्वारा उन पर लगाए आरोपों को पूर्णत: गलत बताया। बावजूद इसके लियू को 11 वर्ष की सजा दी गई तथा इसके पश्चात दो साल तक राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखने का भी दण्ड दिया गया।

इन सब कारणों से 8 अक्तूबर, 2010 को नार्वे की विश्व शांति पुरस्कार समिति ने इस वर्ष का विश्व शांति पुरस्कार लियू को देने की घोषणा की। यह पुरस्कार लियू को मानवाधिकारों की रक्षा तथा अभिव्यक्ति की स्वन्त्रता के लिए लम्बे समय से अहिंसक संघर्ष के लिए दिया गया। लेकिन लियू जियाबाओ को विश्व शांति पुरस्कार दिये जाने की घोषणा से चीन सरकार विचलित हो गई। चीन के विदेश विभाग ने तुरन्त नार्वे सरकार को यह पुरस्कार न देने के लिए कहा। साथ ही इस पुरस्कार को नोबल पुरस्कार के सिद्धांतों के विपरीत बतलाया। इतना ही नहीं, नार्वे से राजनयिक सम्बंध विच्छेद करने की धमकी तक भी दे दी। जेल में बंद लियू जियाबाओ पर मानो कष्ट का पहाड़ टूट पड़ा। उन पर पहले से ही जारी नियंत्रण और बढ़ा दिए गए।

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