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बलूचिस्तान: अशोक की हत्या के बाद, हिन्दू दुकानदारों को नई धमकी

WebdeskJun 09, 2021, 08:26 PM IST

बलूचिस्तान: अशोक की हत्या के बाद, हिन्दू दुकानदारों को नई धमकी

सोनाली मिश्रा

बलूचिस्तान में हिन्दू व्यापारियों, दुकानदारों पर जारी है मजहबी उन्मादी कहर। अब फरमान है कि हिन्दू दुकानदार अपनी दुकानों पर महिलाओं को न आने दें

      कारोबारी अशोक कुमार   (फाइल चित्र)

    पाकिस्तान के बलूचिस्तान में पिछले दिनों हिन्दू व्यापारी अशोक कुमार की हत्या की खबर सुर्खियों में छाई रही। हालांकि बलूचिस्तान में हिन्दू व्यापारियों पर हमले और अत्याचार कोई नई बात नहीं रही है। बीते दो साल में अनेक हिन्दू कारोबारियों को दिनदहाड़े मारा गया है। अशोक कुमार की हत्या कथित रूप से वसूली का पैसा न दिए जाने के कारण हुई थी। यही कारण है कि जगह जगह पर प्रदर्शन हो रहे हैं। लेकिन अबकी बार समस्या दूसरी है।

    अब हिन्दू व्यापारियों को धमकियां मिल रही हैं। और धमकियां ये नहीं कि अपना व्यापार समेट लें या फिर काम—धंधा न करें, बल्कि धमकी यह मिल रही है कि यदि हिन्दू दुकानदार औरतों को सामान बेचेंगे तो उन्हें जान से मार दिया जाएगा। बलूचिस्तान में बाज़ार में मौजूद हिन्दुओं की दुकानों पर, राष्ट्रीय राजमार्ग के बोर्ड पर पर्चे चिपकाए गए हैं, जिन पर धमकी दी गयी है कि यदि महिला ग्राहकों को दुकान में प्रवेश की इजाजत दी जाएगी तो हिन्दू व्यापारियों को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

    अर्थात पुरुष तो प्रवेश कर सकते हैं, पर महिलाएं नहीं! यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह 'फतवा' मुस्लिम औरतों के लिए है या फिर हिन्दू महिलाओं के लिए भी है? यह बेहद ही हैरान करने वाला पर्चा है क्योंकि यह समाज के आधे वर्ग की आज़ादी पर सवाल उठाता है। यह उन्हें परदे में रखने के लिए मजबूर करता है, जबकि इस्लाम के पैरोकार हमेशा ही यह कहते रहते हैं कि 'इस्लाम में औरतों को आज़ादी है'। यह कैसी आज़ादी है जिसमें औरतों को दुकान पर जाने की ही छूट नहीं है।


    पर्चे चिपका कर हिन्दू दुकानदारों को धमकी दी गयी है कि यदि महिला ग्राहकों को दुकान में प्रवेश की इजाजत दी जाएगी तो हिन्दू व्यापारियों को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
    अर्थात पुरुष तो प्रवेश कर सकते हैं, पर महिलाएं नहीं! अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह 'फतवा' मुस्लिम औरतों के लिए है या फिर हिन्दू महिलाओं के लिए भी है?


     पाकिस्तान में औरतों को हिंसा का शिकार बनाए जाने की घटनाएं लगभग रोज ही सुनने में आती हैं। इस विषय में एसएसडीओ अर्थात सस्टेनेबल सोशल डेवलपमेंट आर्गनाइजेशन ने 2020 में जनवरी से मार्च तक की तिमाही रिपोर्ट प्रस्तुत की थे। उसमें यह बताया गया था कि पाकिस्तान में औरतों के साथ होने वाली हिंसा के कई मामलों में वृद्धि हुई है। इसके अनुसार, कहा गया कि पाकिस्तान के राष्ट्रीय और स्थानीय अखबारों में जो अपराध वाले कॉलम है वहां से ये सारे आंकड़े लिए हैं कि लड़कियों की शादी कम उम्र में हो जाती है और लड़कियों का शोषण बहुत होता है। घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं वहां लड़कियां और महिलाएं।

ऐसे कई अपराधों की तो रिपोर्ट ही पुलिस में नहीं होती है। इस रिपोर्ट के जरिए इस गैर सरकारी संगठन का कहना है कि पाकिस्तान में औरतों के साथ होने वाली हिंसा में 200 प्रतिशत तक वृद्धि केवल इन तीन महीनों में हुई है। बच्चों का भी शोषण बढ़ा है। उनका शोषण सड़कों पर, परिचित पड़ोसियों के घर में होता है। साथ ही कई बार बच्चों का शोषण अप्रत्यक्ष भी होता है। यह रिपोर्ट बताती है कि इस अवधि में पाकिस्तान में घरेलू हिंसा के 20 मामले, कार्यस्थान पर शोषण के 8 मामले, बलात्कार के 25 मामले, अपहरण के 164 मामले और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के 36 मामले दर्ज किये गए थे।

    मगर इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? क्या मजहबी? शायद मजहबी ही, क्योंकि कट्टरता ने इस समय इस्लाम को घेर रखा है। इतना ही नहीं, पूरे विश्व में जिस परम्परा को कट्टरता का प्रतीक माना जाता था, उसे पहचान के रूप में उस मजहब ने स्वीकार किया। वह है औरतों को परदे में रखने वाला हिजाब! जब फ्रांस में हिजाब को लेकर रोक लगाने की बात हुई थी तो पाकिस्तानी सोशल मीडिया में इस घोषणा का विरोध हुआ था। औरतों को लेकर इस हद तक पिछड़ापन पाकिस्तान में दिखता है कि वह औरतों को बाहर निकलने देने पर भी विभाजित है।

    गैर मुस्लिम लड़कियों के साथ तो जो होता है वह आए दिन सुनने में आता ही रहता है। परन्तु इस्लाम की मूल अवधारणा औरतों को परदे में रखने ही की है। कुरआन में एक सूरा इसी बारे में है। इसके साथ ही एक सूरा में, औरतों को परदे में रखना इसलिए जरूरी बताया गया है कि जिससे 'औरतों पर अत्याचार न हो'।

    अब यदि इन आयतों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि औरतों को अभी भी उन्हीं नियम और कानूनों में बांधने की कोशिश की जा रही है जो आज से कई वर्ष पहले 'उस समय की जरूरत के हिसाब से' बनाए गए थे? हो सकता है कि उनकी आज जरूरत न हो क्योंकि समय बहुत आगे बढ़ गया है।

    परन्तु क्या बलूचिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथ के लिए रास्ता वहीं रुक गया है, जो अब औरतों के दुकान तक जाने के खिलाफ हो गए हैं? किस बात का डर है? आखिर क्यों बार बार हिन्दू लड़कियों के अपहरण किये जाते हैं? क्या उन्हें यह डर है कि वे हिन्दू लडकियां ही अपने धर्म के लोगों की ही दुकान में चली जाएंगी? बहरहाल, आज पूरे पाकिस्तान में ही हालात ये हो गए है कि हिन्दू डरे—डरे रहते हैं।

 

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