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शिक्षा : भाषाओं के लिए आगे आई भारत सरकार

शिक्षा : भाषाओं के लिए आगे आई भारत सरकार

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने भारतीय भाषाओं के विकास, विलुप्त हो रही भाषाओं को फिर से जीवित करने और मातृ भाषा के माध्यम से रोजगार बढ़ाने पर सुझाव देने के लिए एक उच्चाधिकार समिति का गठन किया है। यह समिति सभी भारतीय भाषाओं में पठन सामग्री का निर्माण भी करेगी

 

हाल ही में भारत सरकार ने भारतीय भाषाओं के विकास के लिए एक उच्चाधिकार समिति बनाई है। शिक्षाविद् चमूकृष्ण शास्त्री की अध्यक्षता में गठित इस समिति में तीन सदस्य हैं। ये हैं- शिक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव (भाषा), केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरु के निदेशक और लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति। यानी इस समिति में अध्यक्ष सहित चार विद्वान हैं। अभी इस समिति का कार्यकाल दो वर्ष तय किया गया है। यह समिति दक्षिणी दिल्ली के किसी सरकारी संस्थान से जल्दी ही काम करना शुरू कर देगी। इससे जुड़ी आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं।  


समिति की जानकारी देते हुए श्री चमूकृष्ण शास्त्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय भाषाओं के विकास में विशेष रुचि ले रहे हैं। इसलिए उनके मार्गदर्शन और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की विशेष पहल पर इस समिति का गठन किया गया है। वैसे तो समिति के पास अनेक कार्य हैं, लेकिन मुख्य कार्य है— समय-समय पर भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए सरकार को परामर्श देना। इसके साथ ही यह समिति नई शिक्षा नीति के सफल क्रियान्वयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।


श्री शास्त्री के अनुसार समिति छात्रों और शोधार्थियों के लिए भारतीय भाषाओं में आवश्यक पठन सामग्री तैयार करेगी। शिक्षा मंत्रालय ने यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भारतीय भाषाओं के विकास को लेकर की गई विशेष अनुशंसाओं के बाद उठाया है। उल्लेखनीय है कि इस नीति में विद्यालयों में छात्रों को स्थानीय भाषाओं में पढ़ाने के अलावा सभी भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इनमें वे भाषाएं भी शामिल हैं जो विलुप्त हो चुकी हैं या फिर विलुप्त होने के कगार पर हैं। एक अध्ययन के अनुसार गत 50 वर्ष में भारत में लगभग 220 भाषाएं लगभग लुप्त हो चुकी हैं। इस अध्ययन में यह भी बताया गया है कि इन भाषाओं की उचित देखरेख न होने से ऐसा हुआ है। यूनेस्को की एक रपट में भी कहा गया है कि 197 भारतीय भाषाएं लगभग विलुप्त हो चुकी हैं।


इसीलिए नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के विकास, संरक्षण और संवर्धन पर जोर दिया गया है। श्री शास्त्री ने बताया कि नवगठित समिति सरकार द्वारा संचालित भाषा संस्थानों, भाषा विश्वविद्यालयों और भाषाओं की परिषदों के कार्यक्रमों को बनाने और उनकी गति बढ़ाने संबंधी परामर्श देगी। यह समिति संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं के प्रचार, संवर्धन के लिए भी कार्ययोजना बनाएगी एवं भारतीय भाषाओं के विकास के लिए तकनीकी का उपयोग करने का परामर्श देगी। समिति को हर प्रकार की शिक्षा के लिए डिजिटल पठन सामग्री बनाने का भी अधिकार दिया गया है।


समिति मंत्रालय को पांचवीं कक्षा तक की शिक्षा मातृभाषा में  दिए जाने का सुझाव भी देगी। समिति को यह भी दायित्व दिया गया है कि वह ऐसा वातावरण बनाए  जिसमें भाषाओं के माध्यम से समाज में सद्भाव और समरसता बढ़े, विषमता दूर हो। समिति से कहा गया है कि वह कौशल विकास शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा का पाठ्यक्रम भारतीय भाषाओं में तैयार करे ताकि भाषाएं रोजगार का माध्यम बनें। समिति के पास यह भी काम है कि वह देश में भारतीय भाषाओं को सीखने की मानसिकता और वातावरण बनाए जिससे सारी भारतीय भाषाओं के प्रति आत्मीयता बढ़े।


श्री शास्त्री ने स्पष्ट किया कि कोई यह न समझे कि यह समिति किसी भाषा का विरोध करने के लिए बनाई गई है। किसी भी भाषा के विरोध का प्रश्न ही नहीं है और न ही आगे रहेगा। हां, इतना अवश्य है कि सभी भाषाओं को फलने-फूलने का अवसर मिले, इस दिशा में जो भी कार्य करना होगा, वह किया जाएगा।


उन्होंने कहा कि समिति को ऐसा वातावरण और मानसिकता बनाने का दायित्व सौंपा गया है जिससे व्यक्तित्व-विकास, ज्ञान, रोजगार, मनोरंजन, देश की एकता के लिए जो-जो भाषाएं सीखना आवश्यक है, लोग वे सभी भाषा सीखेंं। इसके लिए समिति कार्यशाला, गोष्ठी आदि गतिविधियों का सहारा लेगी। समिति भारतीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार करने के साथ-साथ शिक्षकों के प्रशिक्षण आदि की भी व्यवस्था करेगी।

श्री शास्त्री ने आगे कहा कि किसी भी भाषा के विकास के लिए सात आवश्यकताएं होती हैं। पहली, उस भाषा को बोलने या प्रयोग करने वाले लोग। दूसरी, माध्यम के रूप में प्रयोग जैसे शिक्षा, प्रशासन, मनोरंजन, संचार आदि में उस भाषा का कितना और किस तरह से प्रयोग हो रहा है। तीसरी, समकालीन साहित्य। चौथी, शब्द निर्माण सात्यता यानी समयानुसार शब्दों का निर्माण। पांचवीं, तकनीकी का प्रयोग। छठी, सामाजिक आश्रय और सातवीं, सरकारी आश्रय। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मंत्रालय ने समिति को यह अधिकार भी दिया है कि वह उप-समितियों का भी गठन कर सकती है। साथ ही आवश्यकता पड़ने पर शोध और दूसरे कार्यों के लिए किसी भी शैक्षणिक संस्थान की सहायता ले सकती है।   

 

समिति इन विषयों पर परामर्श देगी

  • अनुसूचित भाषाओं के साथ सभी श्रेणियों की भाषाओं, जिनमें लुप्तप्राय, गैर-अनुसूचित, जनजातीय, शास्त्रीय भाषाएं शामिल हैं, का उपयोग सुनिश्चित करना।

  •  भारतीय भाषाओं में पढ़ने-पढ़ाने की सुविधा जुटाने, भाषा शिक्षक, अनुसंधान, भाषा शब्दकोश, अनुवाद आदि को बढ़ावा देने की अनुशंसा करना।

  •  भाषाओं के माध्यम से रोजगार के अवसरों में सुधार के तरीकों की अनुशंसा करना।

  •  नई शिक्षा नीति 2020 को देखते हुए भारतीय भाषाओं के विकास को लेकर सुझाए गए उपायों की रूपरेखा बनाना और उनका क्रियान्वयन करना।

  •  विद्यालयीन और उच्च शिक्षा की पढ़ाई भारतीय भाषाओं में कराने और अध्ययन में सुधार के लिए संस्थागत ढांचे का अध्ययन और परामर्श देना।

  •  शैक्षणिक संस्थाओं में भाषा शिक्षण से जुड़ी सुविधाओं का सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित करना।

  •  छात्रों और शोधार्थियों की सहायता के लिए विभिन्न भाषाओं में तकनीकी साधन और प्रयोगशाला उपलब्ध कराने की अनुशंसा करना।

  •  भाषा संस्थानों को बढ़ावा देना और उन्हें बहु-विषयक बनाना।

 

Comments
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Keshav Mishra
on Dec 01 2021 17:13:54

सही दिशा कि ओर एक कदम । भाषा पर ध्यान जरूरी हैं, नहीं तो विलुप्त होते समय नहीं लगेगा । मैं मेरा मातृ भाषा मैथिली और राष्ट्र भाषा हिंदी हैं। मेरी कोशिश रहेगी कि मैं ज्यादा लोगो को इस भाषा के लिए प्रेरित करू। और बारम बार श्री शास्त्री जी को धन्यवाद । जो संस्कृत भाषा के लिए विश्व भर में क्रांति ला सकते हैं। तो 14 भाषाओं जो की बहुसंख्यक रूप से बोला और लिखा जाता हैं। उनके पास बहुतों नीति / योजना है जो भाषा संवर्धन के लिए उपयुक्त होगा 🙏🙏

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