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सम्पादकीय

इस्लामी उन्माद की पदचाप

WebdeskAug 22, 2021, 09:06 AM IST

इस्लामी उन्माद की पदचाप

हितेश शंकर


कराची के पूर्व मेयर आरिफ अजाकिया ने लंदन में कैमरे के सामने कहा कि पाकिस्तान में प्रति वर्ष 1,000 हिंदू व अन्य अल्पसंख्यक लड़कियों को अगवा कर उनका मजहब बदल निकाह कराया जाता है। इस वजह से पाकिस्तान में अल्पसंख्यक परिवार बेटियों के जन्म पर घबराते हैं



अफगानिस्तान, पाकिस्तान के ताजा घटनाक्रम का जो असर भारत में दिख रहा है, उसके विविध आयामों का विवेचन आवश्यक है। अमेरिका के अपनी सेना की वापसी की घोषणा किए जाने के बाद से ही अफगानिस्तान के विभिन्न हिस्सों पर कब्जा करने के लिए तालिबानी लड़ाकों ने आगे बढ़ना शुरू कर दिया था। 15 अगस्त को आखिरकार काबुल पर भी तालिबानी कब्जा हो गया। इस बीच अफगानिस्तान में अफरातफरी और बदहवासी का माहौल है।

भागते लोगों पर तालिबानी गोलियों की वर्षा कर रहे हैं। औरतें त्राहिमाम् कर रही हैं, बच्चे अपनों से बिछड़ रहे हैं, मारे जा रहे हैं। तालिबान ने शरिया कानून लागू करने की घोषणा कर अफगानियों को अब तक प्राप्त स्वतंत्रता पर अंकुश लगा दिया है। रूस, चीन और पाकिस्तान के अतिरिक्त अन्य सभी देशों ने काबुल स्थित अपने दूतावासों से कर्मियों को वापस बुला लिया है। कुल मिलाकर स्थिति भयानक है।


अफगानिस्तान के अंतर्विरोध :
अफगानिस्तान में जो मजहब के नाम पर हो रहा है क्या वास्तव में वही इस्लाम है? यह सवाल इसलिए सदा की तुलना में ज्यादा बड़ा हो गया है क्योंकि आज जो कुछ मजहब के नाम पर हो रहा है, उस पर कोई शर्मिंदा नहीं दिख रहा। तालिबान ने जताया है कि वह पहले वाला तालिबान नहीं है। यदि वे ऐसा कहते हैं तो संगसार करने वाले, कोड़े मारने वाले, चोरी करने पर हाथ काटने वाले, शरिया को सख्ती से लागू करने वाले तालिबान का यह बदला हुआ रूप कैसा है! यह देखना बाकी है। पिछले 20 वर्ष में अफगानिस्तान में एक पूरी पीढ़ी जवान हुई है जिसने तालिबान को नहीं देखा। यह पीढ़ी तालिबान को किस तरह स्वीकार करेगी? यदि तालिबान आधुनिक बनने का प्रयास करता है तो उसका उत्पात मचाता, बर्बरता करता कैडर सवाल पूछेगा। अगर कोई बदलाव नहीं आता तो अफगानिस्तान में भीतरी अंतर्विरोध और गहरे होंगे।

दूसरी बात, यदि वे बदले हैं तो यह बदलाव हथियारों के बूते ही क्यों दिखाई दे रहा है। यदि बदल गए हैं तो सशस्त्र हमलावर के रूप में आकर लड़कर कब्जा करने के बजाय तालिबान लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव लड़कर क्यों नहीं आए? आधुनिक शिक्षा की बात करेंगे या इस्लामी शिक्षा होगी। स्त्रियों के अधिकार कैसे होंगे। दुनिया में इंडोनेशिया, मलेशिया, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान, उज्बेकिस्तान इत्यादि जैसे और भी इस्लामी देश हैं परंतु वहां लड़कियों को कामकाज की स्वतंत्रता है। अफगानिस्तान में तालिबान के इस्लामी शासन में अन्य इस्लामी देशों जितनी स्वतंत्रता मिलेगी या उनसे अधिक? ये सवाल तालिबान को दोहरे तौर पर मथेंगे। एक, सिरा होगा उसका अपना कट्टर जनाधार है, दूसरे, जनता। जिन पर वह शासन कर रहा है।
यह

ठीक है कि एक बदलाव आया है किन्तु विश्व इसे बड़ी सतर्कता और आशंका से देख रहा है। अन्य के नजरिये से अलग एक और बात है। 2013 के प्यू सर्वेक्षण के मुताबिक 84 प्रतिशत पाकिस्तानी और 99 प्रतिशत अफगानिस्तानी शरिया कानून चाह ही रहे थे। यदि ऐसा है तो अफगानिस्तान के इस्लामी बदलाव, और इस शासन में जो हो रहा है, उससे वहां भगदड़ क्यों है? आम अफगानी हवाई जहाज के टायरों से लटक-लटककर भी, मरते-पिटते भागने को क्यों तैयार हैं? शहरों, रिहाइशी इलाकों से झुंड के झुंड इनसान इस्लाम की पकड़ से निकल भागने के लिए बौखलाए फिर रहे हैं। यदि यही इस्लामी व्यवस्था है, और यह एक सी है तो अफगानिस्तान में दहशत और पाकिस्तान में जश्न क्यों है?


पाकिस्तान के अंतर्विरोध :
पाकिस्तान की बात करें तो शरिया तो पाकिस्तान ने भी चाहा था, इसीलिए इस्लामी राष्ट्र बनाया था। पाकिस्तान के नीति-नियंताओं ने भी तब एक गारंटी दी थी कि देश में अल्पसंख्यकों के लिए एक सम्मानित, सुरक्षित जगह होगी। यह गारंटी एक छलावा साबित हुई। पाकिस्तान अल्पसंख्यकों को लीलने वाला अंधा कुआं बन गया। कराची के पूर्व मेयर आरिफ अजाकिया ने लंदन में कैमरे के सामने कहा कि पाकिस्तान में प्रति वर्ष 1,000 हिंदू व अन्य अल्पसंख्यक लड़कियों को अगवा कर उनका मजहब बदल कर निकाह कराया जाता है। इस वजह से पाकिस्तान में अल्पसंख्यक परिवार बेटियों के जन्म पर घबराते हैं। पाकिस्तानी, अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने पर जश्न मना रहे है, जहां तालिबानी मुस्लिम लड़कियों को ही उनके घरों से उठा रहे हैं। अगर ऐसा शासन पाकिस्तान में आता है तो पाकिस्तानियों की लड़कियां भी कहां बच पाएंगी? अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आते ही पाकिस्तान में महाराजा रंजीत सिंह की मूर्ति तीसरी बार तोड़ी गई। पाकिस्तान में उसके स्वतंत्रता दिवस पर उसके अपने ही यहां की एक बेटी के कपड़े फाड़, चौराहे पर नंगा कर उसे भीड़ में उछाला गया। अफगानिस्तान में घरों से उठाई लड़कियों को लड़ाकों को बांटते या पाकिस्तान में बेटियों को नोचता 'इस्लामी हुजूम' नागरिक समाज को उन्माद, उपद्रव और अराजकता की बारूद के प्रति आगाह कर रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सत्ता संभालते वक्त दावा कर रहे थे कि नया पाकिस्तान बनाएंगे। अफगानिस्तान से जिस तरह की खबरें व तस्वीरें आ रही हैं, उससे लगता है कि बदहवास अफगानी बेटियां तालिबानी लड़ाकों के लिए मांस की बोटियों से ज्यादा की अहमियत नहीं रखतीं, वैसा ही नजारा पाकिस्तान में दिख रहा है।


भारत की चिंता का सबब
भारत ने अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता के लिए बड़ा निवेश किया था और अफगानी जनता को भारत से बहुत आशाएं थीं। पाकिस्तान आतंकवाद का निर्यात करता था और भारत स्थिरता और विकास की आशा का केंद्र बना हुआ था। अब पाकिस्तान ने चीन के साथ अफगानिस्तान में सेंध लगा दी है और तालिबानी रहनुमाओं से बात कर रहा है। तो भारत एक कदम पीछे हटा हुआ दिखाई देता है। इस बीच भारत मे शांति, स्थिरता, विकास के पक्षधर होने का दम भरने वाली प्रगतिशील ब्रिगेड के मुंह पर भी इस्लामी तमाचा पड़ा है। जब वे प्रगतिशीलता और मानवाधिकारों की बात भूल गए।
वे शिक्षा की बात, स्त्री अधिकारों की बात भूल गए। वे हजारों-लाखों लोगों के पलायन के प्रति आंखें मूंदे बैठे हैं।


वे इस बात से चिंतित नहीं है कि ताजा घटनाक्रम से अफगानिस्तान के समाज जीवन को क्या धक्का पहुंचेगा या अफगानियों के मानवाधिकारों का क्या होगा। वे अपनी चोट छिपाते, गाल सहलाते तालिबानियों द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस पर ताली बजा रहे हैं। जाहिर है, उन्माद के इस भारी तूफान में भारत के प्रगतिशील बराबर के भागीदार हैं। भारत में सोशल मीडिया पर भी बहुत सारे ऐसे समूह उजागर हुए हैं जहाँ मुस्लिम हुजूम उमड़ रहा है। इन समूहों में यह बात खुलकर रखी जा रही है कि तालिबान अपनी स्वतंत्रता के लिए किए जाने वाली कोशिशों और जद्दोजहद की मिसाल है। आश्चर्य की बात है कि इस तरह की चर्चाओं में बहुत सारे मुस्लिम और कथित प्रगतिशील पत्रकार, बुद्धिजीवी भी दिख रहे हैं।


बहरहाल, उन्माद का नंगा नाच कैसा होता है, यह अफगानिस्तान में दिखा है, महाराजा रंजीत सिंह की प्रतिमा के ध्वंस में दिखा है, लाहौर के इकबाल पार्क में इसका सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ है। भारत में यदि इस उन्माद को खाद-पानी देने का काम करने वाली ताकतों पर नकेल नहीं कसी गई तो अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान से उठती आहटें बड़ी चिंता का कारण बन सकती हैं।

@hiteshshankar

 

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Comments
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Anonymous
on Sep 03 2021 08:31:24

राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करनेवाला प्रेरक आलेख।नमन

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Anonymous
on Aug 24 2021 16:17:23

जी बिल्कुल

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राकेश सिंह चन्देल
on Aug 22 2021 15:20:16

जो कुत्ते आज भौंक रहे हैं, कल वे मौका मिलने पर काट भी सकते हैं। इसलिए ऐसे कुत्तों का स्थायी उपचार आवश्यक हो गया है।

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