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विदेशी आक्रांता, संघर्ष और सिख गुरु

WebdeskAug 15, 2021, 06:17 AM IST

विदेशी आक्रांता, संघर्ष और सिख गुरु

चन्दन आनन्द


सिख पंथ देश और धर्म की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर करता आया है। रियासती राज के काल में सिखों के पहले गुरु नानक देव बाबर के आक्रमण को हिंदुस्थान पर आक्रामण बताते हैं। पांचवें गुरू अर्जन देव और नौवें गुरु तेग बहादुर इस्लाम स्वीकार करने के बजाय जान देना पसंद करते हैं। दसवें गुरु गोबिंद सिंह खालसा पंथ की स्थापना के लिए देश की अलग-अलग दिशाओं से पंजप्यारे बुलाते हैं


भारतीय दशगुरु परम्परा का संपूर्ण इतिहास, गुरु नानक देव से लेकर गुरु गोबिंद सिंह तक विदेशी मुगल आक्रांताओं (बाबर से लेकर औरंगजेब तक) से संघर्ष का रहा है। भारत पर बाबर के आक्रमण के समय गुरु नानक देव ने इसे केवल पंजाब पर नहीं अपितु पूरे भारत पर हमला बताते हुए कहा था- खुरासान खसमाना किआ हिंदुसतानु डराइआ।। आपै दोसु न देई करता जमु करि मुगलु चड़ाइआ।। अर्थात बाबर ने हमला करके पूरे हिन्दुस्तान को डराया है और मुगल मृत्यु का दूत बनकर यहां आए हैं।


सन् 1606 में पांचवें गुरु अर्जन देव जहांगीर के काल में वीरगति को प्राप्त होते हैं। जहांगीर की आत्मकथा तुजक-ए-जहांगीर में उल्लेख है, व्यास नदी के तट पर स्थित गोइंदवाल में अर्जुन नामक एक हिंदू रहता था...हमने कई बार सोचा कि उस हिंदू को मुसलमान बना लें, लेकिन ऐसा हो न सका....उसने खुसरो के माथे पर केसर का टीका लगाया जिसे हिंदू शुभ मानते हैं...इसका पता चलते ही हमने उसके निवास और संतानों को मुर्तजा खान के सुपुर्द कर दिया और उसे खत्म करने का निर्देश दिया।


सन् 1675 में लाल किले के सामने देश और धर्म की रक्षा के लिए हिंद दी चादर गुरु तेग बहादुर ने अपना बलिदान दिया। मुगल आक्रांता औरंगजेब ने इस्लाम कबूल न करने पर गुरु तेग बहादुर को जिस स्थान पर कत्ल करवा दिया था, वहां आज श्री शीशगंज गुरुद्वारा है। बिहार के पटना में जन्मे दशमगुरु गोबिंद सिंह ने धर्म और देश की रक्षा के लिए 1699 में बैसाखी के दिन श्री आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की नींव रखी। उस समय गुरु गोबिंद सिंह के आह्वान पर पूरे देश के हर कोने से अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग खालसा सेना का हिस्सा बनने आनन्दपुर आए थे। गुरु गोबिंद सिंह के आह्वान पर देश और धर्म के लिए बलिदान देने वाले पहले पंज प्यारे दया राम, धर्म चन्द, हिम्मत राय, मोहकम चन्द एवं साहिब चन्द, लाहौर, हस्तिनापुर (मेरठ), जगन्नाथपुरी (ओडिशा), द्वारिका (गुजरात) और बीदर (कर्नाटक) के रहने वाले थे। यदि लड़ाई पंजाब की या किसी अन्य धर्म की होती तो गुरु गोबिंद सिंह पूरे देश से लोगों को न बुलाते और पहले पंजप्यारे भारत की सभी दिशाओं से न होते।


सुपुत्रों को देश और धर्म की वेदी पर बलिदान करने के बाद महाराष्ट्र के नांदेड़ जाकर गुरु गोबिंद सिंह ने जम्मू के एक क्षत्रिय डुग्गर युवक वीर बन्दा बैरागी को खालसा सेना का पहला सेनापति नियुक्त कर उत्तर भारत से मुगल साम्राज्य की समाप्ति का मार्ग प्रशस्त किया। उसी दौरान गुरु के अस्तित्व से विचलित औरंगजेब ने नांदेड़ में दो पठानों को भेज कर गुरु गोबिंद सिंह को भी कत्ल करवा दिया। महाराष्ट्र के नांदेड़ में जहां गुरु गोबिंद जी का बलिदान हुआ, आज वहां श्री नांदेड़ साहेब गुरुद्वारा है।


भारत में विदेशी मुगल आक्रमण के समय गुरु नानक देव ने पूरे देश की यात्रा कर लोगों से संवाद स्थापित कर जनजागरण किया। इस दौरान गुरु नानक देव भारत के सुदूर क्षेत्रों अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम तक भी गए। इन दोनों प्रदेशों में उन्हें नानक लामा कहा जाता है और अनेक स्थान नानक लामा को समर्पित हैं। अनेक मठों में उनके चित्र भी मिलते हैं। सिख इतिहासकार मदनजीत कौर (1978) ने गुरु तेग बहादुर, गुरु गोबिंद सिंह और गुरू परिवार के अन्य सदस्यों की यात्रा के अभिलेख प्रकाशित करवाए हैं। इसमें वर्णित है कि गुरु तेग बहादुर सर्वप्रथम 1662 में गंगा स्नान हेतु त्रिवेणी (प्रयागराज) गए। वहां अपनी पूरी वंशावली का वर्णन करते हुए स्वयं को कौशिक गौत्र एवं सोढी खत्री वर्ण का बताया। इसके बाद गुरु गोबिंद सिंह की प्रयागयात्रा और गंगा स्नान का इसमें वर्णन है। 

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Comments
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Anonymous
on Aug 17 2021 16:39:30

waheguru

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Anonymous
on Aug 15 2021 08:03:10

Good

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