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स्वातंत्र्य समर और स्वदेशी विज्ञान

WebdeskAug 15, 2021, 06:30 AM IST

स्वातंत्र्य समर और स्वदेशी विज्ञान

जयंत सहस्रबुद्धे


भारत को अंग्रेजी शासन से मुक्ति 1947 में भले ही मिली, लेकिन उसके लिए बहुत लंबा और विविध आयामी संघर्ष चला था। समाज जीवन के हर क्षेत्र में स्वराज के लिए सर्वस्व अर्पित कर राष्टÑ के स्वाभिमान की रक्षा करने के संकल्प लिए गए थे। विज्ञान के क्षेत्र में भी अनेक विभूतियों ने भारत को विश्वगुरु बनाने का किया था प्रण


इस 15 अगस्त से हम स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। यह महोत्सव इस 75वें स्वतंत्रता दिवस से 2022 के 15 अगस्त तक चलेगा। इस अवसर पर स्वाभाविक है कि जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष किया, बलिदान दिया, सर्वस्व का त्याग किया, ऐसे सभी महानुभावों का स्मरण करना हम सभी का कर्तव्य है। स्वतंत्रता आंदोलन का जब विचार होता है तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक क्षेत्र का परिदृश्य सामने आता है। लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन का जो काल था उसमें केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए लड़ाई चली थी।  


विज्ञान भारती का यह दायित्व है कि विज्ञान के क्षेत्र में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हुए संघर्ष की अनकही गाथा को समाज के सामने प्रस्तुत किया जाए। हम जानते हैं कि देश में आधुनिक विज्ञान अंग्रेजों के द्वारा अवतरित हुआ। अन्य आक्रमणकर्ताओं और अंग्रेजों के आक्रमण में एक मौलिक अंतर यह था कि अंग्रेजों के पूर्व जितने आक्रमणकर्ता थे, उनके पास विज्ञान नहीं था लेकिन अंग्रेजों के पास विज्ञान था। अंग्रेज मूलरूप से व्यापारी के रूप में भारत आये। आगे चलकर उनकी भूख बढ़ गयी और उन्होंने भारत में राज स्थापित किया।

भारत पर नियंत्रण की चाल
अंग्रेजों की जीत प्रारंभ जून 1757 की पलासी की लड़ाई से माना जाता है। 1818 में पुणे में पेशवा को पराजित कर अंग्रेजों ने आज के भारतवर्ष पर नियंत्रण स्थापित किया। इस दौरान अंग्रेजों ने भारतीयों  की पहचान को तोड़कर उनको अंग्रेजी पहचान देना शुरू किया। उन्होंने यह कहना शुरू किया, ‘आपका देश तो अंधकार में डूबा हुआ है। लोग तो अंधविश्वास के आधार पर ही जीते हैं। तर्क क्या होता है, भारत वालों को नहीं पता।’ वे इस प्रकार की बातें सतत अपने देश के लोगों को बताते रहे। अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने और भारत के लोगों को नीचा दिखाने के लिए उन्हें सबसे प्रभावी साधन लगा उनके यहां की औद्योगिक क्रांति, यानी उनके द्वारा निर्मित तंत्र ज्ञान। रेल लाइन, टेलीग्राफ, पोस्ट आॅफिस, चार पहिए की गाड़ी आदि। अंग्रेज पश्चिम का चिकित्सा तंत्र लाये। इन सब चीजों के कारण अपने देश के लोग काफी प्रभावित हुए। उनको लगने लगा कि पश्चिमी सभ्यता ही सबसे श्रेष्ठ सभ्यता है। हम तो पिछड़े हुए लोग हैं।

अंधकार में डूबे हुए लोग हैं। ऐसी मानसिकता यहां सबकी बन गयी। उसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे  आधुनिक विज्ञान को भारत में सिखाना प्रारंभ किया। उसमें भी यह नीति थी कि यहां पर सैद्धांतिक रूप से इनको थोड़ा-थोड़ा सिखाएंगे लेकिन प्रयोग नहीं करने देंगे। प्रयोगशाला स्थापित नहीं करने देंगे। अपने देश में इसके विरोध में राष्टÑीय भाव से पहली बार विज्ञान के क्षेत्र में स्वदेशी भाव का प्रकटीकरण हुआ। अपने देश में डॉ. महेन्द्र लाल नामक स्वास्थ्य विभाग के बड़े डॉक्टर थे। विशेषता यह थी कि बंकिम चंद चटर्जी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस जैसे लोग डॉ. महेन्द्र लाल के प्रशंसक थे। भारत में उस समय होमियोपैथी जर्मन लोगों के द्वारा आ गयी थी। जर्मनी इंग्लैंड का एक बहुत बड़ा शत्रु देश था। इसलिए जर्मनों का यहां पर जो कुछ होता था अंग्रेज लोग उसका विरोध करते थे। एक जर्मन पादरी के द्वारा होमियोपैथी अपने देश में आयी। आज जैसे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन आयुर्वेद का विरोध करती है उसी प्रकार उस समय ब्रिटिश मेडिकल एसोशिएशन होमियोपैथी का विरोध करती थी। डॉक्टर महेन्द्र लाल सरकार भी होमियोपैथी का अपमान करने वालों में अग्रणी थे।

स्वदेशी विज्ञान संस्था
एक बार एक रोगी डॉ. महेन्द्र लाल सरकार के उपचार से ठीक नहीं हो पाया और होमियोपैथी की दवाओं से ठीक हो गया। डॉ. सरकार के अहंकार को इससे बड़ा धक्का लगा। लेकिन वे जिज्ञासु थे, इसलिए उन्होंने होमियोपैथी के बारे में अध्ययन शुरू किया। उनके ध्यान में आया कि अंग्रेज जो बता रहे हैं कि होमियोपैथी तर्क के आधार पर विकसित विज्ञान नहीं है, लेकिन यह तो तर्क के आधार पर बना विज्ञान है। एक वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति है। तब उन्होंने ब्रिटिश मेडिसिन एसोसिएशन की एक सभा में होमियोपैथी की अभ्यासपूर्ण प्रस्तुति की। इसके बाद अंग्रेजों को इतना गुस्सा आया कि डॉ. सरकार को ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन से बहिष्कृत कर दिया गया। उनके साथ जो व्यवहार हुआ उससे उन्हें यह सीख मिली कि अंग्रेज हमें विज्ञान का अच्छी प्रकार से ज्ञान नहीं होने देंगे। वे कुछ बातें अपने हाथ में ही रखेंगे। तब डॉ. सरकार ने एक संकल्प किया कि ‘मैं भारत में भारतीय लोगों के द्वारा निर्मित भारतीय लोगों को विज्ञान में आगे बढ़ाने वाली विज्ञान संस्था का निर्माण करूंगा’। 1868 में उन्होंने इस प्रकार का संकल्प लिया। 1876 में यह संस्था प्रारंभ हुई जो अपने देश की पहली राष्टÑीय विज्ञान संस्था है, नाम है ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन आॅफ साइंस’।

यह संस्था कोलकाता में स्थापित हुई। भारत की विज्ञान क्षेत्र की पहली पीढ़ी जगदीश चंद्र बसु, प्रफुल्ल चंद्र राय, आशुतोष मुखर्जी आदि ये सारे विज्ञान क्षेत्र के अग्रणी लोग इसी संस्था से विज्ञान पढ़कर निकले। जगदीश चंद्र बसु 1884 में इंग्लैंड से भौतिक विज्ञान की उच्च शिक्षा लेकर भारत लौटे थे। उस समय यहां विज्ञान के क्षेत्र में पढ़ाना ही एकमात्र काम होता था। लेकिन अंग्रेजों ने उनका भौतिक विज्ञान के अध्यापक का आवेदन स्वीकृत नहीं किया क्योंकि अंग्रेजों ने कहा, भारत के लोगों में तर्कपूर्ण विचार करने की क्षमता ही नहीं है।  बसु ने इस अन्याय को सहन न करते हुए उसके विरोध में खड़े होने का निश्चय किया। उन्होंने भौतिक विज्ञान पढ़ाना शुरू किया। इस प्रकार उनका यह सत्याग्रह लगातार 3 साल तक चला।

उन्होंने 3 साल बिना वेतन भौतिक विज्ञान पढ़ाया।  अंग्रेजों ने भारत में शोध कार्य को दबा कर रखा था। जगदीश चंद्र बसु ने विचार किया कि मैं इस देश में अनुसंधान विज्ञान प्रारंभ करूंगा। संसाधन नहीं थे, परंतु देश के प्रति एक संकल्प था। उन्होंने अपने ही प्रयास के द्वारा 1894 में प्रयोगशाला स्थापित की। सूक्ष्म तरंगों का निर्माण, उसकी निर्मिति प्रयोग के द्वारा की। जो यूरोप का व्यक्ति नहीं कर सका, जो एक पिछड़ा हुआ, तर्कपूर्ण विचार नहीं कर सका, ऐसा एक भारतीय व्यक्ति कर पाया। 1895 में उन्होंने अंग्रेजों को चुनौती दी, ललकारा और सिद्ध करके दिखाया कि ये मैं कर सकता हूं। यह एक प्रकार की लड़ाई ही थी। केवल रास्ते पर उतर कर इंकलाब जिंदाबाद का नारा देते हुए गोली खाना, लाठी खाना और कारावास जाना ही संघर्ष नहीं होता।

रसायन औषधि क्षेत्र में कदम
इसके साथ ही उनके बाद आए प्रफुल्ल चंद्र राय। वे भी इंग्लैंड से रसायन विज्ञान में डॉक्टरेट करके आये। आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने स्वदेशी उद्योग प्रारंभ किया। उन्होंने बंगाल फार्मास्यूटिकल नाम से देश का पहला रसायन औषधि निर्माण उद्योग शुरू किया। साथ ही उन्होंने 1902 में द हिस्ट्री आॅफ हिन्दू केमिस्ट्री नामक ग्रंथ लिखा। यह विश्व के लिए एक बहुत बड़ी प्रस्तुति थी। इससे विश्व की आंखें खुल गयीं कि भारत में इतने प्राचीन काल से विज्ञान स्थापित है। ‘नेचर’ नाम की विज्ञान क्षेत्र की विश्व की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका ने द हिस्ट्री आॅफ हिन्दू केमिस्ट्री के अध्याय लगातार पत्रिका में प्रकाशित किये। यह कितना बड़ा सम्मान है। वे रसायन विज्ञान का उपयोग क्रांतिकारियों के लिए शस्त्र बनाने, बम बनाने इत्यादि का प्रशिक्षण देने के लिए करते थे। आगे चलकर आशुतोष मुखर्जी ने विज्ञान क्षेत्र में विश्व में एक बहुत बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया। उस समय कोलकाता में ही कार्यरत एक दक्षिण भारतीय वैज्ञानिक थे, चंद्रशेखर वेंकटरमन। वे कोलकाता में ब्रिटिश शासन  में नौकरी करते थे लेकिन भौतिक विज्ञान में रुचि थी। आशुतोष मुखर्जी उन्हें ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन आॅफ साइंस’ में लेकर आये। इसी संस्था के एक सदस्य, रमन ने भारत का एकमात्र विज्ञान क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया।

इंडियन एसोएिशन फॉर कल्टीवेशन आॅफ साइंसेस वह उर्वरा भूमि थी जहां से देशभक्त वैज्ञानिक तैयार हुए। इन्होंने भारत की पहचान को स्थापित किया। उन्होंने अंग्रेजों के भारत के स्व को मिटानेक े प्रयास को चुनौती दी। संपूर्ण भारत की संस्कृति की पहचान यानी भारत के विज्ञान को स्थापित किया। प्रमथनाथ बोस ऐसे ही भूगर्भ विज्ञानी थे। उन्होंने जियोलॉजिकल सर्वे आॅफ इंडिया में बहुत अच्छा काम किया लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें इस संस्था का कभी भी प्रमुख नहीं बनाया। कारण यह दिया कि भारत की व्यक्ति चल ही नहीं सकता उससे दौड़ने की अपेक्षा कैसे रख सकते हैं? इसके विरोध में प्रमथनाथ बोस ने वहां से त्यागपत्र दे दिया। अपने देश में लोहा उद्योग खड़ा करने वाले जमशेदजी टाटा के नाम से जहां आज जमशेदपुर या टाटानगर है, वह स्थान भी प्रमथनाथ बोस ने ही बताया था। 1907 में वहां देश का पहला लोहा उद्योग खड़ा किया गया था। यानी 1901 में प्रफुल्ल चंद्र राय ने रसायन निर्माण उद्योग शुरू किया। स्वदेशी लोहा निर्माण उद्योग जमशेदजी टाटा के प्रयासों से 1907 में उनके बड़े पुत्र दोराबजी टाटा ने शुरू किया।

 इस प्रकार से अपने देश में स्वदेशी ज्ञान, स्वदेशी विज्ञान, स्वदेशी उद्योग आदि को साधन बनाकर अंग्रेजों को चुनौती देना, प्रत्याघात करना, ये सब विज्ञान जगत के लोगों ने किया। 1916 में जब पंडित मदनमोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय प्रारंभ किया तब उसके उद्घाटन के निमित्त उन्होंने आचार्य जगदीश चंद्र बसु को आमंत्रित किया। जगदीश चंद्र बसु ने उस अवसर पर कहा कि मुझे बहुत खुशी है कि मालवीय जी के द्वारा अपने देश में ज्ञान की नालंदा, तक्षशिला विश्वविद्यालयों की परंपरा रही है उसका पुर्नजागरण हो रहा है इस काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के द्वारा। उन्होंने मालवीय जी को कहा कि आपने आॅक्सफोर्ड, हार्वर्ड, केंब्रिज आदि की नकल नहीं की, यही सबसे बड़ी बात है। उन्होंने कहा कि अब हमें विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करके नये ज्ञान की निर्मिति करते हुए विश्वगुरु बनना है। हमें फिर एक बार उस स्थान को प्राप्त करना है। ये जो सारे अपने देश के श्रेष्ठ वैज्ञानिक रहे, जिन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में देशभक्ति का ज्वार उठाया। इन सारी बातों को हमें ध्यान में रखना है।

आज अपने देश में जब हम स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण करते हैं तो केवल राजनीतिक लोग ही ध्यान आते हैं। क्या कभी हम यह सोचते हैं कि आचार्य जगदीश चंद्र बसु, डॉ. महेन्द्र लाल सरकार, आचार्य प्रफुल्ल चंद्र, चंद्रशेखर वेंकटरमन आदि भी स्वतंत्रता आंदोलन के एक बहुत ही अभिन्न अंग थे! ये भी अपने देश के स्वतंत्रता सेनानी थे। स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव वर्ष के निमित्त हम अपने देश के स्वातंत्र्य योद्धाओं का स्मरण करते वक्त उसमें इन वैज्ञानिकों का भी स्मरण करना हम सभी का दायित्व है। हमें विश्वगुरु बनने के लिए आगे बढ़ना है। उनका यह सपना साकार करने का दायित्व हम सभी के कंधों पर है। इसको ध्यान में रखकर संकल्प के साथ स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की तैयारी में हम सब जुटें।


(लेखक विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री हैं)

 

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Comments
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Ram Prasad Prajapati
on Aug 16 2021 07:44:03

भाई साहब बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख।

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