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राज्य

इस्लामी देशों में कम जबकि गैर-इस्लामी देशों में अंधाधुंध बढ़ रही मुस्लिम जनसंख्या

WebdeskAug 30, 2021, 01:43 PM IST

इस्लामी देशों में कम जबकि गैर-इस्लामी देशों में अंधाधुंध बढ़ रही मुस्लिम जनसंख्या


कुरान पर आधारित इस्लाम के सिद्धांतों को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि जब तक पूरा विश्व इस्लाम नहीं अपना लेता, प्रत्येक मुस्लिम को अपनी हैसियत के अनुसार इस्लाम को फ़ैलाने के लिए जिहाद करना है। इस तरह के कुत्सित विचार को ध्यान में रखते हुए बढ़ती जनसंख्या जिहाद का ही एक रूप है




गोपाल गोस्वामी


पिछले दिनों दिल्ली के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय को मुस्लिम विरोधी नारे लगाने वाली भीड़ को कथित रूप से जुटाने और संबोधित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि सभी नागरिकों को समान रूप से अधिकार प्रदत्त करने हेतु कुछ नए कानून बनें। जनसंख्या नियंत्रण विधेयक उन मांगों में से एक था। अश्विनी उपाध्याय उस कानून की लम्बे समय से मांग कर रहे हैं व कानून के एक प्रमुख समर्थक हैं। हालांकि अगले दिन उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया पर एक प्रश्न जो उपस्थित हुआ है, क्या जनसंख्या नियंत्रण  कानून की वास्तव में की कोई आवश्यकता है ? क्या बहुसंख्यक हिन्दू इंदिरा गांधी जी के प्रसिद्ध नारे "हम दो हमारे दो" का पालन कर संख्या में घट रहा है ? क्या इस बात का डर है कि मुस्लिम आबादी शीघ्र ही हिन्दुओं से अधिक हो जाएगी ? या चुनावी लाभ हासिल करने के लिए समुदायों के बीच कथित सांप्रदायिक तनाव पैदा कर सत्तारूढ़ भाजपा राजनीति कर वोट बटोरने की जुगत में है ? क्या गैर-मुस्लिम देशों में मुसलमानों का जनसंख्या विस्तार सुनियोजित है ?  मुस्लिम और गैर-मुस्लिम देशों में जनसंख्या वृद्धि की दर में क्या अंतर है ?

आइए वैश्विक मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर पर एक नज़र डालें। 27 जनवरी, 2011 को PEW  रिसर्च सेंटर द्वारा विश्व भर के देशों में मुस्लिम जनसंख्या के विश्वव्यापी वृद्धि दर पर एक सांख्यिकी अध्ययन प्रकाशित किया गया। इस शोध के अनुसार मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर बेल्जियम (139.8 %), चेक गणराज्य (300 %), नीदरलैंड (165.7%), पोलैंड (233.3 %), स्पेन (276.8 %), स्वीडन (206.8 %)  और यूनाइटेड किंगडम (144.8 %) ने 1990 और 2010 के बीच 140-300 प्रतिशत की वृद्धि देखी। फ्रांस और जर्मनी में मुस्लिम आबादी  2050 तक 18 %, होने की संभावना है, जो कि एक न्यूनतम अनुमान है। आबादी इससे कहीं अधिक गति से बढ़ रही है।  उसी कालखंड के लिए तुर्की जैसे यूरोप के मुस्लिम देशों की विकास दर केवल 35.4 प्रतिशत थी। यद्यपि लैटिन अमेरिका में मुसलमानों की पहुंच अपेक्षाकृत सीमित मानी जाती है, परन्तु  दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील में 40.7 प्रतिशत की वृद्धि दर देखी गयी, जो कि एक भयानक सन्देश है।  
 

मुस्लिम देशों को देखें तो बांग्लादेश (45.5 %), मिस्र (40.5 %), इंडोनेशिया (32.4 %), ईरान (32.4 %), कुवैत (34.1 %), पाकिस्तान (58.6 %), सऊदी अरब (58.4 %) की विकास दर सेकुलर राष्ट्रों की तुलना में बहुत कम है। इन विपरीत आंकड़ों के पीछे क्या रहस्य है, क्या कारण है कि मुस्लिम देशों में जनसंख्या वृद्धि दर गैर-मुस्लिम देशों की तुलना में न्यूनतम है ?
 
यह इतने सारे देशों के लिए संयोग नहीं हो सकता है। एक सुनियोजित विकास दर स्पष्ट संकेत हैं कि इसके पीछे कुछ ठोस रणनीति के तहत जनसंख्या को बढ़ाया जा रहा है। यदि हम क़ुरान पर आधारित इस्लाम के सिद्धांतों को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि जब तक पूरा विश्व इस्लाम नहीं अपना लेता, प्रत्येक मुस्लिम को अपनी हैसियत के अनुसार इस्लाम को फ़ैलाने के लिए जिहाद करना है। इस तरह के दर्शन को ध्यान में रखते हुए बढ़ती जनसंख्या जिहाद का ही एक रूप है। जबकि पूरी दुनिया परिवार के आकार को सीमित कर रही है। केवल मुसलमान तेजी से बढ़ रहे हैं। इसलिए जनसँख्या का बढ़ना जिहाद ही है। भारत और अन्य गैर-मुस्लिम देशों को तत्काल इसी आधार पर मुस्लिम आबादी पर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाने की जरूरत है। भारतीय राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण विधेयक के मसौदे पर अमल करना शुरू कर दिया है। क्योंकि लोकतांत्रिक देश इस जिहाद के आसान शिकार हो सकते हैं। इसलिए मुख्य निशाने पर हैं, ऐसे देशों में सबसे अधिक जनसँख्या वृद्धि देखी जाती है। मुस्लिम आबादी निरंकुश शासन में ही नियंत्रण में रह सकती है। चीन और रूस ऐसे उदाहरण हैं, जहां मुस्लिम जनसँख्या केवल दहाई  के अंक सक सीमित है। हम जानते हैं कि रूस ने चेचन मुसलमानों के साथ कैसा व्यवहार किया और चीन उईगर मुसलमानों के साथ कैसा व्यवहार कर रहा है। भारत जैसे लोकतंत्र इस जिहाद से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। हमारे कुछ राज्यों जैसे असम, उत्तर प्रदेश, केरल, जम्मू और कश्मीर ने सबसे खराब जनसांख्यिकीय परिवर्तन देखा है, जिसके परिणामस्वरूप उन क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर हिंदुओं का प्रताड़ना व पलायन हुआ है।

असम ने हाल ही में जनसंख्या नियंत्रण रणनीति लागू की है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया है कि यह उपाय असम के अल्पसंख्यक समुदायों के विकास को बढ़ावा देगा। असम बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों के अतिक्रमण से पीड़ित है। लाखों मुस्लिम घुसपैठिए जनसांख्यिकी को बदलने का गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं। नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री नया कानून बनाकर इस पर लगाम लगाने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नई जनसंख्या नीति का खुलासा किया है। प्रस्तावित कानून का अंतिम लक्ष्य राज्य के नागरिकों के लाभ के लिए दो बच्चों की नीति को बढ़ावा देना है। उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण और कल्याण) विधेयक, 2021 का मसौदा उत्तर प्रदेश विधि आयोग द्वारा जारी किया गया था। जैसा कि कई जनसंख्या नियंत्रण कानूनों के साथ होता है। यूपी-मसौदा विधेयक प्रोत्साहनों और हतोत्साहन का विवरण देने से पहले एक महान लक्ष्य के साथ शुरू होता है। जनसंख्या विस्फोट की अवधारणा कई नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय रही हैं। पॉल और ऐनी एर्लिच ने 1968 में द पॉपुलेशन बम प्रकाशित किया था। भारत में, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) ने दिखाया है कि राज्यों में परिवार के आकार में काफी कमी आई है। यूपी में ज्यादातर युवा जोड़ों के दो ही बच्चे हैं। प्रजनन क्षमता में गिरावट के बावजूद, जनसंख्या का विस्तार जारी है।  इसे जनसांख्यिकीविदों द्वारा "जनसंख्या गति" के रूप में जाना जाता है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि भले ही यूपी में प्रत्येक जोड़े के आगे से दो ही बच्चे हों फिर भी जनसंख्या में वृद्धि होगी। राज्य में युवाओं की भारी संख्या के कारण ऐसा हो रहा है। अतीत के विपरीत, आज  की जनसंख्या का विस्तार इसलिए हो रहा है क्योंकि जोड़ों के अधिक बच्चे हैं, बल्कि इसलिए कि बहुत अधिक युवा जोड़े हैं।

कुछ विशेषज्ञ जनसंख्या नियंत्रण का विरोध करते हैं। यह मानते हुए भी कि जनसंख्या सीमित करने से प्राकृतिक संसाधन आधार मजबूत होगा, यह मॉडल त्रुटिपूर्ण है। वे इसे उपभोग के पैटर्न से जोड़ते हैं। यह दावा करते हुए कि अमीर अधिक प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग करते हैं और गरीबों की तुलना में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कहीं अधिक योगदान करते हैं। जनसंख्या नियंत्रण धनी वर्ग के लिए होना चाहिए, क्योंकि इससे गरीब वर्ग ही प्रभावित होगा। उनका यह भी मानना है कि ऐसा कानून कभी भी लागू नहीं किया जाएगा, इसका उद्देश्य सिर्फ मतदाताओं के बीच की खाई को चौड़ा करना और विभाजन का लाभ उठाना है। हालांकि, हमने देखा है कि पिछले सात वर्षों में मौजूदा केंद्र सरकार ने लंबे समय से चली आ रही अधिकांश समस्याओं का निराकरण किया है। ऐसे में जनसंख्या नियंत्रण कानून की इस सरकार से अपेक्षा की जाती है। वे इन अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे, ऐसा प्रजा को विश्वास भी है।
 
अब क्योंकि इस्लाम गर्भ निरोधकों या गर्भधारण को रोकने के अन्य तरीकों के उपयोग की मनाही करता है, इसलिए इच्छा से जनसंख्या नियंत्रण असंभव है। चूंकि मुसलमान सरकारी योजनाओं के सबसे बड़े लाभार्थी हैं। इसलिए उन्हें मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य और राशन के साथ-साथ सरकारी ईडब्ल्यूएस आवास कार्यक्रमों से बड़ा लाभ होता है। टू-चाइल्ड नियम के माध्यम से, इस विधेयक का इरादा सरकारी नौकरियों, विकास परियोजनाओं और यहां तक कि राशन या सब्सिडी वाले भोजन तक पहुंच सहित सरकारी लाभों की पूरी श्रृंखला को प्रभावित करना है, जो एक सुधारात्मक उपाय प्रतीत होता है। जिसे बहुत पहले लागू किया जाना चाहिए था। पिछली सरकार के नीति सलाहकार उस समय कुछ संगठनों या नेतृत्व के दबाव में रहे होंगे, अन्यथा उन्होंने जनसंख्या विस्फोट के आसन्न खतरे को अवश्य देखा ही होगा।

PEW की रिपोर्ट से हम देख सकते हैं कि जनसंख्या वृद्धि पर मुसलमानों के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। वे मुस्लिम देशों में तो कम बढ़ रहे हैं, क्योंकि उनके पास जीतने के लिए कुछ भी नहीं है। जबकि अन्य देशों में वे काफिरों की संख्या को पछाड़ने के लिए जनसंख्या वृद्धि से जनसँख्या का समीकरण बिगाड़कर उन देशों में इस्लामिक शासन चाहते हैं। कश्मीर, बंगाल, केरल और असम में यही हुआ है। फिर वहां से हिंदुओं को निष्कासित कर दिया गया। मुसलमान किसी भी भूभाग में तभी तक सहिष्णु रहता है जब तक वह अल्पसंख्यक है। जब वे आबादी के 30 % तक पहुंच जाते हैं तो वे हमलावर बन जाते हैं और सभी गैर-मुस्लिमों को बल या छल से कन्वर्ट करने का प्रयास करते हैं। जैसा कि कुरान में कहा गया है। जब तक तुम संख्या में कम हो उनकी बात मान लेना, उनके जैसे बनकर रहना, प्रसाद भी खा लेना आरती भी कर लेना, किन्तु हमेशा याद रहे जब तुम बहुसंख्यक हो तो उनके राज को पलट देना है, उखाड़ फेंकना है,  इस्लामिक शरिया स्थापित करना है। जब उनकी मजहबी किताब ही इस शिक्षा का अनुसरण करने को कहती है तो तो हम उनकी अगली पीढ़ी से सहिष्णु होने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं ?

अतः यह वह क्षण है, जब समान नागरिक संहिता के अनुरूप दो-बालक नीति को लागू करना है। वैसे भी एक लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्ष देश में सरकार अपने नागरिकों के साथ उनकी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर भेदभाव कैसे कर सकती है! क्या मुस्लिम महिलाओं के लिए व्यक्तिगत कानून, अत्याचारी नियम रखना पंथनिरपेक्षता व मानव अधिकारों के मूल सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है ? व्यक्तिगत कानून के साथ, क्या मुस्लिम महिलाओं को नागरिक अधिकार प्राप्त हैं ? यूसीसी और जनसंख्या नियंत्रण विधेयक की तत्काल आवश्यकता है।

 

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