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निरंकुश आंदोलन से पंजाब में औद्योगिक पलायन

WebdeskAug 03, 2021, 12:21 PM IST

निरंकुश आंदोलन से पंजाब में औद्योगिक पलायन

 

राकेश सैन


जिन वामंपथियों व हिंसक तत्वों ने बंगाल को औद्योगिक रूप से बर्बाद किया, अब उनकी शनिदृष्टि कथित किसान आन्दोलन की आड़ लेकर पंजाब को ग्रसने लगी है। पंजाब के लोगों को बंगाल से सबक ले अपने फैसले लेने होंगे


इन दिनों राजनीतिक हिंसा से पीडि़त दो राज्यों में विपरीत प्रकृति के समाचार सुनने को मिले। एक राज्य में कुल्हाड़ी पर पांव मारा जा रहा है तो दूसरे में इसी तरह के प्रयासों से जख्मी हुए पैरों पर मरहम पट्टी के प्रयास हो रहे हैं। पश्चिम बंगाल के सिंगुर में भूमि अधिग्रहण विरोधी आन्दोलन के कारण वहां से अपनी नैनो कार परियोजना को बाहर ले जाने के लिए मजबूर होने के 13 साल बाद टाटा समूह पर बंगाल सरकार प्रेम के डोरे डाल रही है। राज्य के उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री पार्थ चटर्जी के अनुसार टाटा के साथ बंगाल में बड़े निवेश के लिए बातचीत चल रही है। चटर्जी ने कहा कि टाटा के साथ हमारी कभी कोई दुश्मनी नहीं थी, न ही हमने उनके खिलाफ लड़ाई लड़ी। वे इस देश के सबसे सम्मानित और सबसे बड़े व्यापारिक घरानों में से एक हैं। दूसरी तरफ पंजाब में अडानी समूह ने आईसीडी लोजिस्टिक पार्क व रिलायंस कम्पनी ने अपना आऊटलेट बन्द कर दिया है।


राज्य में निरंकुश किसान आन्दोलन और इसको लेकर राज्य की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस द्वारा की जा रही राजनीति के चलते देश के दो औद्योगिक घरानों को यह कदम उठाना पड़ा। उक्त फैसले से राज्य में सैंकड़ों युवाओं को तत्काल रोजगार से हाथ धोना पड़ा है और साथ में अरबों रुपये के राजस्व की हानि का अनुमान है। केवल इतना ही नहीं बड़े घरानों के इस कदम से राज्य के अन्य उद्योगों पर भी अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है। और नए उद्योगों की सम्भावना पर फिलहाल अल्पविराम लगता दिख रहा है। जिस हिंसा और नक्सलवाद ने उद्योग व व्यापार की दृष्टि से बंगाल का भट्ठा बैठाया, उसी की काली छाया पंजाब पर भी पड़ने लगी है।

अगर कोई शोधार्थी यह जानना चाहे कि अपने मानव संसाधनों को किस तरह नष्ट किया जाता है, तो बंगाल से बेहतर कोई उदाहरण नहीं। अंग्रेजों के भारतीय उद्योगों को समाप्त करने के सभी प्रयासों के बावजूूद स्वतन्त्रता प्राप्ति तक बंगाल देश का अग्रणी औद्योगिक राज्य रहा। लेकिन धीरे-धीरे वामपन्थियों के प्रभाव से हिंसा ने यहां की राजनीति में अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया। 1953 में ट्राम भाड़ा एक पैसा बढ़ाए जाने के विरोध में भड़की हिंसा में कई ट्रामें आग के हवाले कर दी गईं। इसके बाद यहां यही सब चलता रहा और 1972 में अचानक हालात बदले और राजनीति में आपराधिक तत्वों का प्रवेश होने लगा। देश के अन्य हिस्सों से वहां निवेश करने वाले उद्योगपतियों व व्यवसाइयों को हिन्दी भाषी बता कर उनका विरोध किया जाने लगा। वामपन्थियों ने अपने शासनकाल में उद्योगपतियों व व्यापारियों का जीवन इतना दुश्वार कर दिया कि उनमें से अधिकतर ने अपना कामकाज समेट कर पलायन किया।

नक्सलवाद, माओवाद, काल्पनिक बुर्जुआ वर्ग की सत्ता के सिद्धान्त आदि ने उद्योगों का अन्त कर दिया। लेकिन वामपन्थियों को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने उद्योग व व्यापार को प्रोत्साहन देने की बात कही। लेकिन उनसे गलती हुई। उन्होंने जिस हिंसक मार्ग से उद्योगों को भगाया अब उसी खूनखराबे से औद्योगिकीकरण का प्रयास करने लगे। सिंगुर में टाटा की लखटकिया नैनो कार परियोजना के लिए यही कुछ हुआ और भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों का खून बहाया गया। टाटा को अपनी परियोजना गुजरात ले जानी पड़ी।

केन्द्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब में किसानों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शन के चलते अडानी समूह ने लुधियाना के पास किलारायपुर स्थित अपने आईसीडी परिचालन को बन्द करने का निर्णय लिया। प्रदेश में पहली बार किसी उद्योग ने न्यायालय में याचिका दायर करके अपने अधिकारों के हनन का हवाला दे कर कहा कि वो अपना व्यापार बन्द कर रहे हैं।

समूह ने लॉजिस्टिक्स पार्क बन्द करने का निर्णय लेते पंजाब तथा हरियाणा उच्च न्यायालय में एक शपथपत्र दाखिल कर कहा कि राज्य सरकार और न्यायालय दोनों की तरफ से उसे पिछले सात महीनो में कोई भी राहत नहीं मिली। जिसके चलते वे अब और नुक्सान उठाने की परिस्थिति में नहीं हैं। समूह ने आईसीडी की शुरुआत 2017 में की थी। इसका उद्देश्य था, लुधियाना और पंजाब में अन्य जगहों पर स्थित उद्योगों को रेल तथा सड़क मार्ग से परिवहन की सुविधा प्रदान करना।

जनवरी, 2021 के बाद से ही यहां कामकाज ठप है। जनवरी में किसानों ने इस पार्क के बाहर धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया और ट्रैक्टर ट्राली लगा कर कर्मचारियों और सामान के आने—जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। राज्य के अधिकारियों ने न्यायालय के समक्ष कई बार यथास्थिति रिपोर्ट तो पेश की लेकिन नाकाबन्दी हटाने में पूरी तरह से विफल रहे। अनुमान है कि इस पार्क के बन्द होने से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 400 लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। रेल ढुलाई, जीएसटी, सीमा शुल्क और अन्य करों के रूप में 700 करोड़ रुपये और कुल आर्थिक असर के रूप में लगभग 7000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुक्सान होगा।

पंजाब के बाकी उद्योगों को भी लॉजिस्टिक्स पार्क के बन्द होने से बड़ा झटका लगा है। अब उनका परिवहन खर्च 33 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। दरअसल, बन्दरगाह से दूरी और भूमि से घिरे सीमान्त राज्य होने के चलते पंजाब के उद्योगों का तैयार माल दूसरे देशों व राज्यों को भेजना सबसे बड़ी चुनौती है। माल जल्दी और कम लागत में भेजना हर उद्योगपति की प्राथमिकता रहती है। कच्चा माल लाने से लेकर निर्यात के लिए समय पर सामग्री पहुंचाने के लिए कई दिन लग जाते हैं। अडानी समूह के पास खुद के यार्ड और जहाज हैं।

इससे व्यापार में तेजी आई थी और उद्योगों को इससे काफी राहत मिल रही थी। जो सामान भेजने के लिए आम तौर पर 20 से 25 दिन का समय लगता था, वही तैयार माल अडानी लॉजिस्टिक्स के चलते ग्राहकों तक 10 से 15 दिनों में पहुंच रहा था। पंजाब से कबाड़ (स्क्रैप), मशीनरी, मेवा, कागज, रद्दी कागज, ट्रैक्टर, ऊनी सामान, धागा, हौजरी, खेलों का सामान, साईकिल, चमड़े का सामान सहित कई अहम उत्पाद आयात-निर्यात के लिए आते—जाते थे। समूह के पास खुद का आधारभूत ढांचा होने के चलते इसका किराया भी अन्य कम्पनियों की तुलना में कम था। लेकिन कथित किसान आन्दोलन से परेशान हो रिलायंस कम्पनी ने भी अपना एक आऊटलेट बन्द कर दिया, जिससे सैंकड़ों लोगों के रोजगार प्रभावित हुए हैं।

भ्रामक तथ्यों पर राजनीति करने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं, उसका ताजा उदाहरण हैं पंजाब के यह घटनाक्रम। किसान नेताओं, उनकी देखादेखी नेताओं ने जिस तरह इस झूठ का प्रचार प्रसार किया कि केन्द्र सरकार केवल दो औद्योगिक घरानों को खुश करने के लिए उक्त कृषि सुधार कानून लाई है तो आन्दोलनकारियों में इन कम्पनियों को लेकर गलत धारणाएं पैदा होनी शुरू हो गईं। इसका परिणाम निकला कि इस साल की शुरुआत में राज्य भर में 1600 के लगभग जियो मोबाइल टावरों को क्षतिग्रस्त किया और उन्हें लूटा गया। उद्योगपतियों को नकारात्मक शक्ति के रूप में प्रचारित किया जाने लगा। इसका परिणाम हुआ कि राज्य सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी आज पंजाब में कोई नया उद्योग आने को तैयार नहीं।

राज्य के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह खुद स्वीकार कर चुके हैं कि ऐसे वातावरण में राज्य में लगभग साठ से अस्सी हजार करोड़ तक का पूंजीनिवेश अधर में लटक गया है। राज्य में महंगी बिजली, प्रशासन में उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार, लेट-लतीफी, कमजोर आधारभूत ढांचे के चलते पहले ही यहां से उद्योग पलायन की तैयारी कर रहे थे और अब बड़े औद्योगिक समूह के कारोबार समेटने से उद्योगों में पलायन की गति और तेज होने की आशंका है। इसका विपरीत असर केवल पंजाब ही नहीं बल्कि देश में रोजगार के अवसरों, पूंजीनिवेश, सकल घरेलु उत्पादन पर पड़ना भी अवश्यम्भावी है। जिन वामपन्थियों व हिंसक तत्वों ने बंगाल को औद्योगिक रूप से बर्बाद किया अब उनकी शनिदृष्टि कथित किसान आन्दोलन के नाम पर पंजाब को ग्रसने लगी है। पंजाब के लोगों को बंगाल से सबक ले अपने फैसले लेने होंगे।

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