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महबूबा मुफ्ती का आतंकवादी और पाकिस्तान प्रेम फिर जाग उठा !

WebdeskAug 23, 2021, 03:09 PM IST

महबूबा मुफ्ती का आतंकवादी और पाकिस्तान प्रेम फिर जाग उठा !

मीम अलिफ हाशमी


जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी मुखिया महबूबा मुफ्ती का आतंकवादी और पाकिस्तान के प्रति प्रेम एक बार फिर जाग उठा है। उन्होंने एक ऐसा विवाद बयान दिया है, जिससे न केवल आतंकवादियों और उसके सरपरस्त पाकिस्तान का मनोबल ऊंचा होगा।
इससे जम्मू कश्मीर के शांत माहौल में खलल भी पड़ सकता है


एक तरफ केंद्र सरकार जहां प्रदेश में लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने के प्रयास में है, वहीं प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती तालिबान-अमेरिका का हवा देकर सूबे के लोगों को भड़काने का प्रयास कर रही हैं।

इस क्रम में उनका एक बेहद आपत्तिजनक बयान आया है। सोशल मीडिया पर न्यूज एजेंसी एएनआई ने एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वह एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहती दिख रही हैं-‘‘जम्मू कश्मीर के लोग बर्दाश्त कर रहे हैं। जम्मू कश्मीर के लोगों का इम्तिहान मत लो। जम्मू कश्मीर के लोगों के सब्र का बांध टूट गया तो बह जाओगे। पड़ोस में देखो क्या हो रहा है।

अमेरिका जैसी बड़ी ताकत को बोरिया बिस्तर लेकर भागना पड़ा। वाजपेयी जी की तरह बातचीत का सिलसिला शुरू करो। आईन बनाकर जम्मू कश्मीर को लूटो मत, उसे वापस करो. जम्मू कश्मीर टुकड़े-टुकड़े कर दिया इसे ठीक करो। नहीं तो बहुत देर हो जाएगी। बहुत देर हो जाएगी।’’

पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने अपने बयान में किसी का नाम नहीं लिया है, पर उनकी ओर से सारी चेतावनी केंद्र सरकार को थी। जम्मू कश्मीर से  अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद बहुत मुश्किल से इस प्रदेश के हालात पटरी पर आए हैं। तमाम चुनौतियों के बावजूद हाल में स्थानीय निकाय के चुनाव संपन्न हुए। अरबों का विकास कार्य चल रहा है। युवाओं के लिए खेल एवं रोजगार का माहौल तैयार किया जा रहा है।

अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से वहां राष्ट्रपति शासन लागू है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस प्रयास में हैं कि जम्मू कश्मीर में जल्द लोकतांत्रिक व्यवस्था कराई जाए। नए सिरे से प्रदेश का परिसीमन करा कर वहां चुनाव कराए जाएं। इस सिलसिले में पीएम मोदी के साथ जम्मू कश्मीर के तमाम स्टेक होल्डर्स यानी सियासी पार्टियों की सौहार्दपूर्ण वातावरण में एक बैठक भी हो चुकी है। उक्त बैठक में खुद महबूबा भी मौजूद थीं. अब वही अनुच्छेद 370 की पुनः बहाली की मांग को लेकर लोगों को भड़काने का प्रयास कर रही हैं। मंचों से इसकी बहाली की मांग उठाई जा रही है।

वह भी ऐसे समय, जब अपने साथी देश अफगानिस्तान में सियासी उथल, पुथल मचा है। दो दशक से वहां जमी अमेरिकी फौज रातों रात भाग खड़ी हुईं और तालिबानियों ने काबुल सहित तकरीबन पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। वहां के हालात अभी इतने खराब हैं कि पाकिस्तान समर्थक आतंकवादी संगठन हक्कानी ग्रुप अफगानिस्तान में सक्रिय हो गया है। अफगानिस्तान में भारत के प्रतिद्वंदी देश पाकिस्तान एवं चीन के जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी दिखाने से भारत के लिए कई तरह की समस्या पैदा हो सकती है। हमारे हजारों नागरिक वहां अभी भी फंसे हैं, जिन्हें निकालना किसी चुनौती से कम नहीं। सुरक्षा विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं तालिबानियों के बढ़ते प्रभाव से आतंकवादी संगठनों का मनोबल बढ़ेगा। वे नए सिरे से कश्मीर में पैर जमाने का प्रयास कर सकते हैं। ऐसे में आतंकवादियों के हौसले तोड़ने के लिए सरकार का साथ देने की बजाए महबूबा इसके उलट तालिबान का खौफ दिखा कर न केवल भारत सरकार को चुनौती दे रही हैं, जम्मू कश्मीर के लोगों को भड़काने का भी प्रयास कर रहे हैं। उनके इस तरह के बयान से कश्मीर में दुबके आतंकवादियों का भी हौसला बढ़ेगा। वैसे भी उनकी पार्टी पर आतंकवादी और पाकिस्तान की हिमायत करने के आरोप लगते रहे हैं। मगर इस बार मामला थोड़ा ज्यादा गंभीर है।


महबूबा का महबूब मुल्क पाकिस्तान
 
महबूबा मुफ्ती फिर से खबरों में हैं और एक बार फिर से उन्हीं वजहों से खबरों में हैं, जिसकी वजह से वह अमूमन में खबरों में बने रहने की कोशिश करती हैं। यानी भारत विरोधी और पाकिस्तान परस्त बयान बाजी।


पहले तो महबूबा के बयान सियासी वजहों से आते थे और वह कथित ‘कश्मीरियत’के नाम पर पाकिस्तान समर्थकों की तरह बर्ताव करती थीं। पर इस बार उनके बयान के पीछे वजहें निजी हैं। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार को शनिवार को धमकी दी कि कश्मीर का हाल अफगानिस्तान जैसा हो जाएगा। उन्होंने कहा, “अमेरिका को देखो, अफगानिस्तान से बोरिया-बिस्तर बांधकर मजबूर हो गया, इसलिए हम कश्मीरियों की परीक्षा मत लो।”

बहरहाल, इस बार का उनका बयान खिसियाहट से निकला है, जिसको साफतौर पर समझा जा सकता है। असल में महबूबा मुफ्ती की अम्मी गुलशन नजीर को प्रवर्तन निदेशालय ने पूछताछ के लिए तलब किया था। एजेंसी ने उनसे तीन घंटे तक लगातार पूछताछ की,और उसके बाद महबूबा ने यह उग्र बयान दिया है।

लेकिन, ऐसा नहीं है कि ऐसा बयान उन्होंने पहली दफा दिया हो। महबूबा मुफ्ती का रवैया अमूमन भारतविरोधी रहा है और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 270 निरस्त होने और सूबे के केंद्र शासित प्रदेश में बदलने के बाद ही उनके लिए राजनैतिक भविष्य तकरीबन अंधकारमय हो गया है। कम से कम निकट भविष्य में तो जरूर, जब तक सूबे को वापस राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता।

वैसे, इससे पहले भी पीडीपी प्रमुख को ऐसे बयान देकर सुर्खियों में आने का चस्का रहा है। 2020 के 24 अक्टूबर को महबूबा ने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के खिलाफ बयान दिया था और कहा था, “जम्मू-कश्मीर को लेकर पिछले साल पांच अगस्त को संविधान में किए गए बदलावों को वापस नहीं ले लिया जाता, तब तक उन्हें चुनाव लड़ने और तिरंगा थामने में कोई दिलचस्पी नहीं है।”


असल में, 1996 में राजनीति में कदम रखने के बाद से ही महबूबा मुफ्ती ने अलगाववादियों के साथ खड़े होने में दिलचस्पी दिखाई है। 1996 के चुनावों में वह महबूबा हालांकि, कांग्रेस के टिकट पर बिजबिनहारा से चुनाव जीती थीं, लेकिन अपने राजनीतिक क्षितिज का विस्तार करने के वास्ते उन्होंने बड़ी समझदारी से आतंकवादियों के साथ बातचीत करने की वकालत शुरू कर दी।

घाटी में कोई भी आतंकवादी मुठभेड़ में मारा जाता, महबूबा उसके घर जानीं और अमूमन उस शोक में वह रोने लगती थी।
इसका बहुत असर हुआ और आतंकवादियों ने महबूबा को अपना समर्थक समझना शुरू कर दिया।

1998में मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) का गठन किया। और तब, महबूबा के जिम्मे नवगठित पीडीपी को कश्मीरियों के बीच लोकप्रिय बनाने की चुनौती थी और इसके लिए उनका आतंकवादियों के प्रति समर्थन या नरमी का रुख अख्तियार करना बहुत काम आया, जिसे ‘उदार अलगाववाद‘ कहा जा सकता है।

महबूबा की पीडीपी ने भारत-विरोधी लाइन पकड़ी और उन्होंने पार्टी के झंडे का रंग हरा और चुनाव चिन्ह कलम और दवात चुना। यह मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के झंडे की नकल थी।

महबूबा मुफ्ती ने पीडीपी के 22वें स्थापना दिवस के मौके पर  28जुलाई 2021 को भी ऐसा ही बयान दिया था। उन्होंने अनुच्छेद 370 का विरोध, “भारत में एकमात्र मुस्लिम राज्य” का विभाजन बताकर किया।

देश विरोधी गतिविधियों में शामिल जब 11 लोगों को भारत सरकार ने नौकरी से बर्खास्त कर दिया था। तो भी महबूबा इसके विरोध में उतर आई थी। जबकि बर्खास्त किए गए लोग न सिर्फ टेटर फंडिंग में शामिल थे, बल्कि उनमें आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन के दो बेटे भी थ।
आतंकवादियों के पक्ष में खड़े होकर बयान देने की अपनी आदत से मजबूर महबूबा ने तब इस काम को ‘संविधानविरोधी’बताया था।

इतना ही नहीं, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने के साथ पत्थरबाजी गैंग चलाने वाला और आतंकवादियों से हाथ मिलाने वाला पीडीपी नेता वहीद-उर-रहमान पारा भी महबूबा के खासमखास लोगों में शामिल है।

एनआइए द्वारा विशेष अदालत में दायर चार्जशीट में यह दर्ज है कि वहीद ने बुरहान वानी को मार गिराए जाने के बाद कश्मीर घाटी में हिंसा जारी रखने के लिए हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी के दामाद अल्ताफ अहमद शाह उर्फ अल्ताफ फंटूश को पांच करोड़ रुपए दिए थे।
इसी तरह 9 नवंबर 2020 को भी महबूबा ने ऐसा ही भड़काऊ बयान देते हुए कहा था कि ‘मरने से बेहतर यही होगा कि वह हथियार उठा ले, जम्मू-कश्मीर के युवाओं के पास और कोई विकल्प नहीं।’

बहरहाल, अलगाववाद की सियासत की आंच अब धीमी पड़ रही है। घाटी के युवाओं को भी देश के बाकी राज्यों के नौजवानों की तरह रोजगार और तालीम की चिंता है, ऐसे में भड़काऊ बयानों के झांसे में वह अब कम ही आएगा। स्वाधीनता दिवस के मौके पर श्रीनगर के लाल चैक का तिरंगे में रंग जाना यही दिखाता है।

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