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वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस (24 जून) पर विशेष: अकबर की फौज को पीछे हटने के लिए किया था मजबूर

WebdeskJun 24, 2021, 02:54 PM IST

वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस (24 जून) पर विशेष: अकबर की फौज को पीछे हटने के लिए किया था मजबूर

विकास मरकाम


वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान की कथा आज भी हमें विदेशी आक्रमणकारियों के सामने न झुकने के साथ-साथ अपने धर्म, अपने राज्य की रक्षा के लिये सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा देता है। ऐसी वीरांगना के बारे में नई पीढ़ी को बताया जाना चाहिए

भारत सदैव ही वीर सपूतों और वीरांगनाओं की जननी रही है। मातृभूमि की रक्षा के लिये जब-जब आवश्यकता पड़ी है, हमारे वीर सपूतों और वीरांगनाओं ने अपने प्राणों तक की आहुति देकर राष्ट्रभक्ति की एक नई ऊर्जा का संचार प्रवाहित किया है। हिंदुस्तान में जब-जब विदेशी आक्रांताओं/आक्रमणकारियों की बुरी नजर पड़ी है या विदेशी आक्रमण हुये हैं तब-तब इस सम्पूर्ण भू-भाग की रक्षा के लिये किसी न किसी महान विभूति का अवतरण अवश्य हुआ है।

ऐसी ही एक महान विभूति थीं रानी दुर्गावती। उनका जन्म 5 अक्तूबर, 1524 को चंदेल राजा कीरत सिंह जी के यहां हुआ था। हिंदुस्तान के इतिहास में चंदेल राजाओं की वीरता का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। राजा कीरत सिंह ने ही अपने कालिंजर किले में मुगल आक्रांता शेरशाह सूरी को मौत के घाट उतारा था। नवरात्रि की दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण कन्या का नाम दुर्गावती रखा गया।

अपने परिवार की ख्याति और वीरता के अनुरूप ही दुर्गावती बाल्यकाल से ही वेद और शास्त्र की शिक्षा के साथ-साथ शस्त्रविद्या और घुड़सवारी का भी प्रशिक्षण प्राप्त करने लगी। दुर्गावती के बारे में कहा जाता है कि युद्धकला में पारंगत होने के साथ-साथ वह इतनी साहसी थीं कि अकेले ही शेर का शिकार कर लेती थीं। दुर्गावती की इसी वीरता से प्रभावित होकर गढ़-मंडला के गोंडवाना साम्राज्य के राजा दलपतशाह ने 1542 में उनके साथ विवाह किया। 1545 में रानी दुर्गावती को वीरनारायण के रूप में पुत्ररत्न प्राप्त हुआ। रानी का दाम्पत्य जीवन ज्यादा दिन तक नहीं रहा। 1550 में राजा दलपतशाह का अल्पायु में देहांत हो गया।
पुत्र वीरनारायण की आयु पांच वर्ष होने के कारण रानी दुर्गावती ने गढ़-मंडला के गोंडवाना साम्राज्य की बागडोर स्वयं अपने हाथों में ले ली। रानी दुर्गावती ने गोंडवाना साम्राज्य के 52 गढ़ों और 57 परगना को सुव्यवस्थित कर बुद्धिमत्तापूर्वक अपना शासन चलाया। रानी दुर्गावती के शासनकाल में राज्य में जनता सुखी थी। एक मितव्ययी कर-प्रणाली होने के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी। अकबर के दरबारी अबुल फजल ने अकबरनामा में रानी दुर्गावती के शासन के बारे में उल्लेख करते हुये लिखा है कि गोंडवाना साम्राज्य के पास 20,000  घुड़सवार, 1000 हाथी और 40,000 पैदल सेना थी तथा राज्य में स्वर्ण मुद्रा का चलन था।

रानी दुर्गावती के साम्राज्य की वैभवता को देखते हुये मालवा के राजा बाजबहादुर ने गढ़-मंडला पर कई बार हमला किया, परंतु हर बार रानी ने अपने रण कौशल से उसे धूल चटाते हुये परास्त किया। 1562 में राजा बाजबहादुर के मालवा राज्य पर अकबर ने कब्जा कर लिया और रानी दुर्गावती को अबला-महिला जानकर गढ़-मंडला पर आक्रमण करने की रणनीति बनाने लगा। तब बाजबहादुर ने अकबर को चेताया कि रानी दुर्गावती एक बलशाली और रण कौशल में माहिर योद्धा हैं। उन्होंने अकबर को स्वयं उन पर आक्रमण न करने की सलाह दी। इसके बाद अकबर ने अपने खास सेनापति आसफ खां के नेतृत्व में एक बड़ी सेना को 1564 में धावा बोलने का आदेश दिया। रानी दुर्गावती को जब यह बात मालूम चली कि आसफ खां के नेतृत्व में मुगलों ने उनके साम्राज्य पर हमला कर दिया है तो उन्होंने भी डटकर सामना करने का निश्चय किया। रानी दुर्गावती अपनी कुलदेवी राज-राजेश्वरी माता की पूजा-अर्चना कर हाथी में सवार होकर स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व करने लगीं और आसफ खां सहित मुगल सेना के छक्के छुड़ा दिये।

दूसरे दिन फिर आसफ खां ने लगभग 20,000 नये घुड़सवार मुगल सैनिकों के साथ रानी की सेना पर हमला बोल दिया। इस बार भी रानी ने वीरता से जवाब दिया। रानी दुर्गावती की सेना ने मुगल सेना को सिंगौरगढ़, चंडालभाटा और गौरैया घाट से तो खदेड़ दिया, परंतु नर्रई नाला में भीषण युद्ध होने लगा। इसी समय रानी का हाथी घायल हो गया। बरसात के दिन थे, नाले में पानी भरा हुआ था। इसी कारण हाथी नाला पार नहीं कर पा रहा था और यहीं पर रानी मुगल सैनिकों से घिर गईं। युद्ध में अपनी पराजय देखते हुये रानी दुर्गावती ने अपने खास सैनिकों के साथ पुत्र वीरनारायण को सुरक्षित स्थान चौरागढ़ भेज दिया और निश्चय किया कि वे विदेशी आक्रमणकारी मुगलों के हाथों अपने प्राण त्याग नहीं करेंगी। इसके बाद उन्होंने अपने महावत को आदेश दिया कि शत्रु उनके शव पर हाथ भी न लगा सके, ऐसी व्यवस्था करना। फिर उन्होंने  24 जून,1564 को अपने सम्मान की रक्षा के लिये राज-राजेश्वरी माता की जय और जय भवानी का उदघोष करते हुये अपने ही कटार से गला काटकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।  

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